An example of secular thinking: The friendship of Dr. Zakir Hussain and Kaka Kalelkar
अर्सला खान/नई दिल्ली
भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन की जयंती पर जब हम उनके जीवन को याद करते हैं, तो एक ऐसे इंसान की तस्वीर सामने आती है, जिसने पूरी ज़िंदगी शिक्षा, इंसानियत और आपसी भाईचारे के लिए समर्पित कर दी। डॉ. ज़ाकिर हुसैन सिर्फ़ देश के तीसरे राष्ट्रपति ही नहीं थे, बल्कि वे एक सच्चे शिक्षाविद, समाजसेवी और उदार सोच वाले नेता भी थे। उनका जीवन भारत की साझा संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष परंपरा का मजबूत उदाहरण है।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन का जन्म 8 फरवरी 1897 को हुआ था। उन्होंने बचपन से ही शिक्षा को समाज को बेहतर बनाने का सबसे बड़ा ज़रिया माना। जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना और उसे आगे बढ़ाने में उनका योगदान बहुत अहम रहा। उनका मानना था कि पढ़ाई का मकसद सिर्फ़ नौकरी पाना नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार और जिम्मेदार नागरिक बनाना है। यही सोच उन्हें एक सच्चा धर्मनिरपेक्ष नेता बनाती है।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन की उदार सोच उनकी दोस्तियों में भी साफ़ दिखाई देती है। उनके मित्रों में हर धर्म और विचारधारा के लोग शामिल थे। इन्हीं में से एक थे काका कालेलकर, जो जाने-माने गांधीवादी विचारक, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी थे। काका कालेलकर हिंदू परिवार से थे, लेकिन विचारों के स्तर पर वे डॉ. ज़ाकिर हुसैन के बहुत करीब थे।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन और काका कालेलकर की दोस्ती सिर्फ़ निजी नहीं थी, बल्कि विचारों की दोस्ती थी। दोनों ही महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रभावित थे। वे मानते थे कि भारत की ताकत उसकी विविधता और आपसी सम्मान में है। काका कालेलकर समाज में फैली जाति व्यवस्था और भेदभाव के खिलाफ़ आवाज़ उठाते थे, जबकि डॉ. ज़ाकिर हुसैन शिक्षा और संवाद के ज़रिये लोगों को जोड़ने में विश्वास रखते थे। दोनों की सोच अलग रास्तों से चलकर एक ही मंज़िल पर मिलती थी।
कहा जाता है कि जब भी दोनों साथ बैठते थे, तो धर्म, साहित्य, समाज और देश के भविष्य जैसे विषयों पर खुलकर बातचीत होती थी। इन चर्चाओं में कभी धर्म दीवार नहीं बनता था। डॉ. ज़ाकिर हुसैन के लिए धर्म इंसान को बेहतर बनाने का रास्ता था, न कि किसी से दूरी पैदा करने का ज़रिया। यही बात काका कालेलकर को उनसे जोड़ती थी।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन का राष्ट्रपति काल भी उनकी इसी सोच को दर्शाता है। वे देश के पहले ऐसे राष्ट्रपति थे, जिन्होंने अपने व्यवहार और शब्दों से यह दिखाया कि राष्ट्रपति का पद पूरे देश का होता है, किसी एक धर्म या समुदाय का नहीं। वे हमेशा भारत की साझा संस्कृति, सहनशीलता और आपसी समझ की बात करते थे।
आज जब समाज में मतभेद और नफ़रत बढ़ती दिखाई देती है, तब डॉ. ज़ाकिर हुसैन और काका कालेलकर की दोस्ती हमें एक अहम सीख देती है। यह सीख है—एक-दूसरे को समझना, सम्मान देना और साथ चलना। उनकी मित्रता बताती है कि मजबूत भारत की नींव भरोसे, संवाद और इंसानियत पर टिकी होती है।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन की जयंती पर उन्हें याद करना सिर्फ़ श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उनके विचारों को अपनाना भी है। वे एक ऐसे भारत का सपना देखते थे, जहां धर्म निजी आस्था हो और इंसानियत सबसे बड़ा मूल्य। यही संदेश आज भी उतना ही ज़रूरी है, जितना उनके दौर में था।