मिसाल-बेमिसालः कैंसर विजेता फरीदा ने कोरोना को भी दी मात, शुरू किए पांच स्टार्टअप

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  [email protected] • 2 Years ago
कैंसर विजेता फरीदा हैं बेमिसाल मिसाल
कैंसर विजेता फरीदा हैं बेमिसाल मिसाल

 

नीलम गुप्ता/ लखनऊ

कोरोना की दूसरी लहर में जब चारों तरफ लोग बेहाल अस्पतालों की तरफ दौड़ रहे थे, महंगे इलाज ने लोगों की जेबे खाली कर दी थीं, और जो अस्पताल में नहीं थे, वे भी रोजगार से हाथ धो बैठे थे, ऐसे में लखनऊ महिला सेवा ट्रस्ट ने अपनी सदस्य बहनों को बेकरी की ट्रेनिंग दिलवाई.

ट्रेनिंग लेने के बाद वे बन बनाती और सरकारी अस्पतालों में जहां गरीब लोग बैठे होते उन्हें बेहद सस्ते दामों पर दे देतीं. इससे उन लोगों को बहुत कम दाम में खाने को मिल जाता और इन बहनों का खर्च निकल आता. जिससे वे अपने घर में बच्चों के लिए कुछ खाने के वास्ते ले आतीं. ट्रस्ट की अध्यक्ष फरीदा जलीस कहती हैं, ‘अब हमने कई और बहनों को भी बेकरी का प्रशिक्षण दिलवा दिया है. ‘जीविका बेकर्स’ नाम से अब यह उनका अपना स्टार्ट अप बन गया है. जिसमें वे बेकरी का कई तरह का सामान बना कर बेच रही हैं. इनमें अधिकतर वे बहने हैं जो कोरोना की दूसरी लहर में बेरोजगार हो गईं या फिर उनके परिवार में कमाने वाला कोई भी नहीं बचा.’

फरीदा जलीस के नेतृत्व में 1988में स्थापित महिला सेवा ट्रस्ट, लखनऊ इस समय उत्तर प्रदेश के 14जिलों में गरीब पर स्वरोजगार कामगार महिलाओं के साथ काम कर रही है और इस समय पूरे राज्य में उसकी डेढ़ लाख से भी ज्यादा सदस्य हैं.

सेवा, अहमदाबाद की आनुषंगिक इकाई होते हुए भी ट्रस्ट अपने आप में स्वतंत्र इकाई है. बेहद मजबूत इच्छाशक्ति वाली फरीदा ने कैंसर को तो मात बहुत साल पहले ही दे दी थी. कोरोना का भी उन्होंने उतनी ही हिम्मत से सामना किया और बिना समय गंवाए हर पल वे अपनी सदस्य बहनों से जुड़ी रहकर उन्हें हर संभव आत्मनिर्भर बनाती रही. उन्होंने कोरोना काल की हर आपदा को अवसर में बदला. उसी का नतीजा है कि कोरोना काल में शुरू किए एक दो नहीं बल्कि पांच नए स्टार्टअप उनके संगठन व बहनों को और मजबूती दे रहे हैं.

वे कहती हैं, “मार्च में जब कोरोना की दूसरी लहर शुरू हुई तो पहले तो किसी से कोई संपर्क ही नहीं हो पा रहा था. फिर जैसे-जैसे दूरदराज के गांवों से संपर्क होने लगा तो पता चला कि बहनों को इस बीमारी और उसके इलाज के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है. लगा कि इन्हें व इनके परिवारों को जागरूक करना जरूरी है. उन्हें दवाइंयों की मदद भी चाहिए. तीसरा हमें यह भी समझ आ रहा था कि कोरोना का असर लंबे समय तक रहने वाला है. ऐसे में जरूरी है कि हमारे पास अपनी स्वास्थ्य टीम हो.”

तब इन्होंने सेवा, अहमदाबाद से संपर्क कर उन्हें अपनी जरूरत बताई. उन्होंने जागरूकता संबंधी बनाई गई सामग्री और कुछ दवाइयों की किट भिजवा दीं. वह कहती है, “हमने पहले तो अपनी कुछ बहनों को स्थानीय डाक्टरों से जागरूकता संबंधी एक ट्रेनिंग दिलवाई. ऑक्सीमीटर, ग्लूकोमीटर, बीपी और सुगर की मशीन से जांच, कंस्ट्रेटर उस समय के सभी जरूरी उपकरणों को चलाना सिखाया.”

