जयपुर के झाड़ू शाह बाबा: सादगी, खिदमत और भाईचारे की अनूठी मिसाल

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 29-10-2026
Jaipur’s Jhadu Shah Baba: A Unique Example of Simplicity, Service, and Brotherhood
Jaipur’s Jhadu Shah Baba: A Unique Example of Simplicity, Service, and Brotherhood

 

फरहान इसराइली/ जयपुर

राजस्थान की राजधानी जयपुर में मोती डूंगरी रोड और अल्बर्ट हॉल के बीच स्थित हज़रत हाफिज अब्दुर्रहीम शाह रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह आज भी अकीदत, सादगी और इंसानियत की एक खास पहचान बनी हुई है। आम लोग उन्हें प्यार और एहतराम से झाड़ू शाह बाबा के नाम से जानते हैं। इस नाम के पीछे सफाई, विनम्रता और खिदमत से जुड़ी एक दिलचस्प परंपरा है।

 कहा जाता है कि बाबा अपनी दरगाह और आसपास के इलाके में खुद झाड़ू लगाकर सफाई किया करते थे। उनके लिए सफाई केवल एक काम नहीं, बल्कि सादगी और आत्मसंयम से जुड़ी जिंदगी का हिस्सा थी। जयपुर की इस दरगाह पर आज भी बड़ी संख्या में जायरीन पहुंचते हैं।

यहां आने वालों में मुस्लिम समुदाय के साथ हिंदू श्रद्धालु भी शामिल हैं। बाबा की जिंदगी, उनकी धार्मिक साधना और लोगों के साथ उनके रिश्तों की कहानी आज भी स्थानीय लोगों के बीच सम्मान के साथ सुनाई जाती है।

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सीतापुर से शुरू हुआ रूहानी सफर

दरगाह के सज्जादानशीन और मुतवल्ली काजी शेख असरार उल हक के मुताबिक, हज़रत हाफिज अब्दुर्रहीम शाह का जन्म वर्ष 1863 में उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के लहरपुर कस्बे में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि धार्मिक शिक्षा में थी। वे पढ़ाई में तेज थे और कम उम्र में ही हाफिज ए कुरआन बन गए थे। कुरआन को कंठस्थ करने और उसे सही ढंग से पढ़ने में उनकी विशेष पहचान थी।

लहरपुर में हज़रत मजा शाह रहमतुल्लाह अलैह के आस्ताने से भी उनका गहरा जुड़ाव था। बताया जाता है कि वे वहां लंबे समय तक हाजिरी देते और इबादत में वक्त गुजारते थे। उनकी कुरआन पढ़ने की क्षमता इतनी मशहूर थी कि बड़े बड़े हाफिज भी उनसे अपनी गलतियां दुरुस्त करवाते थे। शब ए कद्र के मौके पर होने वाली शबीना में एक ही रकअत के दौरान पूरा कुरआन सुनाने का जिक्र भी उनकी विशेष पहचान के रूप में किया जाता है।

काजी शेख असरार उल हक बताते हैं कि हाफिज अब्दुर्रहीम बाद में लहरपुर से लखीमपुर खीरी जिले के कुकरा पहुंचे। वहां उन्होंने दादा मियां के नाम से मशहूर हज़रत शेख असालत मियां रहमतुल्लाह अलैह से बैअत की और उनसे खिलाफत हासिल की। इस तरह उनका रूहानी सफर आगे बढ़ा। कुछ समय बाद उन्हें अजमेर शरीफ जाने का निर्देश मिला। इसके बाद वे ख्वाजा गरीब नवाज रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह पहुंचे और करीब चार दशक तक अजमेर में रहे।

कैसे पड़ा झाड़ू शाह बाबा नाम?

हज़रत हाफिज अब्दुर्रहीम शाह को झाड़ू शाह बाबा के नाम से क्यों पुकारा जाने लगा, इस बारे में कई बातें कही जाती हैं। काजी शेख असरार उल हक के अनुसार, यह लकब उन्हें ख्वाजा गरीब नवाज से मिला था। हालांकि, इस नाम के पीछे की वास्तविक वजह के बारे में वे कोई पक्की जानकारी होने का दावा नहीं करते।

उनका अनुमान है कि बाबा कभी कभी अपने गले में झाड़ू डालकर चला करते होंगे। संभव है कि ऐसा वे अपने भीतर विनम्रता बनाए रखने और तकब्बुर तथा गुरूर से दूर रहने के लिए करते हों। लेकिन काजी साहब स्पष्ट करते हैं कि यह उनका निजी अंदाजा है। बाबा ने खुद कभी इस बारे में कोई बात नहीं बताई।

उनकी जिंदगी का यह पहलू आज भी लोगों का ध्यान खींचता है। आमतौर पर धार्मिक हस्तियों की पहचान उनके इल्म, इबादत और आध्यात्मिक शिक्षाओं से होती है। झाड़ू शाह बाबा के नाम के साथ जुड़ी सफाई और सादगी की परंपरा उन्हें एक अलग पहचान देती है। दरगाह की सफाई खुद करना इस बात की याद दिलाता है कि समाज में किसी काम को छोटा नहीं समझना चाहिए। सेवा और विनम्रता इंसान के व्यक्तित्व को खास बनाती हैं।

