Amidst the Bihar floods, Khan Sir has held aloft the torch of education alongside providing relief.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
बिहार में बाढ़ का संकट गहराता जा रहा है और 15 जिलों की करीब 49.74 लाख आबादी प्रभावित बताई जा रही है। गंगा, कोसी, गंडक, बागमती और पुनपुन जैसी नदियों के उफान के बीच जहां लोगों तक राहत पहुंचाने की चुनौती है, वहीं खान सर करीब 100 गाड़ियों के काफिले के साथ राशन, पानी और जरूरी सामान लेकर बाढ़ प्रभावित इलाकों की ओर निकल पड़े हैं।
उन्होंने खुद राहत सामग्री की जांच कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। खास बात यह है कि राहत अभियान के साथ उन्होंने छात्रों की पढ़ाई भी जारी रखी और राघोपुर के बच्चों के लिए मुफ्त कोचिंग क्लास का वादा किया।
बाढ़ की इस त्रासदी के बीच खान सर करीब 100 गाड़ियों के बड़े काफिले के साथ राहत सामग्री लेकर प्रभावित इलाकों की ओर निकले। इन वाहनों में खाने-पीने की सामग्री, राशन, पीने का पानी और रोजमर्रा की जरूरत का जरूरी सामान शामिल था।
खास बात यह रही कि राहत सामग्री भेजने की व्यवस्था को केवल दूर से देखने के बजाय खान सर खुद मौके पर मौजूद रहे और पूरी तैयारियों की निगरानी की। उन्होंने गाड़ियों में लदे सामान का जायजा लिया और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचने वाली राहत सामग्री में किसी तरह की कमी न रहे।
गाड़ी के ऊपर चढ़कर खुद जांची राहत सामग्री
राहत सामग्री से भरी गाड़ियों को प्रभावित क्षेत्रों के लिए रवाना करने से पहले खान सर ने मौके पर पूरी व्यवस्था का निरीक्षण किया। सामान की उपलब्धता, पैकेजिंग और गुणवत्ता को करीब से देखने के लिए वह खुद एक वाहन के ऊपर चढ़ गए और उसमें रखी राहत सामग्री की जांच की। उनका यह अंदाज बताता है कि राहत अभियान में केवल बड़ी संख्या में सामान जुटाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे सही तरीके से जरूरतमंदों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। करीब 100 वाहनों के इस काफिले को प्रभावित इलाकों की ओर रवाना करने से पहले उन्होंने व्यवस्थाओं की बारीकी से जानकारी ली। कोशिश यही थी कि जिन परिवारों तक यह मदद पहुंचाई जा रही है, उन्हें जरूरी सामान समय पर और व्यवस्थित तरीके से मिल सके।
'कहां थे खान सर?' सवालों के बीच सामने आया राहत अभियान
बिहार में बाढ़ की स्थिति बिगड़ने के दौरान सोशल मीडिया पर एक सवाल लगातार चर्चा में था 'खान सर कहां हैं?' कई लोग यह सवाल उठा रहे थे कि जब राज्य के अलग-अलग हिस्सों में लोग बाढ़ की मुश्किल परिस्थितियों से जूझ रहे हैं, तब खान सर राहत अभियान में दिखाई क्यों नहीं दे रहे।
अब सामने आई जानकारी के मुताबिक, इस दौरान वह राहत अभियान की तैयारियों में जुटे हुए थे। बड़े स्तर पर राहत सामग्री जुटाना, उसे व्यवस्थित करना और प्रभावित लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था तैयार करना समय लेने वाला काम था। तैयारियां पूरी होने के बाद खान सर खुद मौके पर पहुंचे और राहत अभियान की निगरानी की।
इस तरह सोशल मीडिया पर उठ रहे सवालों के बीच उनका करीब 100 गाड़ियों के काफिले के साथ राहत सामग्री लेकर निकलना सामने आया। यह अभियान केवल राहत सामग्री भेजने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने मौके पर रहकर पूरी व्यवस्था को देखने की कोशिश की।
बाढ़ के बीच शिक्षकों की मुहिम ने पकड़ी रफ्तार
