सूरजकुंड मेला : मुस्लिम कारीगरों की उम्मीदों से सजा शिल्प उत्सव

Story by  दयाराम वशिष्ठ | Published by  [email protected] | Date 01-02-2026
Surajkund Fair: A craft festival adorned with the hopes of Muslim artisans.
Surajkund Fair: A craft festival adorned with the hopes of Muslim artisans.

 

दयाराम वशिष्ठ | सूरजकुंड (हरियाणा)

हरियाणा के सूरजकुंड में आयोजित सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला का 39वां संस्करण इस बार सिर्फ़ रंगों, शिल्प और संस्कृति का उत्सव नहीं, बल्कि हज़ारों कारीगरों की उम्मीदों, संघर्षों और सपनों का भी आईना बनकर सामने आया है। खासतौर पर मुस्लिम शिल्पकारों और कारीगरों में इस मेले को लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। रोज़गार, पहचान और हुनर को नए बाज़ार से जोड़ने की आस में बड़ी संख्या में कारीगर सूरजकुंड पहुंचे हैं,कुछ के हाथ में स्टॉल की चाबी है, तो कुछ अब भी इंतज़ार की डोर थामे हुए हैं।

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मेले के परिसर में कदम रखते ही यह साफ़ महसूस होता है कि सूरजकुंड अब सिर्फ़ एक मेला नहीं, बल्कि भारतीय हस्तशिल्प की अंतरराष्ट्रीय राजधानी बन चुका है। इस बार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले से कहीं अधिक भागीदारी देखने को मिल रही है। भारत के कोने-कोने से आए शिल्पकारों के साथ-साथ विदेशी कलाकारों की मौजूदगी ने मेले को वैश्विक रंग दे दिया है। बनारस, कश्मीर, पानीपत, सहारनपुर जैसे पारंपरिक शिल्प केंद्रों से आए कारीगर यहां अपने हुनर को पहचान दिलाने की उम्मीद से जुटे हैं। इनमें बड़ी संख्या उन मुस्लिम कारीगरों की है, जो दिल्ली के प्रहलादपुर, खानपुर और आसपास के इलाकों में किराए पर रहकर स्टॉल मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

बनारस से आए शमीम की आंखों में संतोष और उम्मीद दोनों साफ़ झलकते हैं। उन्हें इस बार स्टॉल मिल गया है और वे इसे अपनी मेहनत की जीत मानते हैं। शमीम बताते हैं कि उन्होंने साल 2000 में पहली बार सूरजकुंड मेले में हिस्सा लिया था। “तब यहां सब कुछ कच्चा-कच्चा सा था, चमक भी फीकी थी। लेकिन आज सूरजकुंड पूरी तरह बदल चुका है। सजावट भव्य है, व्यवस्थाएं बेहतर हैं और ग्राहकी पहले से कहीं ज़्यादा,” वे कहते हैं। पहले ही दिन अच्छी भीड़ देखकर शमीम को भरोसा है कि इस बार कारोबार भी बेहतर रहेगा। उनका मानना है कि सूरजकुंड अब शिल्पकारों के लिए सिर्फ़ बिक्री का मंच नहीं, बल्कि स्थायी पहचान का ज़रिया बन गया है।

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हालांकि, हर चेहरे पर मुस्कान नहीं है। बनारस से शूट, फैब्रिक और साड़ियों का पारंपरिक काम लेकर आए करीब सौ शिल्पकारों में से कई अब भी स्टॉल के इंतज़ार में हैं। माइकल, अबु उरेल, सद्दाम और जावेद जैसे कारीगर बताते हैं कि उनका यह काम पीढ़ियों से चला आ रहा है। “हमने सिलाई, कढ़ाई और बुनाई का हुनर अपने बाप-दादा से सीखा है,” वे कहते हैं। लेकिन स्टॉल न मिलने की मायूसी उनके शब्दों में झलकती है। कई कारीगर दिल्ली के प्रहलादपुर में कई दिनों से किराए पर रह रहे हैं, इस उम्मीद में कि कभी भी स्टॉल अलॉट हो जाएगा और उनकी मेहनत रंग लाएगी।

