आवाज द वाॅयस/अजमेर
राजस्थान के अजमेर शरीफ में हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह एक बार फिर प्रेम, इंसानियत और रूहानी संगीत का केंद्र बनी। यहां विश्व प्रसिद्ध ‘फन्ना फि अल्लाह सूफी कव्वाली’ समूह ने पारंपरिक सूफी कलाम पेश किए। कव्वाली की महफिल में देश विदेश से आए जायरीन और श्रद्धालु शामिल हुए। इस मौके पर 55 सदस्यों का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद था। इनमें अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण पूर्व एशिया समेत दुनिया के अलग अलग हिस्सों से आए लोग शामिल थे।
दरगाह में हुई इस महफिल ने कई लोगों को भावुक कर दिया। प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों ने कहा कि वे यहां एक यात्रा के उद्देश्य से आए थे, लेकिन दरगाह के आध्यात्मिक वातावरण और कव्वाली के अनुभव ने उनके दिलों पर गहरा असर छोड़ा। उनके लिए यह केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि सूफी परंपरा, आध्यात्मिक शांति और इंसानी रिश्तों को करीब से समझने का अवसर भी बना।
ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह सदियों से विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और देशों के लोगों को आकर्षित करती रही है। यहां आने वाले जायरीन अपनी अपनी आस्था के साथ दुआ करते हैं। दरगाह की पहचान केवल धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा, सद्भाव और इंसानियत के साझा संदेश के रूप में भी है।
अजमेर शरीफ में सजी रूहानी कव्वाली की महफिल
‘फन्ना फि अल्लाह सूफी कव्वाली’ समूह ने ताहिर हुसैन फरीदी कव्वाल के नेतृत्व में अपनी प्रस्तुति दी। समूह ने अल्लाह की याद, पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान और चिश्ती सूफी परंपरा के बुजुर्गों की प्रशंसा में पारंपरिक कलाम पेश किए।
हारमोनियम की धुन, तबले की थाप और सामूहिक गायन ने महफिल को खास रंग दिया। कव्वाली की प्रस्तुति के दौरान श्रद्धालु पूरी तल्लीनता के साथ कलाम सुनते रहे। इस महफिल में अलग अलग देशों से आए लोगों की मौजूदगी ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया।
सूफी कव्वाली भारतीय उपमहाद्वीप की एक महत्वपूर्ण संगीत परंपरा है। इसमें संगीत के माध्यम से ईश्वर के प्रति प्रेम, आत्मिक समर्पण और इंसान के भीतर मौजूद अहंकार को कम करने का संदेश दिया जाता है। चिश्ती सिलसिले में कव्वाली का विशेष स्थान रहा है। दरगाहों में होने वाली ऐसी महफिलें सदियों से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभव से जोड़ती आई हैं।
अजमेर शरीफ की इस महफिल में भी संगीत ने भाषा और राष्ट्रीयता की सीमाओं से परे लोगों को एक साथ बैठने का अवसर दिया। यही सूफी परंपरा की खासियत है। यहां संदेश को समझने के लिए किसी खास भाषा या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का होना जरूरी नहीं है।
कौन हैं ताहिर हुसैन फरीदी कव्वाल?