बिहार के बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद के लिए शिक्षकों की ओर से भी राहत अभियान चलाया जा रहा है। इस सिलसिले में 'फिजिक्स वाला' के अलख पांडेय सर की पहल का भी जिक्र सामने आया। इसके बाद रोशन आनंद सर भी राहत कार्यों के लिए मैदान में उतरे।
अब खान सर की ओर से बड़े स्तर पर राहत सामग्री जुटाकर प्रभावित क्षेत्रों तक भेजने की कोशिश ने इस मुहिम को और विस्तार दिया है। करीब 100 वाहनों के काफिले में बड़ी मात्रा में जरूरी सामान भेजा गया। इसका उद्देश्य बाढ़ प्रभावित परिवारों तक उन चीजों को पहुंचाना है, जिनकी उन्हें इस संकट की घड़ी में सबसे ज्यादा जरूरत है।
यह तस्वीर ऐसे समय सामने आई है जब बिहार के कई जिलों में बाढ़ का पानी लोगों के सामान्य जीवन को प्रभावित कर रहा है। एक ओर प्रशासन राहत और बचाव कार्य में जुटा है, तो दूसरी ओर सामाजिक संगठनों, शिक्षकों और आम लोगों की ओर से भी अपने स्तर पर मदद पहुंचाने की कोशिशें की जा रही हैं।
बिहार में करीब 50 लाख लोग बाढ़ की चपेट में
बिहार में बाढ़ की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के 15 जिलों की करीब 49.74 लाख आबादी प्रभावित बताई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन जिलों के 88 प्रखंडों की 575 पंचायतें बाढ़ से प्रभावित हुई हैं।
पटना, भोजपुर, वैशाली, मुजफ्फरपुर और भागलपुर समेत कई इलाकों में बाढ़ और जलभराव का असर दिखाई दे रहा है। बड़ी संख्या में परिवारों के सामने भोजन, पीने का पानी, आवागमन और रोजमर्रा की आवश्यकताओं को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं।
कई इलाकों में पानी फैलने के कारण सामान्य आवाजाही भी बाधित हुई है। जिन रास्तों से लोग रोज अपने काम, स्कूल या बाजार तक पहुंचते थे, उनमें से कई जलमग्न हो गए हैं। ऐसे में राहत सामग्री को प्रभावित परिवारों तक पहुंचाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती बन गया है।
कई प्रमुख नदियां खतरे के निशान से ऊपर
बिहार में बाढ़ की स्थिति को गंभीर बनाने में नदियों के बढ़ते जलस्तर की बड़ी भूमिका है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, राज्य की कई प्रमुख नदियां अलग-अलग स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं।
गंडक नदी डुमरिया घाट, कोसी नदी बलतारा और कुरसेला, गंगा नदी गांधीघाट, हाथीदह और कहलगांव, पुनपुन नदी श्रीपालपुर तथा बागमती नदी बेनीबाद और सोनाखान में खतरे के निशान से ऊपर दर्ज की गई है।
नदियों के जलस्तर में वृद्धि का सबसे ज्यादा असर निचले इलाकों में रहने वाले लोगों पर पड़ा है। कई जगहों पर जलभराव ने आवागमन मुश्किल कर दिया है। राहत और बचाव दलों को भी पानी से घिरे इलाकों तक पहुंचने में चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
राहत के साथ शिक्षा
बाढ़ आने के बाद सबसे पहली जरूरत भोजन, पानी, दवा और सुरक्षित आवागमन की होती है। लेकिन जिन परिवारों की जिंदगी कई दिनों तक बाढ़ से प्रभावित रहती है, उनके बच्चों की पढ़ाई भी सबसे ज्यादा प्रभावित होती है।
स्कूलों और कॉलेजों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है, कई जगह शैक्षणिक गतिविधियां बाधित हो जाती हैं और छात्रों की पढ़ाई का सिलसिला टूटने लगता है। इसी चुनौती के बीच खान सर की पहल का दूसरा पहलू सामने आया. राहत अभियान के साथ शिक्षा की निरंतरता।
उनके अभियान से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, राहत सामग्री के बड़े स्तर पर प्रबंधन के बावजूद उन्होंने अपनी कक्षाएं और लेक्चर जारी रखे। यानी एक तरफ राहत सामग्री से भरे वाहनों को प्रभावित इलाकों तक भेजने की तैयारी थी, तो दूसरी तरफ छात्रों की पढ़ाई को जारी रखने की कोशिश भी चल रही थी।
