हिंदू घर से निकला 'ख़ान बाबा' का जनाज़ा,जलगांव के सोनार परिवारने निभाया अनोखा रिश्ता

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 10-01-2026
The funeral procession of 'Khan Baba' left from a Hindu home - the Sonar family of Jalgaon shared a unique bond with him.
The funeral procession of 'Khan Baba' left from a Hindu home - the Sonar family of Jalgaon shared a unique bond with him.

 

आवाज़ द वायस , जलगांव (महाराष्ट्र)

सियासी मंच पर आजकल ज़ात और मज़हब के नाम पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। चुनाव की गहमागहमी में जहां लोगों को बांटने की कोशिशें हो रही हैं, वहीं जलगांव ज़िले के यावल शहर में इंसानियत के धर्म को सबसे ऊपर रखने वाली एक बेहद दुर्लभ और दिल को छू लेने वाली घटना घटी है। 80 साल तक अपने घर में साये की तरह रहने वाले एक मुस्लिम कारीगर के इंतक़ाल के बाद, एक हिंदू परिवार ने उनका जनाज़ा अपने ही घर से निकालकर भाईचारे की एक अनोखी मिसाल दुनिया के सामने पेश की है।

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20 साल की उम्र में शुरू हुआ था साथ

यह कहानी कय्यूम ख़ान नूर ख़ान की है। यावल का देवरे-सोनार परिवार उन्हें प्यार से 'ख़ान बाबा' कहता था। महज़ 20 साल की उम्र में कय्यूम ख़ान अशोक देवरे-सोनार के यहां सराफ़ा कारीगर के तौर पर काम करने आए थे। तब से लेकर आज तक, यानी लगातार 80 साल तक वे इसी परिवार का एक अटूट हिस्सा बनकर रहे। मालिक और नौकर का रिश्ता कब पीछे छूट गया और कय्यूम ख़ान इस घर के बुज़ुर्ग और आधार कब बन गए, यह किसी को पता ही नहीं चला। 100 साल की उम्र पूरी होने तक उन्होंने देवरे परिवार के साथ खून के रिश्तों से भी गहरा नाता पूरी ईमानदारी से निभाया।

जब ख़ान बाबा हमेशा के लिए छोड़ गए

बुढ़ापे की वजह से ख़ान बाबा ने आख़िरी सांस ली। उनके गुज़रने की ख़बर मिलते ही देवरे परिवार पर ग़म का पहाड़ टूट पड़ा। पुणे और मुंबई में पढ़ाई या काम के सिलसिले में रहने वाले इस परिवार के बच्चे, पोते और दामाद अपने लाडले बाबा को आख़िरी विदाई देने के लिए फ़ौरन यावल पहुंच गए। हालांकि ख़ान बाबा का असली परिवार काज़ीपुरा इलाक़े में रहता था और उनके भतीजे सादिक़ ख़ान और ज़ाकिर ख़ान अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे, लेकिन देवरे परिवार ने एक जज़्बाती गुज़ारिश की।

हिंदू घर से निकला जनाज़ा

अशोक देवरे, ज्योति देवरे और ऋषि देवरे ने ख़ान परिवार से विनती की कि बाबा ने अपनी पूरी ज़िंदगी हमारे घर में गुज़ारी है। इसलिए उनका जनाज़ा और आख़िरी सफ़र हमारे ही घर से निकलना चाहिए। साथ ही उन्होंने एक दिन का वक़्त भी मांगा ताकि पुणे और मुंबई से आने वाले परिवार के लोग उनका आख़िरी दीदार कर सकें। ख़ान परिवार ने भी इस प्यार का मान रखा और बुधवार की सुबह एक हिंदू घर की चौखट से मुस्लिम रिती-रिवाज़ के मुताबिक़ ख़ान बाबा का जनाज़ा निकला।

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मज़हब की दीवारों को लांघती विदाई

इस जनाज़े का मंज़र देखकर वहां मौजूद हर शख़्स की आंखें नम थीं। सोनार परिवार के सदस्यों ने ख़ान बाबा के जनाज़े को कंधा दिया और क़ब्रिस्तान में दफ़न के वक़्त ख़ुद आगे रहे। इतना ही नहीं, मुस्लिम तरीक़े के मुताबिक़ ज़रूरी मिट्टी देने की रस्म भी इस हिंदू परिवार ने पूरी की।

आज के दौर में जहां धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी की जा रही हैं, वहां यावल की इस घटना ने साबित कर दिया है कि इंसानियत का मज़हब सबसे बड़ा है। 80 साल की सेवा और 100 साल की ज़िंदगी का यह सफ़र भले ही एक हिंदू घर के आंगन से ख़त्म हुआ हो, लेकिन पीछे राष्ट्रीय एकता की एक अमर विरासत छोड़ गया है।