शम्पी चक्रवर्ती पुरकायस्थ
पूर्वी भारत की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक नारा बहुत तेजी से गूँज रहा है- "अंग, बंग और कलिंग"। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नारे को तब प्रमुखता दी जब वे पूर्वी भारत के एक बड़े हिस्से में भाजपा के विस्तार की बात कर रहे थे। ऐतिहासिक रूप से देखें तो 'अंग' यानी बिहार, 'बंग' यानी बंगाल और 'कलिंग' यानी ओडिशा न केवल हमारी भौगोलिक पहचान रहे हैं, बल्कि ये सत्ता के सबसे बड़े केंद्र भी रहे हैं। भाजपा का सपना हमेशा से इस त्रिकोण को अपना मजबूत किला बनाने का रहा है। आज जब बंगाल विधानसभा चुनाव 2026के नतीजे सामने आ रहे हैं, तो ऐसा लग रहा है कि यह सपना हकीकत में बदलने के करीब है।
सत्ता का नया समीकरण और रुझानों की गूँज
आज की मतगणना के जो शुरुआती रुझान सामने आ रहे हैं, वे चौकाने वाले हैं। ये महज कुछ सीटों की जीत-हार नहीं है, बल्कि पूर्वी भारत की राजनीति में एक बहुत बड़े बदलाव की आहट है। भाजपा फिलहाल बहुमत के जादुई आंकड़े 148से काफी ऊपर चल रही है।
दूसरी ओर, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के लिए ये नतीजे किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। टीएमसी पिछले 15सालों से राज्य की सत्ता पर काबिज है। लेकिन इस बार हवा का रुख कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा है। अगर ये रुझान नतीजों में तब्दील होते हैं, तो बंगाल में पहली बार भाजपा की सरकार बनना तय है। यह जीत न केवल बंगाल के लिए, बल्कि पूरे पूर्वी भारत के राजनीतिक पुनर्गठन के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी।

ऐतिहासिक चुनाव और तनावपूर्ण मुकाबला
साल 2026का यह चुनाव कई मायनों में अलग और ऐतिहासिक रहा। चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूचियों में किए गए बड़े बदलावों ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं। इसकी वजह से राजनीतिक पारा पहले से ही चढ़ा हुआ था। मतदान दो चरणों में, 23और 29अप्रैल को हुआ।
फाल्टा जैसी कुछ जगहों पर दोबारा मतदान की स्थिति ने इस मुकाबले को और भी रोमांचक बना दिया था। इस बार बंगाल की जनता के सामने सिर्फ दो पार्टियां नहीं थीं। यह लड़ाई थी संगठन की ताकत, विकास के दावों और सामाजिक समीकरणों के बीच। सबसे ऊपर थी जनता के मन में उठ रही 'परिवर्तन' की वह प्रबल इच्छा, जो अक्सर लंबे शासन के बाद दिखाई देती है।
'परिवर्तन' के चेहरे को ही मिली चुनौती
साल 2011का वह दौर याद कीजिए जब ममता बनर्जी ने 'परिवर्तन' का नारा देकर वामपंथ के 34साल पुराने किले को ढहा दिया था। लेकिन आज नियति का चक्र देखिए, खुद ममता बनर्जी को ही उसी 'परिवर्तन' की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
कभी ममता के सबसे खास सिपहसालार रहे सुभेंदु अधिकारी आज भाजपा के सबसे बड़े सेनापति बनकर उभरे हैं। नंदीग्राम से शुरू हुई यह रार अब भवानीपुर और पूरे बंगाल की गलियों तक पहुँच चुकी है। सुभेंदु के आक्रामक तेवरों ने यह साफ कर दिया कि भाजपा इस बार सिर्फ कुछ सीटें जीतने नहीं, बल्कि बंगाल की कमान संभालने के इरादे से उतरी है।
