एहसान फाजिली /श्रीनगर
कश्मीर घाटी की पहचान केवल उसके खूबसूरत पहाड़ों और झीलों से ही नहीं है, बल्कि यहाँ की खानकाहें, मज़ार और मस्जिदें भी इसकी रूहानी विरासत का मुख्य आधार हैं। बीते साढ़े छह सदियों में ये खानकाहें धार्मिक आयोजनों, आत्मिक शांति और सामाजिक सुधारों का केंद्र रही हैं। समय के बदलाव के साथ मध्य एशिया से आई यह सूफी परंपरा आज तीर्थस्थलों और सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में नया रूप ले चुकी है।
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक प्रोफेसर फारूक फयाज भट्ट का कहना है कि समय बीतने के साथ कश्मीर की खानकाहों के पुराने स्वरूप में बदलाव आया है। कभी केवल सूफी शेखों और उनके शिष्यों (मुरीदों) की साधना का केंद्र रहने वाली ये इमारतें आज प्रमुख तीर्थस्थल बन गई हैं।
इन धार्मिक स्थलों के आसपास बाजार विकसित हो गए हैं। इससे न केवल स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है, बल्कि विभिन्न धर्मों के लोग यहाँ एक साथ जुटते हैं, जिससे सामाजिक समरसता और भाईचारा मजबूत हुआ है।
खानकाह शब्द की उत्पत्ति फारसी भाषा से हुई है। सूफी परंपरा में यह एक ऐसा निवास स्थान होता था जहाँ सूफी संत और उनके शिष्य आत्म-शुद्धि और ईश्वर के ध्यान के लिए एकत्र होते थे। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इन्हें ज़ाविया (उत्तरी अफ्रीका), टेक्के (तुर्की) या जमाअत खाना (दक्षिण एशिया) जैसे नामों से जाना गया।
कश्मीर में खानकाह संस्था की शुरुआत 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई। इसकी शुरुआत 1395 ईस्वी में सुल्तान सिकंदर द्वारा श्रीनगर में बनी खानकाह-ए-मुअल्ला (शाह-ए-हमदान मस्जिद) के निर्माण से मानी जाती है। इसका निर्माण फारसी सूफी संत मीर सैयद अली हमदानी की याद में कराया गया था, जिन्होंने कश्मीर में सूफीवाद और इस्लाम के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

प्रोफेसर फारूक फयाज के अनुसार, खानकाह की अवधारणा का जन्म 9वीं और 10वीं शताब्दी के दौरान मध्य एशिया के खुरासान क्षेत्र में हुआ था। शुरुआत में ये बहुत छोटी और साधारण इमारतें होती थीं, जिन्हें दुवायरा या रिबात (सुरक्षित चौकियां) कहा जाता था।
यहाँ सूफी संत एकांत में साधना करते थे। 11वीं शताब्दी के आसपास सूफी संत अबू सईद बिन अबिल-खैर के समय में इन खानकाहों को एक संगठित सामुदायिक केंद्र का रूप मिला। यहाँ अनिवार्य प्रार्थना, उपवास और सामूहिक ध्यान (ज़िक्र) जैसे आध्यात्मिक अनुशासन लागू किए गए।
12वीं शताब्दी तक शासकों को भी खानकाहों के राजनीतिक और सामाजिक महत्व का अहसास होने लगा था। शासकों ने इनके निर्माण और रखरखाव के लिए सरकारी मदद देना शुरू किया। मिस्र के शासक सलाउद्दीन (सलाह अद-दीन) ने 1173 में अल-खानकाह अल-सलाहिया जैसी कई खानकाहें स्थापित कीं।
धीरे-धीरे स्पेन से लेकर भारत तक पूरे इस्लामी जगत में खानकाहों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार हो गया। ये केंद्र केवल प्रार्थना के स्थान नहीं थे, बल्कि यात्रियों के लिए आश्रय स्थल, गरीबों के लिए लंगर और शिक्षा के केंद्र भी बन गए।

13वीं और 14वीं शताब्दी के दौरान दिल्ली सल्तनत के समय खानकाहों ने भारतीय उपमहाद्वीप में सूफीवाद के प्रसार में अहम भूमिका निभाई। चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिले के सूफी संतों ने खानकाहों के जरिए आम जनता से सीधा संवाद स्थापित किया।
यहाँ बिना किसी भेदभाव के हर जाति और वर्ग के लोगों के लिए मुफ्त खाने (लंगर) और रहने की व्यवस्था होती थी। चिश्ती परंपरा ने कव्वाली जैसी भक्ति संगीत कला को बढ़ावा दिया, जिससे स्थानीय संस्कृति और कला को नया जीवन मिला। मुगल काल में भी ये केंद्र सामाजिक और कूटनीतिक दृष्टि से काफी प्रभावशाली बने रहे।
जब किसी सूफी संत का निधन होता था, तो उन्हें अक्सर उसी खानकाह के परिसर में दफना दिया जाता था। समय के साथ ये स्थान दरगाह का रूप ले लेते थे और श्रद्धालु वहाँ ज़ियारत के लिए पहुँचने लगते थे। 18वीं शताब्दी के बाद आधुनिक युग में कई पारंपरिक खानकाहें औपचारिक शिक्षण केंद्रों के बजाय दरगाहों और तीर्थस्थलों में तब्दील हो गईं, जहाँ लोग दुआओं और मानसिक शांति के लिए आने लगे।
कश्मीर में भी हर सूफी सिलसिले का अपना खानकाही ढांचा था। हालाँकि, यहाँ सबसे बड़ा प्रभाव कुबराविया सिलसिले का रहा। प्रोफेसर फयाज के अनुसार, उस दौर की प्रमुख खानकाहों में श्रीनगर की खानकाह-इ-बुलबुल शाह, खानकाह-इ-मुअल्ला, खानकाह-इ-अमीरिया, खानकाह-इ-समस कुबरावी, खानकाह-इ-ज़दीबल, कुलगाम की खानकाह-इ-सैयद हुसैन सिमनानी और पुलवामा की खानकाह-ए-फैज पनाह शामिल हैं।

कश्मीर की खानकाहों की एक और खास बात इनकी वास्तुकला है। लकड़ी से बनी इन इमारतों की बनावट में बौद्ध और पारंपरिक कश्मीरी स्थापत्य कला का सुंदर मेल देखने को मिलता है।
इतिहास के पन्नों पर गौर करें तो कश्मीर का लगभग हर परिवार किसी न किसी सूफी सिलसिले, पीर या खानकाह से जुड़ा रहा है। यही वजह है कि आज भी उर्स और प्रमुख त्यौहारों के मौकों पर इन खानकाहों के आसपास की चहल-पहल कश्मीर की साझा सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए है।