पोलियो से जंग जीतकर वर्ल्ड चैंपियन बने गुलफाम अहमद

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 21-06-2026
Para-powerlifter Gulfam Ahmed: From Polio to World Champion
Para-powerlifter Gulfam Ahmed: From Polio to World Champion

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

“हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर सोच मजबूत हो तो कोई भी कमी आपको रोक नहीं सकती।” इसी विचार को जीते हुए एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी सामने आई, जो संघर्ष, हिम्मत और आत्मविश्वास की असली परिभाषा है। यह कहानी है मिस्टर व्हीलचेयर इंडिया वर्ल्ड चैंपियन और पैरा पावरलिफ्टर गुलफाम अहमद की, जिन्होंने अपनी शारीरिक सीमाओं को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें अपनी ताकत में बदल दिया। पोलियो से प्रभावित बचपन, कठिन आर्थिक परिस्थितियाँ और समाज की चुनौतियों के बावजूद उन्होंने न सिर्फ पढ़ाई और जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता बनाया, बल्कि खेल की दुनिया में भारत का नाम भी रोशन किया।

उनकी यह यात्रा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि असली विकलांगता शरीर में नहीं, बल्कि उस सोच में होती है जो हमें आगे बढ़ने से रोकती है। नई दिल्ली/गांधीनगर के मिस्टर व्हीलचेयर इंडिया वर्ल्ड चैंपियन और पावरलिफ्टर गुलफाम अहमद, जिनकी जिंदगी ने यह साबित किया कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, अगर हौसला जिंदा है तो इंसान अपनी किस्मत खुद लिख सकता है।

गुलफाम अहमद एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। बचपन में ही उन्हें पोलियो हो गया था, क्योंकि उनके गांव में समय पर वैक्सीनेशन की सुविधा नहीं पहुँच पाई थी। इस वजह से उनका बचपन सामान्य बच्चों की तरह नहीं बीता। परिवार ने शुरुआती दौर में उनकी स्थिति को देखते हुए यही सोचा कि उन्हें सिलाई-बुनाई या बैठकर किया जाने वाला कोई काम सिखा दिया जाए, ताकि आगे जीवन चल सके। इसी सोच के साथ उनका परिवार दिल्ली आ गया, जहाँ उनके पिता सिलाई का काम करते थे। बचपन में गुलफाम को भी एक सिलाई फैक्ट्री में बैठाया गया, लेकिन न तो उनकी पढ़ाई शुरू हो पाई थी और न ही कोई हुनर विकसित हो पाया था।

उनका बचपन बहुत अलग परिस्थितियों में बीता। वे क्रॉलिंग करके चलते थे और आसपास के बच्चों को स्कूल जाते देखते थे। स्कूल उनके घर के पास ही था, लेकिन उन्होंने कभी पढ़ाई का माहौल नहीं देखा था। एक दिन वे गलती से स्कूल के प्रांगण में चले गए और वहीं से उनकी जिंदगी की दिशा बदल गई।

स्कूल की प्रिंसिपल ने उन्हें देखा और शुरुआत में यह समझा कि वह शायद गलत जगह आ गए हैं। लेकिन जब उनसे बात हुई तो उन्होंने मासूमियत से कहा कि वे भी स्कूल में पढ़ना चाहते हैं। यही पल उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बना। प्रिंसिपल ने उनके परिवार को समझाया और आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद किसी तरह उनकी पढ़ाई की शुरुआत करवाई। तब उनकी उम्र लगभग 8 से 10 साल के बीच थी।

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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बचपन में उनके सपने आम बच्चों जैसे ही थे कभी वे पुलिस बनना चाहते थे, तो कभी टीवी पर शक्तिमान और सलमान खान को देखकर अभिनेता बनने का सपना देखते थे। बाद में उन्होंने जिम जाना शुरू किया और फिल्मों में सलमान खान की फिटनेस से बहुत प्रभावित हुए। यही प्रेरणा आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा आधार बनी।

करीब 15 साल की उम्र में उन्होंने जिम जॉइन किया। घरवालों को यह बात शुरू में पसंद नहीं थी क्योंकि वे चाहते थे कि वह पढ़ाई या सिलाई के काम में लगें। लेकिन जिम में उन्हें समर्थन मिला। ट्रेनर्स ने उन्हें कभी रोका नहीं, बल्कि मुफ्त में ट्रेनिंग देने तक की मदद की। धीरे-धीरे उनकी अपर बॉडी बहुत मजबूत होने लगी क्योंकि वे रोजमर्रा के काम भी हाथों के सहारे करते थे। जिम उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया और वहीं से उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा।