कश्मीर से आए बसीम का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है। वे पहले दो बार सूरजकुंड मेले में स्टॉल लगा चुके हैं, लेकिन इस बार अब तक उन्हें जगह नहीं मिल पाई है। तीन दिन पहले ही वे दिल्ली के खानपुर में किराए पर आए हैं। “उम्मीद है कि कल तक स्टॉल मिल जाएगा,” बसीम कहते हैं। इसी तरह पानीपत से आए नौसाद समेत कई कारीगर हाथ में फाइलें और आंखों में उम्मीद लिए मेला परिसर में अधिकारियों के चक्कर लगाते नज़र आते हैं।

मेले का पहला दिन शिल्पकारों के लिए तैयारी और जमावट का दिन भी रहा। कई स्टॉल अभी पूरी तरह खुल नहीं पाए हैं। कारीगर अपना सामान सहेजने, सजाने और व्यवस्थित करने में जुटे हैं। वहीं विदेशों से आए शिल्पकार पूरी तैयारी के साथ अपने-अपने पवेलियन में मौजूद हैं, जो मेले को अंतरराष्ट्रीय पहचान देते हैं।
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इस बार सूरजकुंड मेले में कजाकिस्तान की पारंपरिक कला और संस्कृति खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। कजाकिस्तान से आईं अलाइदारोवा आइदाना अपने देश के प्रसिद्ध ऊनी जूते, पारंपरिक वस्त्र और प्राकृतिक रंगों से सजे हस्तनिर्मित उत्पाद लेकर आई हैं। उनके स्टॉल पर उमड़ती भीड़ यह बताती है कि भारतीय दर्शक पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों के प्रति कितने संवेदनशील हो रहे हैं। आइदाना बताती हैं कि कजाकिस्तान में ऊन से बने जूते और कपड़े वहां की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा हैं, खासकर ठंडे इलाकों में। “हम किसी भी तरह के रासायनिक रंगों का इस्तेमाल नहीं करते। पौधों, फूलों और मिट्टी से तैयार प्राकृतिक रंग ही हमारी पहचान हैं,” वे कहती हैं।

उनके ऊनी जूतों की खासियत यह है कि वे हल्के, मज़बूत और लंबे समय तक चलने वाले होते हैं। कपड़ों पर की गई पारंपरिक कढ़ाई में कजाक संस्कृति के प्रतीक और लोककथाओं की झलक साफ़ दिखाई देती है। आइदाना के मुताबिक, हर डिज़ाइन का अपना अर्थ होता है,जो परिवार, प्रकृति और खुशहाली से जुड़ा होता है। भारतीय दर्शकों की प्रतिक्रिया से वे बेहद उत्साहित हैं। “यहां के लोग हस्तनिर्मित चीज़ों की कद्र करते हैं। कई लोग हमारे जूतों और शॉल्स को फैशन के तौर पर भी पसंद कर रहे हैं,” वे बताती हैं।

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सूरजकुंड मेला ऐसे ही संवादों और सांस्कृतिक सेतु का मंच बनता जा रहा है। कजाकिस्तान के अलावा जॉर्डन और सूडान जैसे देशों के कलाकार भी अपनी-अपनी संस्कृति और कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्टॉल्स पर उमड़ती भीड़ यह संकेत देती है कि लोग आधुनिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत को भी अपनाने के लिए तैयार हैं।

कुल मिलाकर, सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला इस बार उम्मीद और इंतज़ार, खुशी और संघर्ष,सभी भावनाओं का संगम बन गया है। मुस्लिम कारीगरों की बढ़ती भागीदारी यह साबित करती है कि कला और हुनर किसी धर्म या पहचान की मोहताज नहीं होती। यह मेला न सिर्फ़ शिल्प को बाज़ार देता है, बल्कि कारीगरों को सम्मान, संवाद और आत्मनिर्भरता की राह भी दिखाता है। सूरजकुंड की यही खूबी है—यहां हर स्टॉल के पीछे एक कहानी है, हर कारीगर के हाथ में सिर्फ़ उत्पाद नहीं, बल्कि उसकी पीढ़ियों की मेहनत और भविष्य की उम्मीदें सजी होती हैं।