बोनहोमी से ब्रिंकमैनशिप तक: ट्रंप 2.0 दौर में कसौटी पर भारत–अमेरिका संबंध

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 01-01-2026
From bonhomie to brinkmanship: India-US relations on the test in the Trump 2.0 era
From bonhomie to brinkmanship: India-US relations on the test in the Trump 2.0 era

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
वर्ष 2025 भारत–अमेरिका संबंधों के लिए विरोधाभासों से भरा रहा। सार्वजनिक मंचों पर नेताओं की गर्मजोशी और साझेदारी के दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर व्यापार विवाद, रणनीतिक तालमेल की कमी और नीतिगत अनिश्चितता लगातार उभरती रही। दोनों देशों ने रिश्तों को “विशेष” बताते रहना जारी रखा, लेकिन साल भर की घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि द्विपक्षीय संबंध गंभीर दबाव में हैं।
 
कभी साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और दीर्घकालिक रणनीतिक हितों पर आधारित माने जाने वाले भारत–अमेरिका रिश्ते 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बदलती प्राथमिकताओं और अनिश्चित रुख से प्रभावित नजर आए। रिश्तों की निकटता के दावों के बीच मतभेद छुपाए नहीं छुपे।
 
राष्ट्रपति ट्रंप के 20 जनवरी को पद संभालने के कुछ ही हफ्तों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 12 फरवरी को वॉशिंगटन यात्रा को संबंधों को स्थिर करने और सकारात्मक एजेंडा तय करने की कोशिश के तौर पर देखा गया। इस दौरान द्विपक्षीय व्यापार समझौते को पुनर्जीवित करने और व्यापार बढ़ाने पर चर्चा हुई, जिससे कुछ समय के लिए उम्मीदें जगीं। हालांकि यह आशावाद ज्यादा दिन टिक नहीं सका।
 
यूक्रेन–रूस युद्ध को लेकर अमेरिकी प्रशासन के पहले 100 दिनों में ठोस समाधान न दे पाने से वैश्विक भू-राजनीतिक माहौल बदला और इसका असर भारत–अमेरिका संबंधों पर भी दिखा। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव अधिक स्पष्ट होने लगा।
 
अगर कुछ साल पीछे जाएं तो तस्वीर बिल्कुल अलग थी। सितंबर 2019 में ह्यूस्टन के ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी ने 50 हजार से अधिक लोगों को एक साथ संबोधित किया था। उस समय व्यक्तिगत गर्मजोशी और राजनीतिक तालमेल का प्रदर्शन हुआ था। ट्रंप ने भारत को करीबी मित्र बताया था, वहीं पीएम मोदी ने उन्हें “व्हाइट हाउस में सच्चा मित्र” कहा था। लेकिन 2025 तक आते-आते वह दौर पीछे छूट चुका था।
 
अगस्त 2025 में व्यापार तनाव खुलकर सामने आया, जब अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत तक के टैरिफ लगा दिए। यह कदम प्रतीकात्मक मित्रता से सीधे टकरावपूर्ण व्यापार नीति की ओर बदलाव का संकेत था। इसके पीछे व्यापार असंतुलन, घरेलू राजनीतिक दबाव और बातचीत के अलग-अलग तरीकों को वजह माना गया।