हर जगह से उनके पास आक्सीजन की मांग आ रही थी. गांवों में बिना इलाज और बिना ऑक्सीजन के लोग मर रहे थे. तब बहुत से लोगों से उन्होंने संपर्क किया. उनके काम का ही असर था कि पहले ही दिन उन्हें 50कंस्ट्रेटर मिल गए. आज उनके पास कुल 53कंस्ट्रेटर हैं.

जीविका बेकर्स व स्वाथ्य केंद्रों के बाद एक ओर स्टार्टअप रहा किचन गार्डन का. फरीदा के अनुसार,दूसरी लहर में बेरोजगारी बहुत बढ़ गई थी. बहुत-सी बहनों के पास खाने के लिए भी कुछ नहीं रहा, पैसा भी हाथ में नहीं. राशन की किट में उन्हें गेंहू या चावल ही मिल रहा था. सभी के हालात इतने खराब थे कि किसी से कुछ मांगा नहीं जा सकता था. फिर उनसे कहा कि अपने घरों में रखे खाली डिब्बों, बाल्टियों आदि में धनिया उगा लो. कुछ नहीं तो उसकी चटनी के साथ ही बच्चों को रोटी खिला सकती हो. गांवों में भी जिन बहनों के पास अपने घर के बाहर खाली जमीन थी, उन्होंने धनिए के अलावा भी कुछ सब्जियां लगा लीं. आज बहुत सी बहनें लौकी, तोरई, भिंडी, धनिया, पुदीना आदि उगाकर अपने घर का खर्च निकाल रही है.

फरीदा कहती हैं-कोरोना की पहली लहर में भी हमारे दो स्टार्टअप रहे. एक, डिजिटल लिटरेसी और दूसरा मार्केटिंग मैनेजर. वे कहती हैं- हमारी अधिकतर बहनें गरीब, निरक्षर व ऐसे इलाकों में रहने वाली हैं जहां नेटवर्क कनेक्टिविटी भी नहीं मिलती. मार्च 2020में लॉकडाउन के बाद चारों तरफ हालात बेहद खराब हो गए थे. धीरे-धीरे संपर्क करना शुरू किया तो पता चला कि किसी के पास कोई  काम नहीं है और सरकार की तरफ से मिल रहा राशन भी हर किसी के पास नहीं पहुंच रहा. तब सबसे पहले तो सभी छोटे-छोटे व्हाट्स ग्रुप्स को मिला एक बड़ा ग्रुप बनाया. मुझे भी आगेवान (कामगार बहनों के समूह की लीडर) बहनों से जो कहना होता इसी में कहती. इससे जानकारी के साथ-साथ कौन किस स्थिति में है यह जानना आसान हो गया.

फरीदा कहती हैं-‘मेरी चिंता यह भी थी कि इस लॉकडाउन में अपनी बहनों के लिए ऐसा क्या किया जाए कि उनके हाथ में इतना पैसा आ जाए कि वे पास की दुकान से सामान खरीद कर अपने बच्चों का पेट भर सकें. सरकार की राशन किट में तो चावल व गेहूं ही मिल रहे थे. रमजान लग चुका था. मैंने लोगों से अपील की कि बहुत से लोग भूख से परेशान हैं ऐसे में वे अपनी जकात की राशि उनके लिए दान में दें. करीब 40हजार रुपए हाथ में आ गए.

मैंने रायबरेली, बाराबंकी, फिरोजाबाद व लखनऊ में अपनी अति गरीब सदस्य बहनों को दो दो हजार रुपए दिए और उनसे कहा कि वे इनसे चाय, दाल नमक जैसे रसोई के सामान की छोटी-छोटी पुड़िया बनाकर अपने आसपास के लोगों को बेच दें. इनकी कीमत 10-15रुपए से ज्यादा न हो. कारण उस समय काम किसी के पास भी नहीं था और न ज्यादा सामान खरीदने के लिए पैसे.

कर्फ्यू लगा होने के कारण लोग बाजार भी नहीं जा सकते थे. उन्होंने अपने बच्चों की रफ कापियां और बेकार किताबें फाड़कर पुड़ियां बनाईं और घर घर जाकर बेचने लगीं. जब देखा कि लोग खरीद रहे हैं तो फिर जो पैसा हाथ में आया था उसी से और माल खरीदा और बेचती रहीं.

