आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और खुदरा विक्रेताओं की लागत के बीच अत्यधिक अंतर को लेकर मंगलवार को केंद्र से सवाल किया कि पूरी व्यवस्था ही फार्मास्यूटिकल विनिर्माताओं की मदद करने के लिए क्यों काम कर रही है।
केंद्र ने न्यायालय को बताया कि सरकार की नीति ‘‘यह है कि पूरे परिवेश को नियंत्रित नहीं किया जाना चाहिए।’’
सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने पूछा, ‘‘आखिर पूरी व्यवस्था इन लोगों (विनिर्माताओं) की मदद करने के लिए क्यों काम कर रही है?’’
पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) एक ‘‘पूरी तरह से निष्क्रिय’’ संस्था प्रतीत हो रही है।
न्यायालय उन दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें देश में दवाओं की कीमतों का मुद्दा उठाया गया है।
एमआरपी, और खुदरा विक्रेताओं को जिस दर पर दवाएं उपलब्ध होती हैं, उनके बीच के भारी अंतर का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा, ‘‘सरकार ऐसा होने दे रही है। यह सब सरकार की नजर के सामने हो रहा है।’’
पीठ ने सवाल किया, ‘‘क्या ऐसा बेलगाम होने दिया जाना चाहिए?’’