भूगोल बदलता भगवा रंग
उत्तर बंगाल से लेकर जंगलमहल तक और सीमावर्ती जिलों से लेकर दक्षिण बंगाल के मैदानों तक, भाजपा की बढ़त हर तरफ दिखाई दे रही है। यह इस बात का सबूत है कि बंगाल का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदलने वाला है। शहरी इलाकों में संगठन का विस्तार और ग्रामीण क्षेत्रों में ध्रुवीकरण भाजपा के काम आया।
साथ ही केंद्र सरकार की योजनाओं का जमीन पर पहुँचना और विपक्षी वोटों का एकमुश्त भाजपा की तरफ मुड़ना उसके लिए संजीवनी साबित हुआ। 2021में भाजपा 77सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बनी थी। लेकिन 2026में वह इस आधार को सरकार बनाने की दहलीज तक ले आई है। यह पूर्वी भारत में भाजपा की अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी मानी जा रही है।
द्विध्रुवीय राजनीति का उदय
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 'अंग, बंग और कलिंग' महज एक चुनावी जुमला नहीं था। यह भाजपा की एक बहुत सोची-समझी और लंबी रणनीति का हिस्सा था। इस रणनीति के तीन मुख्य स्तंभ थे: बिहार में अपना प्रभाव बनाए रखना, ओडिशा में सत्ता हासिल करना और बंगाल में ममता बनर्जी के अभेद्य दुर्ग को भेदना। बंगाल में अगर सत्ता बदलती है, तो इसका असर सीधे राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा। पश्चिम बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं है, यह देश की सांस्कृतिक और रणनीतिक राजधानी जैसा महत्व रखता है।
इस चुनाव ने एक और बात साफ कर दी है। बंगाल में अब वाम मोर्चा और कांग्रेस जैसी पुरानी ताकतें हाशिए पर जा चुकी हैं। बंगाल की राजनीति अब पूरी तरह से दो हिस्सों में बंट गई है— एक तरफ तृणमूल कांग्रेस और दूसरी तरफ भाजपा। वामपंथ का जो कभी गढ़ हुआ करता था, वह अब इतिहास के पन्नों में सिमट गया है। अब सीधी टक्कर एक क्षेत्रीय शक्ति और एक अखिल भारतीय पार्टी के बीच है। यह बदलाव बंगाल के राजनीतिक चरित्र को एक नई दिशा दे रहा है।

क्या इतिहास रचने को तैयार है बंगाल?
लोकतंत्र में जब तक आखिरी वोट की गिनती नहीं हो जाती, कुछ भी कहना जल्दबाजी होती है। बंगाल की कई सीटों पर अंतिम दौर में बड़े उलटफेर का इतिहास रहा है। इसलिए भाजपा की इस बढ़त के बावजूद अभी सावधानी जरूरी है
। लेकिन रुझानों का जो बड़ा संदेश है, वह साफ है। बंगाल एक नए युग की दहलीज पर खड़ा है। यदि भाजपा की सरकार बनती है, तो यह केवल 15साल पुराने टीएमसी शासन का अंत नहीं होगा। यह नरेंद्र मोदी के उस सपने की हकीकत होगी जहाँ बंगाल अब एक अलग द्वीप नहीं रहेगा, बल्कि देश की मुख्यधारा की राजनीति का एक मजबूत स्तंभ बनेगा।
जनता ने अपना फैसला ईवीएम में दर्ज कर दिया है। अंतिम नतीजे क्या होंगे, यह बस कुछ घंटों की बात है। लेकिन इतना तो तय है कि इस बार बंगाल में बदलाव की जो लहर उठी है, वह केवल नारों तक सीमित नहीं है। यह लहर इतिहास लिखने के लिए तैयार दिख रही है। अगर बंगाल में भगवा सरकार आती है, तो 'अंग, बंग, कलिंग' का सपना पूरी तरह साकार हो जाएगा और पूर्वी भारत में राजनीति का एक नया अध्याय शुरू होगा।