बहराइच: जलती कार से जिंदगी खींच लाए मदरसे के तीन मौलाना

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 13-05-2026
Bahraich: Three Madrasa Maulanas Pull a Life from a Burning Car
Bahraich: Three Madrasa Maulanas Pull a Life from a Burning Car

 

आवाज द वाॅयस / बहराइच

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से इंसानियत की एक ऐसी रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी सामने आई है, जिसने समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है और एक उम्मीद की किरण भी दिखाई है। जब नेशनल हाईवे पर मौत तांडव कर रही थी और एक कार आग की लपटों में घिर चुकी थी, तब जहां तमाशबीनों की भीड़ मोबाइल से वीडियो बनाने में मशगूल थी, वहीं पास के एक मदरसे के तीन शिक्षकों ने अपनी जान की बाजी लगाकर जलती गाड़ी से छह लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

यह घटना केवल एक सड़क हादसा नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस अदम्य साहस की, जो मजहब और डर से ऊपर उठकर केवल 'इंसानियत' को अपना धर्म मानता है।
 
मौत का मंजर और तमाशबीन भीड़

सोमवार का दिन था। बहराइच-लखनऊ नेशनल हाईवे पर फखरपुर थाना क्षेत्र के रुकनापुर बाजार के पास जिंदगी अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी। अचानक एक जोरदार धमाके ने इलाके को दहला दिया। बहराइच से लखनऊ की ओर जा रही एक अर्टिगा कार और विपरीत दिशा से आ रही हुंडई कार के बीच आमने-सामने की भीषण टक्कर हो गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि गाड़ियों के परखच्चे उड़ गए।
 
हादसे के कुछ ही पलों बाद हुंडई कार के बोनट से गहरा काला धुआं निकलने लगा। देखते ही देखते कार आग की लपटों में घिर गई। गाड़ी के अंदर घायल यात्री फंसे हुए थे, जो चीख रहे थे और मदद की गुहार लगा रहे थे। हाईवे पर गाड़ियों का तांता लग गया। सैकड़ों लोग जमा हो गए, लेकिन आधुनिक समाज की विडंबना देखिए—वहां मौजूद ज्यादातर लोग अपने मोबाइल फोन निकालकर इस भयानक मंजर का वीडियो बनाने लगे। कोई इस हादसे को रील में कैद कर रहा था, तो कोई सोशल मीडिया पर लाइव था। जलती कार के भीतर तड़पते इंसानों की जान से ज्यादा कीमती लोगों के लिए 'कंटेंट' हो गया था।
 
रक्षक बनकर आए मदरसे के तीन उस्ताद

ठीक उसी वक्त, पास के ही एक मदरसे में पढ़ाने वाले तीन शिक्षक—हाफिज शफीउद्दीन, हाफिज इस्लामुद्दीन और हाफिज शमशुद्दीन—वहां पहुंचे। उन्होंने जब देखा कि कार धू-धू कर जल रही है और भीतर लोग फंसे हैं, तो उन्होंने एक पल की भी देरी नहीं की। उन्हें इस बात का इल्म था कि कार का फ्यूल टैंक कभी भी फट सकता है और उनकी अपनी जान जा सकती है, लेकिन उस वक्त उनके सामने केवल तड़पते हुए लोग थे।
 
भीड़ को चीरते हुए ये तीनों जांबाज जलती कार के पास पहुँचे। आग की तपन इतनी ज्यादा थी कि पास खड़ा होना मुश्किल था, लेकिन हौसला फौलादी था। उन्होंने बारी-बारी से कार के दरवाजे खोलने की कोशिश की और भीतर फंसे घायल यात्रियों-जितेंद्र लाल, मिथिलेश, अमूल्य कुशवाहा, मीना कुशवाहा, अगम्य सिंह और रुद्र प्रताप—को खींचकर बाहर निकालना शुरू किया।
 
मौके पर मौजूद चश्मदीद बताते हैं कि अगर ये तीनों मौलाना वहां न होते, तो शायद कार के अंदर मौजूद लोग जिंदा जल जाते। उन्होंने न केवल घायलों को बाहर निकाला, बल्कि उन्हें सड़क के किनारे सुरक्षित स्थान पर लिटाया और एंबुलेंस के आने तक उन्हें ढांढस बंधाया।
 
इंसानियत ही सबसे बड़ा मजहब

हादसे के बाद जब पुलिस और प्रशासन मौके पर पहुँचा, तब तक ये तीनों नायक अपना काम कर चुके थे। कंडासर चौकी इंचार्ज पीएन पांडे ने अपनी टीम के साथ घायलों को तुरंत कैसरगंज के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) पहुँचाया, जहाँ उनका इलाज चल रहा है। गनीमत रही कि समय पर मदद मिलने से किसी की जान नहीं गई।
 
जब मीडिया ने इन तीनों मौलानाओं से उनकी बहादुरी के बारे में पूछा, तो उनके जवाब ने सबका दिल जीत लिया। हाफिज शफीउद्दीन ने बेहद सादगी से कहा, "हमने कोई बहुत बड़ा काम नहीं किया, बस अपना फर्ज निभाया है। मजहब हमें सिखाता है कि एक इंसान की जान बचाना पूरी इंसानियत को बचाने जैसा है। हमें दुख इस बात का था कि लोग मदद करने के बजाय वीडियो बना रहे थे। कैमरे की रिकॉर्डिंग से ज्यादा जरूरी किसी की सांसें बचाना है।"
 
डिजिटल संवेदनहीनता पर एक तमाचा

बहराइच की यह घटना हमारे आज के समाज का आईना भी है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि किसी की मौत हमारे लिए बस एक 'वायरल वीडियो' का जरिया मात्र रह गई है? तकनीकी तरक्की ने हमें स्मार्ट तो बना दिया, लेकिन शायद हमारे भीतर की संवेदनाएं छीन लीं।
 
ऐसे समय में हाफिज शफीउद्दीन, इस्लामुद्दीन और शमशुद्दीन जैसे लोग समाज की असली पूंजी हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि नफरत और संकीर्णता की खबरों के बीच आज भी इस देश की मिट्टी में भाईचारा और मानवता जिंदा है। सोशल मीडिया पर अब इन तीनों की तस्वीरें वायरल हो रही हैं और लोग इन्हें 'रीयल लाइफ हीरो' कह रहे हैं।
 
पुलिस ने भी इन तीनों शिक्षकों की तारीफ की है और स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन को इनकी इस बहादुरी के लिए इन्हें सम्मानित करना चाहिए। बहराइच का यह हाईवे आज एक ऐसी कहानी का गवाह बना है, जो आने वाले लंबे समय तक लोगों को याद दिलाती रहेगी कि जब दुनिया तमाशा देख रही हो, तब भी कुछ हाथ ऐसे होते हैं जो आग में कूदकर जिंदगी बचा लाते हैं।