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अजमेर से जयपुर तक का सफर

वर्ष 1947 में झाड़ू शाह बाबा अजमेर से जयपुर आए। यहां शुरुआत में उन्होंने कुरैशियान मस्जिद के पास एक पुराने मकान में ठिकाना बनाया। काजी शेख असरार उल हक के मुताबिक, मकान की हालत काफी खराब थी। एक दिन बाबा ने वहां मौजूद सभी लोगों को बाहर निकलने के लिए कहा। जैसे ही लोग बाहर आए, मकान की छत गिर गई। बताया जाता है कि उसकी कुछ दीवारें आज भी उसी हालत में मौजूद हैं।

इसके बाद बाबा ने कुछ समय हाजी इमामुद्दीन के मकान में गुजारा। फिर वे काजी शेख असरार उल हक के परिवार के घर में रहने लगे। इन सभी जगहों पर उनके साथ हाजी अनवार उल हक मौजूद रहे। वे बाबा की सेवा में हमेशा तत्पर रहते थे।

वर्ष 1963 में जब झाड़ू शाह बाबा हज के लिए रवाना हुए, तब हाजी अनवार उल हक उन्हें मुंबई तक छोड़ने गए। इसके बाद बाबा उन्हें हाजी बंबई कहकर पुकारने लगे। यह संबोधन दोनों के बीच गहरे अपनत्व और विश्वास का प्रतीक बन गया। काजी शेख असरार उल हक के मुताबिक, बाबा ने अपने जीवनकाल में ही हाजी अनवार उल हक को खिलाफत दी और अपना जानशीन नियुक्त किया था।

एक परिवार से जुड़ी यादें

काजी शेख असरार उल हक के लिए झाड़ू शाह बाबा केवल एक बुजुर्ग सूफी संत नहीं थे। उनका परिवार बाबा से गहराई से जुड़ा रहा। काजी साहब बताते हैं कि उनके परिवार में पहले लड़के पैदा होने के बाद जीवित नहीं रह पाते थे। जब उनके वालिद हाजी अनवार उल हक बाबा की सेवा में आए, तो उनकी दुआओं के बाद परिवार में दो बेटों का जन्म हुआ। काजी साहब उनमें सबसे बड़े हैं।

उनके मुताबिक, उनका नाम भी झाड़ू शाह बाबा ने ही रखा था। कुरआन की तालीम देने और उसे याद कराने की शुरुआत भी बाबा ने ही करवाई। इस तरह बाबा का रिश्ता उनके परिवार से केवल पीर और मुरीद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई पीढ़ियों की यादों का हिस्सा बन गया।

हज़रत झाड़ू शाह बाबा का विसाल 4 फरवरी 1968 को हुआ। काजी शेख असरार उल हक के मुताबिक, उस समय उनकी उम्र करीब 105 वर्ष थी। आखिरी वक्त में भी हाजी अनवार उल हक उनके पास मौजूद थे। वर्ष 1947 में जयपुर आने से लेकर विसाल तक दोनों का साथ बना रहा। काजी साहब उस समय केवल 11 वर्ष के थे।

बाबा के इंतकाल के बाद हाजी अनवार उल हक दरगाह के पहले सज्जादानशीन और मुतवल्ली बने। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही अपने बेटे काजी शेख असरार उल हक को नायब सज्जादानशीन नियुक्त कर दिया था। वर्ष 1973 में हाजी अनवार उल हक के इंतकाल के बाद काजी साहब ने यह जिम्मेदारी संभाली।

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दरगाह और मजारे मुबारक की खास व्यवस्था

काजी शेख असरार उल हक बताते हैं कि जिस स्थान पर आज झाड़ू शाह बाबा का मजारे मुबारक है, उसका चयन बाबा ने खुद किया था। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही वहां तुरबत बनवाई थी और उसमें अनाज दफन करवाया था। उनके अनुसार, यह पूरा इलाका दरगाह कदम रसूल की वक्फ जमीन का हिस्सा है। यहां एक पुराना कब्रिस्तान भी मौजूद है।

दरगाह में मजारे मुबारक की व्यवस्था को लेकर भी खास एहतियात बरती जाती है। काजी साहब के मुताबिक, असल मजार नीचे है और उसके ऊपर जाली लगाई गई है। इसका उद्देश्य बेअदबी और पर्दे से जुड़ी मर्यादाओं का ख्याल रखना है। नीचे जाने की अनुमति आम तौर पर सफाई करने वालों या खास निस्बत रखने वाले लोगों को ही दी जाती है।

इस व्यवस्था के बीच दरगाह पर रोजाना जायरीन की आमद बनी रहती है। लोग फातिहा पढ़ने, दुआ करने और बाबा को याद करने के लिए यहां पहुंचते हैं। जयपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत में इस दरगाह का अपना स्थान है।