इसी दौरान उन्हें पैरा स्पोर्ट्स और पावरलिफ्टिंग के बारे में पता चला। 2008 में उन्होंने पहली बार नेशनल लेवल पर हिस्सा लिया, और बिना ज्यादा अनुभव के ही जूनियर कैटेगरी में ब्रॉन्ज मेडल जीत लिया। यही वह पल था जब उन्हें लगा कि अब वे सिर्फ सीमाओं में नहीं बंधे हैं। इसके बाद 2010 में सिल्वर और 2011 में ब्रॉन्ज मेडल आया। हालांकि जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई, उनके पिता का कारोबार बंद हो गया और उनकी आंखों की रोशनी भी प्रभावित हुई। ऐसे समय में गुलफाम को बहुत कम उम्र में नौकरी करनी पड़ी और वे कॉल सेंटर में काम करने लगे।

करीब 10 साल तक उन्होंने कॉल सेंटर की नौकरी की, जिससे उनकी खेल यात्रा प्रभावित हुई। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इस बीच 2015 में उन्होंने मॉडलिंग की दुनिया में भी कदम रखा और “मिस्टर व्हीलचेयर इंडिया” का खिताब जीता। उन्होंने कई रैंप शो किए और लोगों को प्रेरित किया, लेकिन भारत में व्हीलचेयर मॉडलिंग को उतना व्यावसायिक समर्थन नहीं मिला जितनी उम्मीद थी, इसलिए उन्हें यह करियर छोड़ना पड़ा। हालांकि इसी दौर में उन्होंने TEDx जैसे मंचों और स्कूल-कॉलेजों में अपने अनुभव साझा करना शुरू किया, जिससे वे एक प्रेरक वक्ता के रूप में भी पहचान बनाने लगे।

2019 के बाद उन्होंने दोबारा पावरलिफ्टिंग में वापसी की। इस दौरान उनका एक पैर का ऑपरेशन भी हुआ, जिससे कुछ समय खेल से दूर रहना पड़ा। 2022 में उनकी मां का निधन हो गया, जो उनके जीवन का सबसे भावनात्मक क्षण था। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर पूरी तरह स्पोर्ट्स पर फोकस करने का निर्णय लिया। 2023 में उनका चयन स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के गांधीनगर सेंटर में हुआ, जहाँ उन्होंने प्रोफेशनल ट्रेनिंग शुरू की। उनके कोच राजेंद्र सिंह, जो द्रोणाचार्य अवॉर्डी हैं, ने उनकी प्रतिभा को निखारने में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद उनकी परफॉर्मेंस लगातार बेहतर होती गई।

2025 में उनका पहला बड़ा इंटरनेशनल ब्रेक आया, जब उन्होंने बीजिंग, चीन में वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया। 59 किलोग्राम कैटेगरी में उन्होंने 151 किलो का लिफ्ट करके ब्रॉन्ज मेडल जीता। यह उनके लिए बेहद गर्व का क्षण था क्योंकि लगभग 17 साल की मेहनत के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का परचम लहराया। इसके बाद उन्होंने मिस्र और बैंकॉक में भी हिस्सा लिया और जापान में होने वाले आगामी एशियन गेम्स के लिए क्वालिफाई किया, जहाँ उन्होंने ओपन टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल भी हासिल किया।

उनकी यात्रा सिर्फ खेल तक सीमित नहीं है। वे मानते हैं कि सोशल मीडिया, खासकर Instagram, आज के समय में प्रेरणा फैलाने का सबसे बड़ा माध्यम है। वे चाहते हैं कि उनकी कहानी अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे, ताकि कोई भी व्यक्ति अपनी शारीरिक या मानसिक कमजोरी को अपनी सीमा न माने। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि कंटेंट साफ-सुथरा, सकारात्मक और शिक्षाप्रद होना चाहिए, क्योंकि इंटरनेट पर नकारात्मक टिप्पणियाँ भी मिलती हैं।

गुलफाम अक्सर यह संदेश देते हैं कि असली विकलांगता शरीर में नहीं, बल्कि सोच में होती है। वे उदाहरण देते हैं कि अगर इंसान के पास सोचने की शक्ति है, तो वह किसी भी कमी को अपनी ताकत बना सकता है। वे यह भी कहते हैं कि जीवन में गिरना बुरा नहीं है, क्योंकि हर गिरावट हमें अपनी क्षमता पहचानने का मौका देती है। वे एक प्रेरक उदाहरण के रूप में Albert Einstein का भी उल्लेख करते हैं, यह समझाने के लिए कि अगर सोच मजबूत हो तो इंसान बिना किसी शारीरिक बाधा के भी दुनिया बदल सकता है।