ताहिर हुसैन फरीदी कव्वाल ‘फन्ना फि अल्लाह सूफी कव्वाली’ समूह के प्रमुख गायक हैं। वह हारमोनियम भी बजाते हैं और समूह का नेतृत्व करते हैं। उनके साथ कलाकारों की एक टीम पारंपरिक सूफी संगीत को अलग अलग देशों के दर्शकों तक पहुंचाने का काम करती है।
समूह में काश कलंदर तबला बजाने के साथ गायन करते हैं। लाली कलंदर और सलीम चिश्ती गायन तथा तालियों के माध्यम से प्रस्तुति में योगदान देते हैं। अबरार हुसैन तबला, गायन और तालियों की जिम्मेदारी संभालते हैं। चेतन रामलू हारमोनियम और गायन में साथ देते हैं, जबकि अजीज अब्बाटीलो सूफी घूमर नृत्य के जरिए प्रस्तुति को एक अलग रंग प्रदान करते हैं।
समूह से जुड़ी जानकारी के अनुसार, इसके कलाकारों ने दक्षिण एशिया की कव्वाली परंपरा के अनुभवी उस्तादों के मार्गदर्शन में दो दशकों से अधिक समय तक प्रशिक्षण लिया है। इस दौरान उन्होंने पारंपरिक कव्वाली की गायकी, संगीत की बारीकियों और सूफी कलाम की प्रस्तुति की शैली को सीखा।
समूह ने उत्तरी अमेरिका, यूरोप, एशिया और अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों में अपनी प्रस्तुतियां दी हैं। इसका उद्देश्य सूफी दरगाहों के संगीत और आध्यात्मिक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय श्रोताओं तक पहुंचाना है। समूह के अब तक दस एल्बम भी जारी हो चुके हैं।
अजमेर शरीफ में इसकी प्रस्तुति इसी व्यापक संगीत यात्रा का हिस्सा रही। यहां कलाकारों को उस दरगाह में कव्वाली पेश करने का अवसर मिला, जिसका नाम चिश्ती सूफी परंपरा और हिंदुस्तान की आध्यात्मिक विरासत के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है।
55 सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल का स्वागत
इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू 55 सदस्यों वाले वैश्विक प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी रही। इसमें अलग अलग देशों से आए यात्री, उनके परिवार और मित्र शामिल थे। उनके लिए अजमेर शरीफ की यात्रा भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को करीब से देखने का अवसर बनी।
दरगाह अजमेर शरीफ के गद्दीनशीन और चिश्ती फाउंडेशन के चेयरमैन हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया। उन्होंने सभी के लिए दुआ की और पारंपरिक दस्तारबंदी के माध्यम से सम्मानित किया।
दस्तारबंदी सूफी और दक्षिण एशियाई परंपराओं में सम्मान प्रकट करने का एक जाना पहचाना तरीका है। इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों को दरगाह की परंपरा के अनुसार शुभकामनाएं और आशीर्वाद दिए गए।
इस मुलाकात ने मेहमानों को दरगाह की धार्मिक परंपराओं और सूफी संस्कृति को समझने का अवसर दिया। अजमेर शरीफ में आने वाले विदेशी जायरीन के लिए यह अनुभव खास महत्व रखता है, क्योंकि यहां धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय रीति रिवाज और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत भी देखने को मिलती है।
शादी से पहले ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पहुंचे आंद्रे
इस यात्रा का एक भावनात्मक पहलू आंद्रे और उनकी होने वाली जीवनसंगिनी से जुड़ा रहा। दोनों भारत में इसी सप्ताह होने वाली अपनी शादी से पहले ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पर दुआ करने पहुंचे थे।
नए जीवन की शुरुआत से पहले आशीर्वाद लेने की यह परंपरा कई परिवारों और श्रद्धालुओं के लिए भावनात्मक महत्व रखती है। आंद्रे और उनकी मंगेतर ने भी अपनी नई जिंदगी के लिए दुआ की।
हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने इस जोड़े के लिए विशेष प्रार्थना की। उन्होंने उनके वैवाहिक जीवन में खुशहाली, आपसी प्रेम और जीवनभर साथ निभाने की कामना की।इस प्रसंग ने दरगाह की उस परंपरा को भी सामने रखा, जिसमें लोग अपने जीवन के महत्वपूर्ण अवसरों पर दुआ करने आते हैं। किसी की शादी हो, परिवार की खुशी हो या जीवन में किसी नई शुरुआत का मौका, जायरीन दरगाह पर पहुंचकर अपनी उम्मीदों और भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
आंद्रे और उनकी मंगेतर की यात्रा ने इस बात को भी रेखांकित किया कि अजमेर शरीफ केवल किसी एक समुदाय या देश के लोगों का धार्मिक स्थल नहीं है। इसकी ओर दुनिया के विभिन्न हिस्सों से लोग आकर्षित होते हैं।
They came as seekers. They left as ambassadors of peace. The sacred courtyard of Dargah Ajmer Sharif echoed with divine love as the world-renowned Fanna-Fi-Allah Sufi Qawwali @fannafiallah , led by Tahir Hussain Faridi Qawwal, offered their sublime renditions before thousands of seeking hearts at the threshold of Khwaja Gharib Nawaz(r). They were joined by 55 global travellers, family and friends from the USA, Europe, Australia, Southeast Asia and beyond. Many lands, many languages, one longing. In every Haq, in every clap, hearts melted into remembrance of the Beloved. Haji Syed Salman Chishty, Gaddi Nashin of Dargah Ajmer Sharif, welcomed them all with love, prayers and the timeless blessings of this 800-year-old home of mercy. A special joy filled the gathering, as Andre and his bride-to-be had come to seek the blessings of Gharib Nawaz before their wedding in India this week. 💍 Inshallah, May Nazr e Karam of Khwaja Sahab shine upon their union with love, faith and lifelong companionship, and may their home always be filled with peace and barakah. Qawwali is not a performance here. It is a prayer that dissolves the self until only love remains. May they all carry the fragrance of Ajmer Sharif to every corner of the world. Love Towards All, Malice Towards None.
