भक्ति चालक / पुणे
मशहूर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और सामाजिक कार्यकर्ता हुसैन मन्सूरी ने एक बार फिर अपने काम से समाज के सामने एक मिसाल पेश की है। उन्होंने हाल ही में पुणे की'प्रेरणा एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड्स' संस्था के कुछ नेत्रहीन लोगों से मुलाक़ात की। इस मुलाक़ात के दौरान उन्होंने जिस अपनापन और मोहब्बत का इज़हार किया, उसे देखकर कई लोगों का दिल भर आया।
हुसैन मन्सूरी के काम को चाहने वालों की तादाद बहुत बड़ी है। उनके इसी काम को देखकर पुणे में पढ़ाई करने वाले आशीष गोरथकर अपने चार दोस्तों के साथ उनसे मिलने मुंबई आए थे। आशीष ने इस मुलाक़ात का अनुभव'आवाज़ द वॉइस मराठी' से बात करते हुए बेहद भावुक शब्दों में बयां किया।
आशीष तुकाराम गोरथकर मूल रूप से नांदेड़ ज़िले की नायगांव तहसील के टेंभुर्णी गांव के रहने वाले हैं। वे फ़िलहाल पुणे के एसपी कॉलेज में दूसरे साल की पढ़ाई कर रहे हैं। आशीष ने अपनी मुलाक़ात का क़िस्सा बताते हुए कहा, "हम कुल 5 लोग काम के सिलसिले में मुंबई गए थे। साथ ही हमें हुसैन सर से भी मिलना था। मुंबई पहुंचने पर हम वेटिंग हॉल में रुके थे। वहीं से हमने हुसैन सर को फ़ोन लगाया। ख़ास बात यह है कि फ़ोन करने के महज़ 2-3 मिनट के अंदर सर हमसे मिलने वहां पहुंच गए।"

प्यार से खिलायाखाना
हुसैन मन्सूरी वहां पहुंचे और उन्होंने सबकी ख़ैरियत पूछी। आशीष ने कहा, "सर के आने पर उन्होंने सबसे पहले बड़े अपनापन से हमारा हाल-चाल जाना। चूंकि हम ख़ास उनसे मिलने गए थे, तो उन्हें बहुत ख़ुशी हुई। मुलाक़ात के थोड़ी देर बाद ही मन्सूरी सर ने हमारे खाने का इंतज़ाम किया। हमने उनसे कहा कि हमारा खाना हो चुका है, फिर भी उन्होंने हमें खाना खाने की ज़िद की। उन्होंने प्यार से हमारे लिए खाना मंगवाया और हमें खिलाया भी।"
बातचीत के दौरान हुसैन मन्सूरी ने सबकी परेशानियों को समझा। उन्होंने आशीष और उनके दोस्तों से खुलकर बात की। आशीष क्या करता है, उसकी पढ़ाई क्या चल रही है, इसकी जानकारी ली। इस बारे में आशीष बताते हैं, "हमारे बीच बहुत अच्छी बातचीत हुई। वे एकदम खुलेपन से बात कर रहे थे। जाते वक़्त उन्होंने हम 5 लोगों को कुछ आर्थिक मदद भी दी। इतना ही नहीं, हमें आगे अंधेरी जाना था, तो वे हमें दादर स्टेशन ले गए और ख़ुद ट्रेन में बैठाया। और आख़िर में बड़े प्यार से कहा कि 'मैं तुम्हारे बड़े भाई जैसा हूं'।"
रील नहीं, रियल हीरो...
सोशल मीडिया के ज़माने में 'इन्फ्लुएंसर' तो बहुत होते हैं, लेकिन 'इम्पैक्ट' (असर) डालने वालों में हुसैन मन्सूरी एक हैं। मुंबई की सड़कों पर परोपकार के जज़्बे के साथ घूमने वाले हुसैन की पहचान आज देश भर में पहुंच चुकी है। एक आम परिवार में जन्मे हुसैन ने वेटर की नौकरी करके और कड़ी मेहनत से अपनी पढ़ाई पूरी की। हालात की समझ रखते हुए वे जात, धर्म और पंथ से ऊपर उठकर इंसानियत के नाते सेवा करते हैं।
चाहे टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में कैंसर मरीज़ों की आर्थिक मदद करना हो, या सड़कों पर लावारिस पड़ी देवताओं की तस्वीरों को सम्मान के साथ विसर्जित करके धार्मिक एकता का संदेश देना हो, हुसैन के हर काम में संवेदनशीलता दिखती है। कोविड के दौर में उनके द्वारा बांटा गया खाना और मेडिकल मदद आज भी कई लोगों को याद है। सोशल मीडिया पर 1 करोड़ से ज़्यादा लोग उनसे जुड़े हैं, वे सिर्फ़ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि उनके विचारों की वजह से हैं। भविष्य में अपनी ख़ुद की संस्था बनाकर कैंसर मरीज़ों और ग़रीब बच्चों की शिक्षा के लिए बड़े पैमाने पर काम करने का उनका इरादा है।
'प्रेरणा एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड्स' के बारे में
प्रेरणा एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड्स संस्था की स्थापना 2003 में हुई थी। पिछले 23 सालों सेयह संस्था महाराष्ट्र और ख़ासकर पुणे इलाक़े में नेत्रहीन भाई-बहनों की भलाई के लिए काम कर रही है। संस्था के सेक्रेटरी सतीश नवले ख़ुद उच्च शिक्षित और नेत्रहीन हैं, और उनके मार्गदर्शन में यह संस्था दिव्यांगों की ज़िंदगी में रोशनी फैलाने का काम कर रही है।
इस संस्था का सबसे अनोखा और अहम उपक्रम है'सीमा पर जवानों के साथ दिवाली'। पिछले दो दशकों से ज़्यादा समय से, संस्था के नेत्रहीन साथी हर साल दिवाली के मौक़े पर भारतीय सैनिकों से मिलने सीमा पर जाते हैं और पूरे महाराष्ट्र से इकट्ठा किया गया दिवाली का नाश्ता (फराल) उन्हें प्यार से भेंट करते हैं। सियाचिन समेत दूसरे हिस्सों की सीमाओं पर भी उन्होंने यह कार्यक्रम चलाया है। इसके अलावा महाराष्ट्र के कराड में संस्था की ओर से एक दिव्यांग सेंटर चलाया जाता है, जहां नेत्रहीन और दिव्यांग लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अलग-अलग तरह के कोर्स मुफ़्त सिखाए जाते हैं।