ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
आधुनिकता की दौड़ और कई बार समाज में बनाई जाने वाली दूरियों के बीच, दक्षिण भारत के केरल राज्य से एक ऐसी तस्वीर उभरकर सामने आई है, जो दिल को गहराई से झकझोर देती है और चेहरे पर एक सुकूनभरी मुस्कान ले आती है। केरल के पलक्कड़ जिले के शांत और हरियाली से घिरे वाणियमकुलम (Vaniyamkulam) क्षेत्र में स्थित 'मानु मुसलीयार इस्लामिक कॉम्प्लेक्स' (MMIC - जामिया रहीमिया) आज केवल एक शैक्षणिक या धार्मिक संस्थान भर नहीं रह गया है, बल्कि यह देश भर के लिए सांप्रदायिक सौहार्द, अटूट विश्वास और इंसानी भाईचारे का एक ऐसा जीवंत प्रकाशपुंज बन चुका है, जहाँ सरहदें और मजहबी दीवारें इंसानियत के सामने स्वतः ढह जाती हैं।
एक युवती की आँखों में तैरते अवाक कर देने वाले भाव और आत्मीयता का अहसासइस खूबसूरत बदलाव और गंगा-जमुनी तहजीब की असली रूह को बयां करती एक घटना ने इन दिनों हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। जब केरल की एक युवा युवती ने इस मदरसे के प्रांगण में कदम रखा, तो वहाँ के दृश्यों ने उनकी सोच को एक नया आयाम दे दिया। उनके भीतर आश्चर्य, अविश्वास और अगाध भावुकता का एक ऐसा ज्वार उमड़ पड़ा, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।

उन्होंने अपनी आँखों से देखा कि कैसे एक धार्मिक शिक्षण संस्थान असल मायनों में सर्वधर्म समभाव का सबसे बड़ा मंदिर बना हुआ है। वहाँ जब उन्होंने सैकड़ों लोगों को एक साथ भोजन करते और अलग-अलग समुदायों के लोगों को पूरी तन्मयता से सेवा करते देखा, तो उनके मुँह से बरबस निकल पड़ा कि यह जगह समाज की उन तमाम नफरत भरी दीवारों को जमींदोज कर रही है जो इंसान को इंसान से जुदा करती हैं। उस युवती के चेहरे के भाव और उनकी आँखें इस बात की गवाही दे रही थीं कि जब दिलों में मोहब्बत हो, तो कोई भी विविधता दूरियों में नहीं बल्कि एक खूबसूरत परिवार में बदल जाती है।
वर्ष 1989: नींव और दूरदर्शी संस्थापक के.टी. मानु मुसलीयार का विजनइस महान संस्थान की स्थापना वर्ष 1989 में की गई थी। इसकी परिकल्पना और आधारशिला केरल के विख्यात इस्लामिक विद्वान, महान समाज सुधारक और शिक्षाविद् के.टी. मानु मुसलीयार (K.T. Manu Musaliyar) के पवित्र विचारों और उनकी स्मृति में रखी गई थी। के.टी. मानु मुसलीयार ने अपने जीवनकाल में केरल के प्रतिष्ठित संगठन 'समस्ता केरल इस्लाम मता विद्याभ्यास बोर्ड' के जनरल सेक्रेटरी के रूप में ऐतिहासिक सेवाएं दी थीं। उनका स्पष्ट मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रियां बांटना नहीं है, बल्कि इंसानों के दिलों में नैतिक मूल्यों (Tharbiyyah) और आपसी भाईचारे का बीज बोना है।
आज उनकी यही दूरदर्शी सोच इस परिसर के चप्पे-चप्पे पर जीवंत नजर आती है।सांस्कृतिक समन्वय का उत्सव: जहाँ मिलकर पकता है और बँटता है लंगरकेरल की पारंपरिक 'गंगा-जमुनी तहजीब'—यानी विभिन्न धर्मों के त्योहारों, सुख-दुख और उत्सवों में एक-दूसरे के गले मिलने की परंपरा—का यह संस्थान सबसे बेहतरीन मॉडल पेश करता है। यहाँ चलने वाले विशाल सामुदायिक लंगर और भोजनशाला की संस्कृति ने पूरी दुनिया का दिल जीत लिया है। इस रसोई में न तो कोई धर्म पूछा जाता है और न ही कोई जात। यहाँ हिंदू, मुस्लिम और ईसाई—तीनों प्रमुख समुदायों के लोग कंधे से कंधا मिलाकर, पूरे प्रेम और उत्साह के साथ एक ही चूल्हे पर खाना पकाते हैं।