गुलफाम अहमद का मानना है कि उन्होंने जो भी हासिल किया है, वह संघर्ष, अनुशासन और आत्मविश्वास का परिणाम है। वे भविष्य में खेल के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र में भी काम करना चाहते हैं, ताकि अपने जैसे शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण लोगों और उन सभी लोगों को प्रेरित कर सकें जो छोटी-छोटी असफलताओं से हार मान लेते हैं। उनकी कहानी यह सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर इंसान अपने भीतर विश्वास जगा ले तो वह दुनिया के किसी भी मंच पर अपनी पहचान बना सकता है।

लफाम अहमद ने पैरा पावरलिफ्टिंग और प्रेरणादायक उपलब्धियों के क्षेत्र में लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है। उनके खेल करियर की शुरुआत 2008 में हुई, जब उन्होंने 10वीं सीनियर एवं 5वीं जूनियर नेशनल पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीता। इसके बाद उन्होंने लगातार प्रगति करते हुए 2010 में बेंगलुरु में आयोजित 5वीं पैरा नेशनल गेम्स में सिल्वर मेडल, 2010 में ही 3rd दिल्ली स्टेट पैरा पावरलिफ्टिंग गेम्स में गोल्ड मेडल और 2011 में 11वीं सीनियर एवं जूनियर नेशनल पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप तथा 4th दिल्ली स्टेट पैरा पैरालंपिक मीट में सिल्वर मेडल हासिल किया। 2012 में उन्होंने 5th दिल्ली स्टेट पैरा पैरालंपिक मीट में गोल्ड मेडल जीता और इसके बाद भी उनका प्रदर्शन लगातार मजबूत होता गया।

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2017 में 9th दिल्ली स्टेट पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल, 2018 में 10th दिल्ली स्टेट पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल, 2021 में 18वीं नेशनल पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप और 5th दिल्ली स्टेट पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल, 2022 में 19वीं नेशनल पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल, 2023 में 20वीं नेशनल पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप और खेलो इंडिया पैरा गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल, साथ ही दिल्ली स्टेट पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया।

2024 में उन्होंने 21वीं नेशनल पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी निरंतरता को और मजबूत किया। 2025 उनके करियर का महत्वपूर्ण वर्ष रहा, जिसमें उन्होंने 22वीं नेशनल पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप और 2nd खेलो पैरा गेम्स में गोल्ड मेडल जीता, साथ ही बीजिंग वर्ल्ड कप पैरा पावरलिफ्टिंग (चीन) में ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। इसी वर्ष उन्होंने मिस्र के काहिरा में आयोजित वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी भाग लिया। 2026 में उन्होंने अपने प्रदर्शन को और ऊँचाई पर पहुँचाते हुए दिल्ली स्टेट पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल, 23rd नेशनल पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल और जापान के क्योटो चैलेंज कप में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान को और मजबूत किया।

खेल उपलब्धियों के साथ-साथ गुलफाम अहमद को कई प्रतिष्ठित सम्मान भी प्राप्त हुए हैं, जिनमें 2018 के दौरान Pride of Delhi, Gem of Nation Award, Humanity Achievers Award, Vandey Mataram Motivational Award, Meri Delhi Arpita Shine Award, Award of Achievement, The Legend Award of India और Model at I Am Special Calendar शामिल हैं। वर्ष 2019 में उन्हें Asian Achievers Award और United Nations द्वारा Karamveer Chakra से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त 2020 में उन्हें Bhartiye Gaurav Award और 2023 में Dr. Batra Health Positive Award प्राप्त हुआ।

उनकी यह उपलब्धियों की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि निरंतर मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ कोई भी व्यक्ति अपने संघर्ष को सफलता में बदल सकता है और राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक अपनी पहचान बना सकता है। गुलफ़ाम ने आवाज द वॉयस से कहा कि आप गिरते हैं, उठते हैं, सीखते हैं और आगे बढ़ते हैं... मैं अपनी जिंदगी इसी उसूल पर जीता हूँ। मैंने इतनी मुश्किलों के बावजूद खुद को टूटने नहीं दिया शायद इसके पीछे यही विचार काम करता है।  

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