बाढ़ स्कूल-कॉलेजों तक पहुंच को रोक सकती है, लेकिन छात्रों की परीक्षाएं और उनका भविष्य हमेशा बाढ़ के पानी के साथ नहीं रुकता। ऐसे समय में मोबाइल फोन और ऑनलाइन माध्यम से मिलने वाली कक्षाएं उन छात्रों के लिए पढ़ाई का सहारा बन सकती हैं, जो अपने घरों, गांवों या राहत शिविरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।
राहत के 100 वाहनों के बीच भी नहीं थमी पढ़ाई
खान सर के इस अभियान का मानवीय पक्ष यहीं और गहरा हो जाता है। एक तरफ करीब 100 गाड़ियों में राहत सामग्री जुटाने, उसे व्यवस्थित करने और प्रभावित इलाकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी थी, वहीं दूसरी तरफ छात्रों की पढ़ाई को जारी रखने का प्रयास भी किया गया।
दिन में राहत सामग्री की व्यवस्था और अभियान की निगरानी और फिर समय निकालकर कक्षाओं तथा लेक्चर को जारी रखना. बाढ़ जैसे संकट के बीच यह तस्वीर शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी के दो पहुंचने का रास्ता बंद हो गया हो, उनके लिए मोबाइल स्क्रीन पर चलने वाली एक कक्षा सामान्य जीवन की एक छोटी-सी कड़ी बन सकती है।
ऐसे बच्चों के लिए पढ़ाई सिर्फ परीक्षा की तैयारी नहीं, बल्कि यह भरोसा भी हो सकती है कि आपदा के बीच उनका भविष्य पूरी तरह रुकने और वहां की स्थिति देखने के दौरान छात्रों से जुड़ी एक और पहल सामने आई।
खान सर ने र पहल इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि आपदा के दौरान सबसे पहले बच्चों की नियमित पढ़ाई प्रभावित होती है। लंबे समय तक स्कूल या कोचिंग बंद रहने से छात्रों की पढ़ाई का नुकसान होता है और छात्रों को दोबारा पढ़ाई की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
खासकर उन परिवारों के लिए, जिनकी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां बाढ़ के कारण और कठिन हो गई हैं, शिक्षा से सोनू सूद पर भी बनी हुई है। इससे पहले नेपाल में आपदा प्रभावित लोगों की मदद के लिए सामने आ चुके सोनू सूद से बिहार के बाढ़ पी बाढ़ का पानी केवल घरों, सड़कों और खेतों को प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की पूरी व्यवस्था को बदल रहा है। किसी परिवार के लिए आज सबसे जरूरी चीज भोजन और पानी है, किसी केही वजह है कि खान सर का यह अभियान केवल राहत सामग्री पहुंचाने की खबर नहीं रह जाता।
करीब 100 वाहनों के काफिले के जरिए राहत पहुंचाने की कोशिश के साथ-साथ छात्रों की पढ़ाई जारी शिक्षक की भूमिका सामान्य परिस्थितियों में कक्षा, किताब और परीक्षा के इर्द-गिर्द दिखाई देती है।
लेकिन आपदा के समय वही भूमिका समुदाय और छात्रों की जरूरतों से जुड़ सकती है। बाढ़ से प्रभावित परिवारों तक राशन पहुंचाना तत्काल जरूरत का जवाब है, जबकि बच्चों समय एक कठिन प्राकृतिक संकट से गुजर रहा है।
15 जिलों की करीब 49.74 लाख आबादी के प्रभावित होने की जानकारी इस संकट के पैमाने को स्पष्ट करती है। गंगा, कोसी, गंडक, पुनपुन और बागमती जैसी नदियों का खतरे के निशान से ऊपर बहना निचले इलाकों में रहने वाले अलग-अलग पहलुओं को एक साथ सामने लाती है।
बाढ़ के कारण जिन छात्रों के स्कूल या कॉलेज तक पहुंचने का रास्ता बंद हो गया हो, उनके लिए मोबाइल स्क्रीन पर चलने वाली एक कक्षा सामान्य जीवन की एक छोटी-सी कड़ी बन सकती है। ऐसे बच्चों के लिए पढ़ाई सिर्फ परीक्षा की तैयारी नहीं, बल्कि यह भरोसा भी हो सकती है कि आपदा के बीच उनका भविष्य पूरी तरह रुक नहीं गया है।