भोजन तैयार होने के बाद विभिन्न पृष्ठभूमियों के स्वयंसेवक मुस्कुराते हुए लोगों को लंगर परोसते हैं। सबसे जादुई और भावुक कर देने वाला पल तब आता है जब समाज के हर वर्ग के लोग, बच्चे, बुजुर्ग और युवा एक लंबी कतार में और एक ही मेज पर बैठकर एक ही थाली में भोजन साझा करते हैं। उस युवती ने जब इस पवित्र नजारे को अपनी आँखों से निहारा, तो वह समझ गईं कि यह केवल पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि इंसानी दिलों को जोड़ने का एक ऐसा पावन उत्सव है जो शब्दों से परे है।
अक्टूबर 2026 का ऐतिहासिक सम्मेलन
जब गूंजा एकता और शांति का संदेशसंस्थान की परंपराओं में इसके वार्षिक आयोजन मील का पत्थर साबित होते हैं। हाल ही में अक्टूबर 2026 में इस परिसर में 37वां वार्षिकोत्सव और 13वां सनद दान (दीक्षांत) सम्मेलन अत्यंत भव्यता और गरिमा के साथ संपन्न हुआ। इस ऐतिहासिक आयोजन की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि इसमें केवल एक मजहब या वर्ग के लोग शामिल नहीं हुए, बल्कि विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों के दिग्गज बुद्धिजीवियों और नेताओं ने शिरकत की।
मंच से उठी हर एक आवाज ने देश में शांति, आपसी विश्वास और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने का संकल्प लिया, जिसने पूरे क्षेत्र में प्रेम की एक नई बयार बहा दी।संस्थान की मजबूत शैक्षणिक नींव और बहुमुखी ताकत'मानु मुसलीयार इस्लामिक कॉम्प्लेक्स' केवल लंगर और मेल-मिलाप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी मजबूत और समावेशी शिक्षा प्रणाली है।

यह संस्थान अनाथ, बेसहारा और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है:समावेशी और नैतिक शिक्षा: यहाँ बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ उच्च नैतिक मूल्य (Tharbiyyah) सिखाए जाते हैं, ताकि वे भविष्य में समाज के एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बन सकें।विविध और उन्नत पाठ्यक्रम: परिसर के भीतर प्राथमिक मदरसे से लेकर पवित्र कुरआन को कंठस्थ कराने वाला 'हिफ्जुल कुरआन कॉलेज' और उच्च इस्लामी अध्ययन के लिए 'जामिया रहीमिया अरबी कॉलेज' सुचारू रूप से संचालित हो रहे हैं।बहुभाषी ज्ञान और आधुनिक संसाधन: छात्रों को अरबी, अंग्रेजी, उर्दू और मलयालम जैसी भाषाओं में पारंगत किया जाता है।
इसके अलावा यहाँ आधुनिक क्लासरूम, साइंस-आईटी लैब, खेल मैदान, विशाल मस्जिद और हजारों दुर्लभ पुस्तकों से सुसज्जित एक समृद्ध पुस्तकालय मौजूद है।सक्रिय छात्र संगठन: छात्रों के नेतृत्व कौशल को निखारने के लिए 'मादनुल फुसवाहा स्टूडेंट्स एसोसिएशन' (MFSA) और पूर्व छात्रों का मजबूत नेटवर्क 'ओल्ड स्टूडेंट्स फेडरेशन' (OSF) निरंतर सामाजिक और शैक्षणिक कल्याण के कार्यों में जुटा रहता है।
मानवता की अमिट मिसालआज के दौर में जब दुनिया के कई हिस्सों में दूरियों और कटुता की दीवारें खड़ी की जा रही हैं, केरल के पलक्कड़ स्थित 'मानु मुसलीयार इस्लामिक कॉम्प्लेक्स' (MMIC - जामिया रहीमिया) एक ऐसी रोशन मीनार की तरह खड़ा है जो यह सिखाता है कि इंसानियत से बड़ा कोई मजहब नहीं होता। उस युवती की हैरानी और वहाँ के लोगों का वह साझा प्यार इस बात का सबूत है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में एकता में बसती है, और यह संस्थान उस ताकत को हर दिन अपने आचरण से अमर बना रहा है।