बासित जरगर/श्रीनगर
श्रीनगर की विश्व प्रसिद्ध डल झील इन दिनों किसी फिल्मी सेट जैसी नजर आ रही है। मौका है जम्मू-कश्मीर के पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव यानी IFFJK का। इस चार दिवसीय आयोजन ने घाटी में कुछ ऐसा कर दिखाया है जो पहले कभी नहीं हुआ। झील के शांत पानी पर एक बड़ा तैरता हुआ पर्दा लगाया गया है।
इस अनोखे ओपन एयर थिएटर में लोग शिकारों पर बैठकर फिल्में देख रहे हैं। शेर-ए-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र के पास पानी पर तैरती इस बड़ी स्क्रीन ने इतिहास रच दिया है। यह पहल न सिर्फ लोगों को सिनेमा के करीब ला रही है बल्कि पुरानी यादों को भी ताजा कर रही है। जब दर्शक पानी के बीच बैठकर हिंदी सिनेमा के पुराने दौर के गीत और सीन देखते हैं तो एक अलग ही जादू बिखर जाता है।
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महोत्सव की शुरुआत सोमवार को हुई थी। पहले दिन दर्शकों ने साल 1961 की मशहूर फिल्म जंगली का लुत्फ उठाया। झील के किनारे भारी भीड़ जमा थी। पानी के ऊपर जगमगाती स्क्रीन और पीछे खड़े हाउसबोट्स ने समां बांध दिया।
मंगलवार को इस कड़ी में अर्जू फिल्म को दिखाया गया। इसके बाद बुधवार को शम्मी कपूर और शर्मिला Tagore की क्लासिक फिल्म कश्मीर की कली ने डल झील के पानी पर जादू बिखेरा। इस फिल्म के गाने और उसका संगीत आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं।
Cinema under the stars, floating on Dal Lake.
— Hinna Nazir (@HinnaNazir) September 9, 2026
Moviegoers watching films from a floating cinema in Srinagar — a beautiful picture of Naya and Badalta Kashmir
Peace, talent, tourism & international events — Kashmir becoming a destination the world wants to experience.@RajeevRC_X pic.twitter.com/axmOE3kxSK
महोत्सव के आखिरी दिन यानी 10 सितंबर को यश चोपड़ा की सदाबहार फिल्म कभी कभी की स्क्रीनिंग रखी गई। इन सभी फिल्मों का चुनाव बहुत सोच समझकर किया गया है। इन फिल्मों का कश्मीर से पुराना नाता रहा है। पुराने दौर में हिंदी सिनेमा की कई सुपरहिट फिल्मों की शूटिंग यहीं हुई थी। डल झील और पहलगाम जैसी जगहों ने देश भर के लोगों के दिलों में अपनी एक खास जगह बनाई है।

इस तैरते हुए सिनेमा ने उस पुराने रिश्ते को एक नया आयाम दे दिया है। दर्शक पर्दे पर सिर्फ कश्मीर को देख नहीं रहे हैं बल्कि खुद उसी खूबसूरत वादियों के बीच बैठकर फिल्म का आनंद ले रहे हैं। इस अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं है।
इसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को एक नए नजरिए से दुनिया के सामने पेश करना है। महोत्सव में आए कई फिल्मकारों और कलाकारों ने इस बात पर जोर दिया कि कश्मीर की खूबसूरती से आगे बढ़कर यहां की स्थानीय संस्कृति और लोगों की कहानियों को भी पर्दे पर लाना जरूरी है।
स्थानीय निवासी मुनीर अहमद लोन ने बताया कि उन्होंने जिंदगी में कई फिल्में देखी हैं। लेकिन डल झील के पास बैठकर पानी के बीच फिल्म देखने का अनुभव पूरी तरह अलग है। उनका कहना है कि यह झील इस फिल्मी अनुभव का एक अहम हिस्सा बन गई है।

एक अन्य स्थानीय निवासी यूसुफ अली का मानना है कि इस तरह के आयोजनों से पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता है। लोग आम तौर पर डल झील में शिकारा की सैर करने आते हैं। लेकिन इस बार झील खुद एक सिनेमा हॉल बन गई है। यह एक ऐसा विचार है जिसका आनंद परिवार और युवा दोनों एक साथ उठा रहे हैं।
शाम के वक्त जब झील के चारों ओर पहाड़ और हाउसबोट्स टिमटिमाते हैं तो नजारा देखने लायक होता है। इस फिल्म महोत्सव में दुनिया भर के देशों से फिल्में आई हैं। कुल मिलाकर 41 देशों की 135 फिल्में इस कार्यक्रम का हिस्सा बनी हैं।
इससे इस आयोजन को वैश्विक पहचान मिली है। घाटी के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के फिल्म समारोह ने इस तरह से आम जनता को खुले में जोड़ने का काम किया है।

पारंपरिक ऑडिटोरियम की चारदीवारी से निकलकर सिनेमा सीधे जनता के बीच पहुंच गया है। शिकारे जो आमतौर पर पर्यटन और सैर-सपाटे के लिए जाने जाते हैं, वे इस दौरान सिनेमा हॉल की सीटें बन गए। इस अनूठी पहल ने यह साबित कर दिया है कि कश्मीर में कला और प्रकृति का मेल कितना अद्भुत हो सकता है।
यह आयोजन सिर्फ एक फिल्म स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं रहा। यह कश्मीर की समृद्ध संस्कृति और सिनेमा के बीच के गहरे जुड़ाव का एक जश्न बन गया। शाम के वक्त पानी पर तैरती स्क्रीन और उसके सामने जमा शिकारों का यह कारवां लंबे समय तक लोगों की यादों में रहने वाला है। डल झील ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि खुद में एक जीवंत कहानी है।