निकुंज नाथ
असम की राजनीति में आज एक नया इतिहास रचा जा रहा है। सुबह आठ बजे जब मतपेटियां खुलीं तो साथ ही कई बड़े चेहरों की किस्मत का फैसला भी बाहर आने लगा। शुरुआती रुझानों ने साफ कर दिया है कि राज्य की जनता ने एक बार फिर स्थिरता और विकास के नाम पर मुहर लगाई है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन लगातार तीसरी बार सत्ता की दहलीज पर खड़ा है। यह न सिर्फ भाजपा के लिए एक बड़ी उपलब्धि है बल्कि असम की राजनीति में एक दुर्लभ हैट्रिक भी साबित होने वाली है।
सत्ता का नया समीकरण और एनडीए का दबदबा
असम की 126विधानसभा सीटों पर आज सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच मतगणना शुरू हुई। पहले दौर की गिनती के बाद ही भाजपा और उसके सहयोगियों ने 57सीटों पर निर्णायक बढ़त बना ली। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी बढ़त को पार पाना विपक्ष के लिए नामुमकिन सा है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में लड़ा गया यह चुनाव पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में झुकता नजर आ रहा है।
असम की जनता ने इस बार साफ संदेश दिया है। धेमाजी से रोनोज पेगु और गोलाघाट से एजीपी के अतुल बोरा भारी मतों से आगे चल रहे हैं। न्यू गुवाहाटी में भाजपा के डिप्लर्जन शर्मा ने भी अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। वहीं जगीरोड में पीयूष हजारिका और नलबाड़ी में जयंतमल्ला बरुआ की बढ़त ने भाजपा कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया है। ये सभी नेता पार्टी के स्तंभ माने जाते हैं और इनकी जीत गठबंधन की नींव को और मजबूत कर रही है।
दिग्गजों की विदाई और कांग्रेस का संकट
इस चुनाव की सबसे बड़ी खबर कांग्रेस के खेमे से आ रही है। कई दशकों तक असम की राजनीति पर राज करने वाले बड़े नाम इस बार हाशिए पर नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के गौरव गोगोई की स्थिति नाजुक बनी हुई है। वह जोरहाट सीट पर भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी से कड़ा मुकाबला कर रहे हैं। भूपेन बोरा जिन्होंने चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था वे भी मुश्किलों में घिरे हैं।
विपक्ष के लिए यह चुनाव किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा। लुरिंज्योति गोगोई और मनोरंजन तालुकदार जैसे कद्दावर नेता हार की कगार पर खड़े हैं। नंदिता गरलोचा और मीरा बरठाकुर जैसी मुखर महिला नेताओं के पीछे हटने से कांग्रेस की रणनीति पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। यह हार कांग्रेस के लिए सिर्फ सीटों का नुकसान नहीं है बल्कि राज्य में उनके नेतृत्व की साख पर भी गहरी चोट है।
वीआईपी सीटों का रोमांचक मुकाबला
असम की पांच विशेष सीटों पर सबकी निगाहें टिकी थीं। जलुकबारी सीट पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने अपना दबदबा कायम रखा है। यह उनका अभेद्य किला साबित हुआ है। दूसरी ओर जोरहाट में गौरव गोगोई की साख दांव पर लगी है। उनके पिता तरुण गोगोई का नाम अब शायद उनकी नैया पार लगाने के लिए काफी नहीं रहा।
एआईयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल के लिए भी यह चुनाव अग्निपरीक्षा जैसा है। बिनकंडी सीट पर इस बार त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है। एनडीए के शाहबुद्दीन मजूमदार और एजेपी के रेजाउल करीम चौधरी ने अजमल को कड़ी चुनौती दी है। एआईयूडीएफ इस बार अकेले मैदान में उतरी थी लेकिन रुझान बताते हैं कि उनका पुराना जादू अब फीका पड़ रहा है। खासकर बराक घाटी में वोटों का बिखराव पार्टी के लिए घातक साबित हुआ है।
दल-बदल और निर्दलीयों का प्रभाव
दिसपुर निर्वाचन क्षेत्र में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा। भाजपा ने प्रद्युत बरदोलोई को अपना उम्मीदवार बनाया था। बरदोलोई चुनाव से पहले ही कांग्रेस छोड़कर आए थे। इस फैसले से नाराज होकर पुराने भाजपा नेता जयंत कुमार दास निर्दलीय मैदान में उतर गए। उनके साथ मीरा बरठाकुर गोस्वामी की मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया। इस सीट के रुझान बता रहे हैं कि जनता अब केवल पार्टी के नाम पर नहीं बल्कि चेहरे और काम के आधार पर वोट दे रही है।
दक्षिणी असम की मांडिया सीट पर भी हाई-प्रोफाइल ड्रामा जारी है। अब्दुल खालिक और शेरमन अली जैसे नेता अपनी साख बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ढिंग सीट पर महबूब मुख्तार ने रायज दल की ओर से उतरकर सभी समीकरणों को बिगाड़ दिया है। नई पीढ़ी के उम्मीदवारों ने इस बार पुराने नेताओं की नींद उड़ा दी है।
बीटीआर और भविष्य की राजनीति
बोरोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र यानी बीटीआर में चुनावी जंग ने आखिरी क्षणों में नया मोड़ ले लिया है। भाजपा की सहयोगी यूपीपीएल अपनी जमीन बचाने की कोशिश में जुटी है। वहीं हाग्रामा मोहिलारी के नेतृत्व वाली बीपीएफ फिर से अपनी वापसी के लिए संघर्ष कर रही है। बीटीआर के नतीजे यह तय करेंगे कि नई सरकार में किसका पलड़ा कितना भारी रहेगा।
राज्य में जेनरेशन जेड के उम्मीदवारों का उदय भी एक बड़ी खबर है। ज्ञानश्री बोरा और कुंकी चौधरी जैसे युवा चेहरों ने चुनाव प्रचार में जिस तरह की ऊर्जा दिखाई उसने पुराने नेताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। असम की राजनीति अब बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है।
कुल मिलाकर 2026 के ये चुनाव असम के भविष्य की दिशा तय करने वाले हैं। पुराने दिग्गजों का पतन और नए चेहरों का उभरना इस बात का संकेत है कि जनता अब नई उम्मीदों की तलाश में है। भाजपा की संभावित जीत ने यह साफ कर दिया है कि विकास और हिंदुत्व का एजेंडा फिलहाल राज्य में सबसे ऊपर है। आधी रात तक सभी आधिकारिक नतीजे आने की उम्मीद है। तभी यह स्पष्ट होगा कि अगले पांच वर्षों तक असम की बागडोर किसके हाथ में होगी। पर फिलहाल के रुझानों ने तो दिसपुर की सत्ता का रास्ता साफ कर दिया है।