हर रोज रोजा खजूर से खोला जाता है. पर उस समय खजूर कहां से लाते. मैंने बहनों से मीठे और नमकीन शक्करपारे बनाकर बेचने के लिए कहा. वे भी बिकने लगे. पता लगने पर लोग खुद ही घर आकर ले जाने लगे. तीसरा काम मास्क बनाने का किया. हमारी बहुत सी बहनें चिकन व जरदोजी के अलावा खादी का काम भी कर रही थीं. पर अब सब बंद था. उनका ही सुझाव आया कि क्यों न मास्क बनाए जाएं. पर वे थ्री लेयर चाहिए थे. इतना कपड़ा और धागा कहां से आए. कुछ जानकार टेलर्स से फोन पर बात की. वे कर्फ्यू में परमिशन लेकर अपनी दुकानों पर गए और कई किलो कतरने हमें दे दीं. बिना पैसे के. बहनों ने मास्क बना कर बेचने शुरू किए. व्हाट्सएप पर मैसेज डाल देतीं. जहां से भी आर्डर आता पहुंचा देती. कई संस्थाओं ने बांटने के वास्ते लिए. बहुत से खुद उन्होंने ही मुफ्त भी बांटे.

बाद में फिरोजाबाद से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने कुछ बड़े आर्डर भी दिए जो उन्होंने पूरे किए. लॉकडाउन के प्रोटोकोल्स को पूरा करते हुए इतना काम कर ले जाना आसान नहीं था पर उन्होंने पूरो जीवट के साथ यह किया.’

फरीदा का आगे कहना था सामान बनाकर बेचने का काम इन सभी महिलाओं ने पहली बार किया था. अन्यथा वे चिकन, जरदोजी जैसे काम की करीगर हैं जिन्हें दुकानदार माल दे देते हैं और वे काम पूरा करके अपने पैसे ले आती हैं. कोरोना ने उन्हें सिखाया कि अपना माल बनाकर कैसे बेचा जाता है. उस समय की सभी आगेवान बहनें आज बाजार को समझने लगी हैं और कइयों ने चाय नाश्ते का अपना काम शुरू कर दिया है. दुकानों पर से उन्हें जरदोजी, चिकन का काम अभी भी नहीं मिल रहा है. ऐसे में कोरोना ने उन्हें नया हुनर दे दिया है. सेवा के अंदर अब वे मार्केटिंग मैनेजर व मास्टर ट्रेनर हो गई हैं.

अपने काम व बहनों के प्रति प्रतिबद्धता से कोरोना जैसे विकट काल में भी फरीदा ने अपनी डेढ़ लाख से भी ज्यादा बहनों को न केवल अपने साथ जोड़े रखा, उन्हें हर पल यह महसूस करवाया कि वह उनके साथ है. और यह उन्होंने तब भी किया जब दूसरी लहर में कोरोना ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया था और करीब 22 दिन वे आॅक्सीजन पर थीं. जैसे ही पता चला कि उन्हें कोरोना हो गया है, अपने संयुक्त परिवार वाले घर को छोड़ वे दफ्तर के पास खाली पड़े अपने भाई के घर में आ गईं. आक्सीजन कम हो जाने के बाद जब बोलने की क्षमता भी घटने लगी तब भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपने पति जलीस अहमद को बतातीं रहीं कि फोन पर वे बहनों से क्या कहें. करीब डेढ़ महीना उनके पति ही उनके निर्देशों के अनुसार स्टाफ व बहनों से संपर्क में रहे.

दूसरी लहर में जिस तरह कोरोना ने लोगों को लीला, कैंसर ग्रस्त फरीदा ने अपनी इच्छा शक्ति से कोरोना जैसी जानलेवा खौफनाक बिमारी को भी ंमात दे दी. आॅक्सीजन हट जाने के बाद अपने इसी घर के एक कमरे को दफ्तर बना लिया और वहीं से सारा काम काज देखने लगीं. उनकी बहुत सी बहनें जो कोरोना से पहले टीम लीडर या कहें कि आगेवान थीं आज वे मास्टर ट्रेनर हैं. उनकी इसी कर्मठता, लगन, सेवाभाव व अपने काम व बहनों के प्रति प्रतिबद्धता का नतीजा है कि ‘राइजिंग बियॉन्ड सीलिंग पब्लिकेशन’ ने उन्हें उन सौ मुस्लिम महिलाओं की सूचि में शामिल किया है जो अपने-अपने क्षेत्र में लीक से हट कर काम कर रही हैं.