— Haji Syed Salman Chishty (@sufimusafir) October 27, 2026
हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने दिया प्रेम और शांति का संदेश
हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने इस अवसर पर कहा कि आठ सौ वर्षों से अधिक समय से ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह के दरवाजे हर इंसान के लिए खुले रहे हैं। यहां आने वाले लोगों से उनका धर्म, देश या भाषा पूछकर भेदभाव नहीं किया जाता।
उन्होंने कहा कि दुनिया के अलग अलग हिस्सों से आए लोग जब एक साथ बैठकर ईश्वर की याद में शामिल होते हैं, तो यह सूफी परंपरा की मूल भावना को सामने लाता है। उनके अनुसार, कव्वाली केवल संगीत की प्रस्तुति नहीं है। यह ऐसी आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है, जो इंसान को अपने अहंकार से ऊपर उठकर प्रेम और समर्पण की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिनिधिमंडल के सदस्य यहां तीर्थयात्रियों के रूप में आए थे, लेकिन इस अनुभव के बाद वे अपने अपने देशों में शांति और सद्भाव का संदेश लेकर लौटेंगे।उनके संदेश का मूल भाव था कि इंसान को दूसरों से प्रेम करना चाहिए और किसी के प्रति बैर नहीं रखना चाहिए। यह विचार चिश्ती सूफी परंपरा की उस विरासत से जुड़ा है, जिसमें मानव सेवा, विनम्रता, सहिष्णुता और सभी के प्रति सम्मान को महत्वपूर्ण माना गया है।
ख्वाजा गरीब नवाज की विरासत और अजमेर शरीफ की पहचान
हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती को भारत में चिश्ती सूफी सिलसिले के सबसे महत्वपूर्ण बुजुर्गों में गिना जाता है। उन्हें गरीब नवाज के नाम से भी जाना जाता है। उनकी दरगाह राजस्थान के अजमेर शहर में स्थित है और यहां हर साल बड़ी संख्या में भारतीय तथा विदेशी जायरीन पहुंचते हैं।
ख्वाजा गरीब नवाज की शिक्षाओं को आम तौर पर प्रेम, करुणा, जरूरतमंदों की मदद और इंसानियत की सेवा से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि अजमेर शरीफ की पहचान धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में भी बनी है।
दरगाह में होने वाली कव्वाली की महफिलें इस विरासत का अहम हिस्सा हैं। यहां प्रस्तुत होने वाले कलाम केवल सुनने का अनुभव नहीं देते, बल्कि सूफी विचारधारा और आध्यात्मिक जीवन के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराते हैं।
‘फन्ना फि अल्लाह सूफी कव्वाली’ समूह की हालिया प्रस्तुति और 55 सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी ने इसी परंपरा को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।इस आयोजन ने दिखाया कि संगीत, आस्था और सांस्कृतिक अनुभव लोगों के बीच संवाद के रास्ते खोल सकते हैं। अलग अलग देशों से आए लोगों ने एक ही महफिल में बैठकर सूफी कलाम सुने और आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव किया।
अजमेर शरीफ की इस कव्वाली महफिल का संदेश भी यही रहा कि दुनिया की विविधताओं के बीच प्रेम और इंसानियत के लिए जगह हमेशा बनी रहनी चाहिए। ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह की ऐतिहासिक पहचान इसी विचार से जुड़ी है। यहां आने वाले जायरीन अपने साथ केवल यात्रा की यादें नहीं, बल्कि सद्भाव, विनम्रता और मानवता के प्रति सम्मान का संदेश भी लेकर लौटते हैं।