अशर आलम | नई दिल्ली
उत्तराखंड के कोटद्वार शहर में घटी एक घटना इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर आम जनचर्चा तक का विषय बनी हुई है। वजह है—एक आम नागरिक की असाधारण हिम्मत, जिसने नफरत से भरे माहौल में खड़े होकर इंसानियत और भारतीय एकता का परिचय दिया। यह घटना उस समय सामने आई जब कोटद्वार के एक व्यस्त बाज़ार में स्थित एक मुस्लिम दुकानदार को उसकी दुकान के नाम को लेकर कथित तौर पर डराने और घेरने की कोशिश की गई। लेकिन तभी बीच में आए एक स्थानीय युवक के शब्दों ने माहौल ही बदल दिया— “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।”
दशकों पुरानी दुकान और अचानक उठा विवाद
कोटद्वार में “बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर” नाम की यह दुकान शोएब अहमद और उनका परिवार पिछले कई दशकों से चला रहा है। इलाके में यह दुकान एक भरोसेमंद नाम रही है और स्थानीय लोग इसे अच्छी तरह जानते हैं। हालांकि इस सप्ताह अचानक यह दुकान विवादों में आ गई, जब कथित तौर पर एक दक्षिणपंथी संगठन से जुड़े कुछ युवाओं ने दुकान के नाम में “बाबा” शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि किसी मुस्लिम मालिक वाली दुकान का ऐसा नाम नहीं होना चाहिए।
Location: Kotdwar, Uttarakhand
— The Muslim (@TheMuslim786) January 28, 2026
My name is Mohammad Deepak. Don't bring up Hindu-Muslim issues here.
Members of the Bajrang Dal asked an elderly Muslim shopkeeper, who runs his shop under the name "Baba," to change the name of his shop. When a man named Mohammed Deepak… pic.twitter.com/TEKcBzfj0Q
बहस से तनाव तक: बिगड़ते हालात
शुरुआत में मामला सिर्फ़ मौखिक बहस तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे माहौल तनावपूर्ण होने लगा। दुकानदार शोएब अहमद और उनके बेटे को घेर लिया गया। बात बढ़ने पर उनके बुज़ुर्ग पिता वकील अहमद को भी सामने लाया गया और उनसे न सिर्फ़ दुकान के नाम, बल्कि उसे रखने के “अधिकार” पर भी सवाल किए जाने लगे। आवाज़ें ऊंची होने लगीं, भीड़ बढ़ती चली गई और हालात ऐसे बन गए जहाँ किसी भी वक्त स्थिति बेकाबू हो सकती थी।
तभी सामने आया एक आम नागरिक : दीपक कुमार
ऐसे संवेदनशील माहौल में, जहाँ अक्सर लोग चुप रहना ही बेहतर समझते हैं, वहीं एक स्थानीय युवक ने तमाशबीन बने रहने से इनकार कर दिया। दीपक कुमार, पेशे से जिम ट्रेनर और कोटद्वार के ही निवासी, भीड़ के बीच आगे आए। उन्होंने न सिर्फ़ आक्रामक युवाओं के तर्कों पर सवाल उठाए, बल्कि उन्हें यह भी याद दिलाया कि मुसलमान इस देश के बराबर के नागरिक हैं। जब उनसे पूछा गया कि वह आखिर हैं कौन, तो उनका जवाब नफरत की सोच पर सीधा प्रहार था-“मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।”
एक वाक्य, और बिखर गई भीड़
दीपक का यह बयान किसी धर्म विशेष का दावा नहीं था, बल्कि उस सोच को तोड़ने की कोशिश थी जो नाम और पहचान के आधार पर इंसानों को बाँटती है। कुछ ही पलों में जो भीड़ उग्र होती जा रही थी, वह तितर-बितर हो गई। दीपक के साथ उनके दोस्त विजय रावत भी मौजूद थे, जिन्होंने पूरे घटनाक्रम में संयम बनाए रखने में मदद की।
— Ilyas (@Ilyas_SK_31) January 31, 2026
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
इस पूरी घटना का वीडियो किसी ने रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर अपलोड कर दिया। वीडियो तेज़ी से वायरल हुआ और देखते ही देखते देशभर के लोगों की प्रतिक्रिया सामने आने लगी। हिंदू और मुस्लिम—दोनों समुदायों के नेटिज़न्स ने दीपक की बहादुरी, संवेदनशीलता और भारतीयता की भावना की जमकर तारीफ़ की। कई मुस्लिम यूज़र्स ने मांग की कि दीपक को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए।
अब हालात सामान्य, परिवार सुरक्षित
घटना के बाद शोएब अहमद ने कहा कि इलाके में अब स्थिति पूरी तरह सामान्य है और उनके परिवार को किसी तरह का तत्काल खतरा नहीं है। हालांकि पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी, लेकिन शांति और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए परिवार ने मामले को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया।
वकील अहमद ने उन सभी स्थानीय लोगों का आभार जताया जो उनके समर्थन में खड़े हुए और कहा कि कोटद्वार हमेशा से सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल रहा है।
— Mohd Shadab Khan (@VoxShadabKhan) January 31, 2026
दीपक की अपील: नफरत नहीं, एकता चुनिए
घटना के बाद दीपक कुमार ने एक वीडियो संदेश जारी कर लोगों से नफरत छोड़कर एकता के लिए खड़े होने की अपील की। उन्होंने कहा— “धर्म के नाम पर लोगों को निशाना बनाना देश के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है। पहचान से पहले इंसानियत आनी चाहिए।”
क्यों खास है कोटद्वार की यह घटना?
उत्तराखंड ही नहीं, पूरे भारत में धार्मिक तनाव और धमकियों की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं। लेकिन कोटद्वार की यह घटना इसलिए अलग है, क्योंकि यहाँ चर्चा किसी टकराव की नहीं, बल्कि एक आम नागरिक की हिम्मत की है—जिसने डर के बजाय साहस और चुप्पी के बजाय इंसानियत को चुना। यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि कभी-कभी इतिहास बदलने के लिए किसी बड़े पद या ताकत की नहीं, बल्कि सही समय पर बोले गए एक सच्चे वाक्य की ज़रूरत होती है।