स्टारलिंक लाइसेंसिंग पर भारत के रुख को विशेषज्ञ का समर्थन

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 15-10-2026
"Sufficient merit": Expert backs India's Starlink licensing stance after reports of restriction in Ukraine

 

नई दिल्ली 
 
विदेश मामलों के विशेषज्ञ रॉबिंदर सचदेवा ने गुरुवार को एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा 'स्टारलिंक' (Starlink) को लाइसेंस देने के मामले में भारत के सतर्क रुख का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि निजी तौर पर नियंत्रित संचार नेटवर्क की विश्वसनीयता और इसके संभावित भू-राजनीतिक (geopolitical) प्रभावों को लेकर भारत की चिंताएं "काफी हद तक जायज" हैं। यह बात विशेष रूप से यूक्रेन में रूसी हमलों के बीच स्टारलिंक सेवाओं पर लगी पाबंदियों की खबरों के संदर्भ में कही गई है। 
 
ANI से बातचीत में सचदेवा ने कहा कि यूक्रेन में एलन मस्क के हालिया बर्ताव और सैन्य संचार के लिए महत्वपूर्ण बन चुके एक तकनीकी प्लेटफॉर्म पर उनके प्रभाव को देखते हुए, भारत की चिंताएं पूरी तरह से उचित हैं। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि भारत सरकार का रुख या भारत का कुल मिलाकर जो नजरिया है, वह काफी हद तक सही है। स्टारलिंक एक बहुत ही अस्थिर और अप्रत्याशित (unpredictable) खिलाड़ी साबित हो सकता है। खासकर यूक्रेन में एलन मस्क के पिछले बर्ताव को देखते हुए, जहां उन्होंने स्टारलिंक की पहुंच (access) ही बंद कर दी थी।"
 
उन्होंने एलन मस्क और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुए विवाद का भी जिक्र किया। उन्होंने तर्क दिया कि जब किसी महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (critical infrastructure) का नियंत्रण किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में हो जिसका व्यवहार अप्रत्याशित हो, तो यह उन देशों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है जो ऐसी सेवाओं पर निर्भर हैं। सचदेवा ने आगे कहा, "अमेरिका में, जब नासा अपने रॉकेट लॉन्च करता है, तो स्पेसएक्स का 'ड्रैगन' (Dragon) अंतरिक्ष यान भी उसमें शामिल होता है। डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपने विवाद के दौरान, मस्क ने कह दिया था कि 'ड्रैगन' उड़ान नहीं भरेगा। तो, एलन मस्क एक ऐसे अस्थिर व्यक्ति हैं जिनके पास बहुत बड़ी ताकत है। एलन मस्क आगे क्या कर सकते हैं, यह भारत के लिए निश्चित रूप से एक जोखिम का विषय है। 
 
उनका व्यवहार अप्रत्याशित और मनमौजी है। इसलिए, यह न केवल एक निजी कंपनी है, बल्कि इसका नेतृत्व भी एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जो काफी मनमौजी है। इसके अलावा, आज और बीते कल की दुनिया को देखते हुए हम समझ सकते हैं कि जब भू-राजनीतिक हालात बदलते हैं, तो विदेशी कंपनियां - चाहे वे अमेरिकी, ब्रिटिश या यूरोपीय हों - अपना काम समेट कर वापस जा सकती हैं।"
 
उनके ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब यूक्रेन में सैटेलाइट संचार सेवाओं पर लगी पाबंदियों की खबरों के बाद स्टारलिंक और स्पेसएक्स की फिर से जांच-परख की जा रही है। यूक्रेन में इस नेटवर्क का इस्तेमाल वहां की सेना द्वारा टोही (reconnaissance) कार्यों, ड्रोन संचालन, खुफिया जानकारी जुटाने और अन्य सैन्य अभियानों के लिए किया जाता है। इस रुकावट की खबर के बाद अमेरिकी सांसदों और यूक्रेनी अधिकारियों ने आलोचना की है। साथ ही, इससे यह बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है कि सशस्त्र संघर्ष के दौरान निजी टेक्नोलॉजी कंपनियां संचार बुनियादी ढांचे (कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर) को किस हद तक प्रभावित कर सकती हैं।
 
भारत के लिए, इन घटनाओं ने सैटेलाइट संचार लाइसेंसिंग से जुड़े सुरक्षा पहलुओं को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इससे यह बात और साफ हो गई है कि विदेशी नियंत्रण वाली सेवाओं को काम करने की अनुमति देने से पहले, उनकी सख्त नियामक जांच (रेगुलेटरी स्क्रूटनी) कितनी जरूरी है।
 
संचार मंत्रालय का कहना है कि सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए भारत का नियामक ढांचा निष्पक्ष और भेदभाव रहित है। साथ ही, लाइसेंस प्राप्त ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया में आगे बढ़ने के लिए सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
मंत्रालय का यह रुख एलन मस्क के 'X' (ट्विटर) पर किए गए एक पोस्ट के बाद सामने आया है, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि भारत में स्टारलिंक की योजनाओं को "कुछ खास उद्योगपतियों" (ओलिगार्क्स) द्वारा रोका जा रहा है।
 
भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए मंत्रालय ने कहा कि सरकार ने एक ऐसा प्राधिकरण ढांचा (ऑथराइजेशन फ्रेमवर्क) बनाया है, जिसमें सैटेलाइट संचार सहित सभी दूरसंचार सेवाएं शामिल हैं। मंत्रालय ने बताया कि 'नॉन-जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट ऑर्बिट' तकनीक पर आधारित तीन 'ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट' (GMPCS) सेवाओं को लाइसेंस दिए गए हैं। साथ ही, इस बात पर जोर दिया गया कि सभी लाइसेंस धारकों को सुरक्षा शर्तों का पालन करना होगा।
 
मंत्रालय ने कहा, "लाइसेंस की शर्तों के तहत, प्रत्येक लाइसेंस धारक को सुरक्षा नियमों का पालन करना अनिवार्य है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दी जाने वाली सेवाएं सभी सुरक्षा जरूरतों को पूरा करें, ताकि सभी उपयोगकर्ताओं और उनके डेटा की सुरक्षा बनी रहे।" सरकार ने यह भी बताया कि तीनों लाइसेंस धारकों के लिए सुरक्षा मूल्यांकन (सिक्योरिटी असेसमेंट) चल रहा है। एक बार यह मूल्यांकन पूरा हो जाने के बाद, लाइसेंस प्राप्त कंपनी स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए अगले चरण की प्रक्रिया शुरू कर सकती है।
 
इस नियामक रुख से साफ है कि भारत अपनी लाइसेंसिंग प्रक्रिया में सुरक्षा को सबसे ऊपर रखता है। लाइसेंस देना केवल व्यावसायिक वादों या कम सुविधा वाले इलाकों में कनेक्टिविटी देने के दावों पर निर्भर नहीं होता है। सच्चदेवा की टिप्पणियां विदेशी नियंत्रण वाले सैटेलाइट बुनियादी ढांचे पर निर्भरता से जुड़ी चिंताओं को उजागर करती हैं। यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब सेवा देने वाली कंपनी का नेतृत्व ऐसे व्यक्ति के हाथों में हो, जिसके फैसले बदलते व्यावसायिक या भू-राजनीतिक हालात से प्रभावित हो सकते हैं।