राघोपुर के छात्रों के लिए मुफ्त क्लास का वादा
राघोपुर में प्रभावित लोगों तक पहुंचने और वहां की स्थिति देखने के दौरान छात्रों से जुड़ी एक और पहल सामने आई। खान सर ने राघोपुर के छात्रों के लिए मुफ्त कोचिंग क्लास शुरू करने का वादा किया।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि आपदा के दौरान सबसे पहले बच्चों की नियमित पढ़ाई प्रभावित होती है। लंबे समय तक स्कूल या कोचिंग बंद रहने से छात्रों की पढ़ाई का नुकसान होता है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के सामने अलग चुनौती खड़ी हो जाती है।
मुफ्त क्लास का वादा ऐसे छात्रों को दोबारा पढ़ाई की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। खासकर उन परिवारों के लिए, जिनकी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां बाढ़ के कारण और कठिन हो गई हैं, शिक्षा से जुड़ी अतिरिक्त सहायता महत्वपूर्ण हो सकती है।
जब बाढ़ के बीच एक शिक्षक की भूमिका सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं रही
बिहार की मौजूदा तस्वीर में बाढ़ का पानी केवल घरों, सड़कों और खेतों को प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की पूरी व्यवस्था को बदल रहा है। किसी परिवार के लिए आज सबसे जरूरी चीज भोजन और पानी है, किसी के लिए सुरक्षित रास्ता, किसी के लिए दवा, और किसी छात्र के लिए किताब और पढ़ाई का सिलसिला।
यही वजह है कि खान सर का यह अभियान केवल राहत सामग्री पहुंचाने की खबर नहीं रह जाता। करीब 100 वाहनों के काफिले के जरिए राहत पहुंचाने की कोशिश के साथ-साथ छात्रों की पढ़ाई जारी रखने और राघोपुर के छात्रों के लिए मुफ्त क्लास का वादा इस पहल को मानवीय पहलू देता है।
एक शिक्षक की भूमिका सामान्य परिस्थितियों में कक्षा, किताब और परीक्षा के इर्द-गिर्द दिखाई देती है। लेकिन आपदा के समय वही भूमिका समुदाय और छात्रों की जरूरतों से जुड़ सकती है। बाढ़ से प्रभावित परिवारों तक राशन पहुंचाना तत्काल जरूरत का जवाब है, जबकि बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की कोशिश उनके भविष्य से जुड़ी जरूरत को संबोधित करती है।
बाढ़ का पानी थमेगा, लेकिन बच्चों की पढ़ाई को भी आगे बढ़ना होगा
बिहार इस समय एक कठिन प्राकृतिक संकट से गुजर रहा है। 15 जिलों की करीब 49.74 लाख आबादी के प्रभावित होने की जानकारी इस संकट के पैमाने को स्पष्ट करती है। गंगा, कोसी, गंडक, पुनपुन और बागमती जैसी नदियों का खतरे के निशान से ऊपर बहना निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सरकार और प्रशासन की राहत एवं बचाव कोशिशों के बीच सामाजिक स्तर पर चलाए जा रहे अभियान भी प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचाने में भूमिका निभा रहे हैं। शिक्षकों की ओर से शुरू हुई राहत मुहिम, खान सर का करीब 100 वाहनों के साथ अभियान, प्रभावित छात्रों के लिए मुफ्त क्लास का वादा और बाढ़ के बीच कक्षाएं जारी रखने की कोशिश ये सभी घटनाएं संकट की एक ऐसी तस्वीर पेश करती हैं जिसमें राहत और शिक्षा दोनों साथ दिखाई देते हैं।
बाढ़ का पानी लोगों के घरों और रास्तों को कुछ समय के लिए रोक सकता है, लेकिन छात्रों के सपनों और भविष्य को रुकने से बचाने की कोशिश भी उतनी ही जरूरी है। यही संदेश इस पूरे घटनाक्रम से उभरकर सामने आता है. आपदा के बीच राहत जरूरी है, लेकिन आने वाली पीढ़ी की पढ़ाई और उम्मीद को बचाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।