तीन दिन तक चलता है बाबा का सालाना उर्स

झाड़ू शाह बाबा का सालाना उर्स इस्लामी कैलेंडर के जिलकादा महीने की 3, 4 और 5 तारीख को मनाया जाता है। इस दौरान दरगाह पर विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उर्स में राजस्थान के अलग अलग इलाकों से जायरीन पहुंचते हैं।

पहले दिन मुशायरे का आयोजन होता है, जिसमें राजस्थान के जाने माने शायर हिस्सा लेते हैं। दूसरे दिन महफिल ए समा सजती है। तीसरे दिन सुबह लंगर बांटा जाता है। शाम को कुल और रंग की रस्म के साथ उर्स का समापन होता है।

काजी शेख असरार उल हक के मुताबिक, उर्स के अवसर पर हजारों लोग दरगाह पहुंचते हैं। आम दिनों में भी सैकड़ों जायरीन हाजिरी देते हैं। यहां आने वालों में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग शामिल होते हैं। यह साझा उपस्थिति दरगाह की सामाजिक पहचान को भी मजबूत करती है।

राजस्थान में सूफी दरगाहें लंबे समय से धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक मेलजोल के केंद्र रही हैं। झाड़ू शाह बाबा की दरगाह भी इसी परंपरा का हिस्सा है। यहां लोगों का आना केवल किसी धार्मिक रस्म तक सीमित नहीं है। कई लोग इसे सुकून, दुआ और आपसी भाईचारे से जुड़ी जगह के रूप में देखते हैं।

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राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों की भी रही आमद

झाड़ू शाह बाबा की दरगाह पर समय समय पर राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र की हस्तियां भी आती रही हैं। काजी शेख असरार उल हक के अनुसार, वर्ष 1971 में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री बरकतुल्लाह खान दरगाह पहुंचे थे। उनके मुताबिक, दरगाह की बाउंड्री का निर्माण भी उसी दौर में उनके सामने करवाया गया था।

इसके अलावा कई विधायक, सांसद और मंत्री भी यहां हाजिरी दे चुके हैं। इनमें पूर्व मंत्री कालीचरण सराफ और जयपुर के पूर्व महापौर मोहनलाल गुप्ता जैसे नाम शामिल हैं। इन लोगों की आमद से पता चलता है कि दरगाह का संबंध केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहींरहा। यह जयपुर के सामाजिक जीवन में भी अपनी जगह रखती है।

करामात से ज्यादा अहमियत सादगी को

झाड़ू शाह बाबा की करामात के बारे में पूछे जाने पर काजी शेख असरार उल हक कहते हैं कि बाबा ने हमेशा खुद को पर्दे में रखा। इसलिए वे भी ऐसे किस्सों को बढ़ा चढ़ाकर सामने नहीं लाना चाहते। हालांकि, वे बताते हैं कि बाबा की जिंदगी में और उनके विसाल के बाद भी कई ऐसे मरीज दरगाह पर लाए गए, जिनके बारे में उनके परिजनों को उम्मीद नहीं रह गई थी। काजी साहब के अनुसार, लोगों ने बाबा की बारगाह में दुआ की और अल्लाह के करम से कुछ मरीजों को सेहत मिली।

इन बातों को दरगाह से जुड़े लोगों की आस्था और निजी अनुभव के रूप में देखा जाना चाहिए। इनके आधार पर किसी बीमारी के इलाज का चिकित्सकीय निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। फिर भी ऐसे अनुभव श्रद्धालुओं के विश्वास का हिस्सा बने हुए हैं।

झाड़ू शाह बाबा की कहानी का सबसे खास पहलू उनका सादगी भरा जीवन है। सीतापुर के लहरपुर से शुरू हुआ उनका सफर अजमेर और फिर जयपुर तक पहुंचा। उन्होंने धार्मिक शिक्षा हासिल की, सूफी परंपरा में अपनी जगह बनाई और अपने आसपास के लोगों के साथ गहरा रिश्ता कायम किया।

उनके नाम से जुड़ी झाड़ू की पहचान आज भी एक संदेश देती है। इंसान की बड़ाई केवल उसके पद, प्रतिष्ठा या शोहरत से नहीं होती। दूसरों की सेवा, अपने काम के प्रति सम्मान और अहंकार से दूरी भी किसी व्यक्ति को लोगों के दिलों में जगह दिला सकती है।

जयपुर की झाड़ू शाह बाबा दरगाह इसी विरासत को आगे बढ़ा रही है। यहां आने वाले जायरीन के लिए बाबा की याद अकीदत का विषय है। वहीं उनकी जिंदगी की कहानी सादगी, खिदमत और सामाजिक सद्भाव की अहमियत को भी सामने लाती है। यही वजह है कि झाड़ू शाह बाबा का नाम आज भी जयपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में सम्मान के साथ लिया जाता है।