इस्लामाबाद [पाकिस्तान]
'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के अनुसार, इप्सोस (Ipsos) के एक सर्वे से पता चला है कि पाकिस्तान की आर्थिक मज़बूती पर लोगों का भरोसा और कम हो गया है; अब सिर्फ़ 14 प्रतिशत लोग ही अर्थव्यवस्था को मज़बूत मानते हैं। 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के अनुसार, पिछली तिमाही की तुलना में आर्थिक मज़बूती को लेकर लोगों की राय में छह प्रतिशत अंकों की गिरावट आई है। लोगों की चिंताओं में आर्थिक दबाव सबसे ऊपर है। महंगाई देश की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है, इसके बाद बेरोज़गारी, ग़रीबी और बिजली की बढ़ती कीमतें आती हैं। बिजली कटौती (लोड-शेडिंग) अब एक बड़ी चिंता के तौर पर अतिरिक्त टैक्स से आगे निकलकर पाँचवें स्थान पर पहुँच गई है।
इप्सोस के अनुसार, बिजली की कीमतों को लेकर चिंता नौ प्रतिशत अंक बढ़कर 35 प्रतिशत हो गई, जबकि ग़रीबी को लेकर चिंता में 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ईंधन की कीमतों ने परिवारों पर दबाव और बढ़ा दिया है। वैश्विक स्तर पर तेल की ऊंची कीमतें, टैक्स और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के साथ सरकार के समझौतों के कारण पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें बढ़ी हैं; पेट्रोल पर टैक्स 116 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुँच गया है।
टोला एसोसिएट्स (Tola Associates) ने पाया कि पाकिस्तान की करेंसी की वैल्यू गिरने के बावजूद, डॉलर के हिसाब से पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें दक्षिण एशिया में सबसे ज़्यादा हैं। ईंधन से जुड़े मुद्दों को संभालने के मामले में सरकार पर लोगों का भरोसा भी कमज़ोर बना हुआ है। पाकिस्तान के केवल एक-तिहाई लोग ही मानते हैं कि अधिकारियों ने ईंधन की उपलब्धता को प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया है, जबकि पाँच में से दो लोग ईंधन की कीमतों के मैनेजमेंट को बेअसर मानते हैं।
आर्थिक मामलों में भी भरोसा कमज़ोर है। सिर्फ़ 15 प्रतिशत लोगों ने निवेश को लेकर भरोसा जताया, जबकि केवल 16 प्रतिशत लोग ही अपनी नौकरी को लेकर सुरक्षित महसूस करते हैं। पाकिस्तान के केवल एक-चौथाई लोग मानते हैं कि देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के अनुसार, बलूचिस्तान में उम्मीद सबसे ज़्यादा (31 प्रतिशत) थी, जबकि पंजाब में यह 26 प्रतिशत, सिंध में 21 प्रतिशत और खैबर-पख्तूनख्वा में सिर्फ़ 14 प्रतिशत थी। इप्सोस पाकिस्तान के मैनेजिंग डायरेक्टर अब्दुल सत्तार ने तीसरी तिमाही को "सावधानी के साथ सुधार" का दौर बताया। उन्होंने कहा कि उम्मीदें और परिवारों के खर्च करने की क्षमता में सुधार हो रहा है, लेकिन यह सुधार इतना भी नहीं है कि लोग बड़े आर्थिक फ़ैसले ले सकें।