ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
कभी लोग कहते थे, “ना खा पाएगी, ना चल पाएगी… इसे तो भला ज़हर दे दो।” यही बातें पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने पायल नाग के परिवार को सुनाई थीं, जब उनकी ज़िंदगी सबसे कठिन दौर में थी। 2015 में, बालांगिर, ओडिशा की यह छोटी लड़की सिर्फ आठ साल की थी, जब एक हादसे ने उसके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। पायल उस समय कक्षा तीन में पढ़ती थी। एक सुबह वह अपने छोटे भाई के साथ रायपुर में एक अधूरी इमारत की छत पर खेल रही थी। छत पर पानी जमा था और उसी समय एक तार बिजली में आ गया। बिजली का झटका इतना गंभीर था कि पायल की जान को खतरा हो गया। डॉक्टरों के पास केवल एक विकल्प था—उसके चारों हाथ-पैर काट देना।
इस हादसे ने पायल और उसके परिवार को गहरे संकट में डाल दिया। उनके माता-पिता, बिजय कुमार नाग और जनता, जो बालांगिर के करीब 70 किलोमीटर दूर जमुनाभाहल गाँव से आए थे, अपने बच्चे की देखभाल के लिए मजबूरन पायल को एक अनाथालय में छोड़ने को मजबूर हो गए।
— The Popcorn Buddy (@ThePopcornBuddy) April 4, 2026
अनाथालय में भी पायल की जिंदगी आसान नहीं थी। लोग उसके बारे में कह रहे थे कि वह कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगी, कभी खाना नहीं खा पाएगी। ऐसे शब्दों ने उसके परिवार और खुद पायल के लिए कठिन समय और भी कठिन बना दिया। लेकिन जीवन में कभी-कभी अंधकार के बाद उजाला भी आता है। पायल के जीवन में बदलाव 2023 में आया। कोच कुलदीप वेदवान ने सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर देखी और उन्हें अपनी आर्चरी अकादमी में लाने का निर्णय लिया। उन्हें यह मानना पड़ा कि यह चुनौती आसान नहीं होगी। अनाथालय से पायल को निकालने और उनके परिवार को समझाने में काफी मेहनत लगी। जिला प्रशासन को पत्र लिखकर अनुमति लेनी पड़ी।

जब पायल पहली बार अकादमी पहुँची और अन्य खिलाड़ियों को ट्रेनिंग करते देखा, वह डर और हताशा में टूट गई। उन्होंने पूछा, “मू कैसे खेल पाऊँगी, मेरे पास हाथ-पैर नहीं हैं।” कोच ने उन्हें भरोसा दिलाया, “सब छोड़ो, मेहनत करो। मैं सब संभालूंगा।” पायल ने हर दिन लगभग आठ घंटे कड़ी मेहनत की। लेकिन आर्चरी सीखने के लिए उन्हें खास उपकरण की जरूरत थी। कोच ने उनके प्रॉस्थेटिक पैर में एक स्टील डिवाइस लगाया, जिससे वह धनुष उठा सकें। शुरुआती समय में दो उपकरण लगे थे। तीन महीने की कड़ी ट्रेनिंग के बाद जब पायल ने 36 तीरों में 350-355 अंक लिए, तभी कोच ने महसूस किया कि वह तैयार हैं।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के नियमों के अनुसार दो उपकरणों का उपयोग नहीं किया जा सकता था। इसलिए कोच ने एक नया उपकरण तैयार किया, जो उनके दाहिने प्रॉस्थेटिक पैर में फिट किया गया। इस अनोखी मशीन के साथ पायल ने 2025 में एशियाई यूथ पैरागेम्स, दुबई में अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया। इस तरह पायल दुनिया की पहली चार अंगविहीन आर्चर बनीं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा की।
पायल ने भारत में 2025 जयपुर नेशनल्स में शिरकत की, जहां उन्होंने भारत की सबसे बड़ी पैरालिंपिक आर्चर शीटल देवी को हराकर दो गोल्ड मेडल जीते। इसके बाद उन्होंने खेलो इंडिया पैरागेम्स और पठियाला में नेशनल्स में सिल्वर मेडल हासिल किया। उनकी सफलता में उनकी बड़ी बहन वर्षा का भी योगदान रहा है। वर्षा हमेशा पायल के साथ रही, उनकी मदद की और उन्हें हिम्मत दी। पायल कहती हैं, “मेरी सारी सफलता मेरी बहन के कारण है। वह मेरी छाया की तरह हमेशा मेरे साथ रही।” वर्षा भी कहती हैं कि लोग जो बातें कहते थे, शायद उसी कारण पायल इतनी मजबूत बन गईं।

हाल ही में बैंकॉक में आयोजित वर्ल्ड आर्चरी पैरासिरीज़ में पायल ने दो गोल्ड मेडल जीते। उन्होंने विश्व नंबर एक शीटल देवी को 139-136 से हराया और टीम गोल्ड में भी उनके साथ कामयाबी हासिल की। इस जीत ने पायल को अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमकाया और उनके संघर्ष और हौसले को साबित कर दिया। कोच कुलदीप वेदवान मानते हैं कि पायल भविष्य में एशियाई पैरागेम्स और LA पैरालंपिक में कई गोल्ड जीत सकती हैं। पायल की कहानी यह दिखाती है कि कठिनाई और संघर्ष को भी सफलता में बदला जा सकता है। पायल नाग ने अपने जीवन के दर्द, आलोचना और चुनौतियों को अपनी ताकत बना लिया। आज वह केवल एक आर्चर नहीं, बल्कि प्रेरणा का प्रतीक हैं।