आवाज द वाॅयस ब्यूरो, मुंबई
कल्याण के पास मौजूद ऐतिहासिक मलंग गढ़ पर हजरत हाजी मलंग बाबा का सालाना उर्स मुबारक बेहद उत्साह और जोश-ओ-खरोश के साथ शुरू हो गया है. इस मजहबी त्यौहार की मुख्य रस्म के तौर पर दरगाह शरीफ पर संदल और फूलों की चादर पेश की जाती है. हर साल की तरह इस बार भी हजारों अकीदतमंद बाबा के दीदार और संदल के जुलूस में शामिल होने के लिए गढ़ पर पहुंचे हैं. इस समारोह की वजह से पूरा मलंग गढ़ इलाका अकीदत और चहल-पहल से सराबोर है और हर तरफ शानदार रोशनी की गई है.
संदल जुलूस की रिवायत
उर्स की पुरानी रिवायत के मुताबिक, संदल का यह खास जुलूस रात के वक्त निकलता है. इसमें अलग-अलग जगहों से आए जायरीन पारंपरिक वाद्ययंत्रों और सूफियाना संगीत की धुन पर शामिल होते हैं. संदल पेश करने के बाद दरगाह पर मुकद्दस चादर चढ़ाई जाती है और दुनिया में अमन, तरक्की और आपसी भाईचारे के लिए खास दुआएं मांगी जाती हैं. इस समारोह की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां सिर्फ मुस्लिम भाई ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लोग बड़ी आस्था के साथ हाजिरी लगाते हैं. हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल माने जाने वाले इस उर्स में पीढ़ियों से चली आ रही रस्में आज भी उसी शिद्दत से निभाई जाती हैं.
जायरीन के लिए खास इंतजामात
जायरीन की सहूलियत के लिए प्रशासन और दरगाह ट्रस्ट की तरफ से खास इंतजाम किए गए हैं. गढ़ पर चढ़ने वाली सीढ़ियों के रास्ते पर रोशनी और पीने के पानी का माकूल इंतजाम है. उर्स के दौरान होने वाली भारी भीड़ को देखते हुए, कल्याण रेलवे स्टेशन से मलंग गढ़ की तलहटी तक एक्स्ट्रा बसें चलाई गई हैं. साथ ही, सुरक्षा के लिहाज से जगह-जगह भारी पुलिस बल तैनात है और सीसीटीवी कैमरों के जरिए भीड़ पर पैनी नजर रखी जा रही है. पहाड़ी इलाका होने की वजह से किसी भी इमरजेंसी के लिए मेडिकल टीमें और एम्बुलेंस तैयार रखी गई हैं.
उर्स के मौके पर गढ़ पर बड़ा मेला लगा है, जहां खाने-पीने और खिलौनों की दुकानें अकीदतमंदों का मुख्य आकर्षण बनी हुई हैं. यह उर्स अगले कुछ दिनों तक चलेगा और इस दौरान कई मजहबी और रूहानी कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है. दरगाह ट्रस्ट और पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे लाइन में रहकर शांति से दर्शन करें और सुरक्षा नियमों का पालन करें. हाजी मलंग बाबा के इस सालाना उर्स से इलाके के व्यापार और पर्यटन को हर साल की तरह बड़ा बढ़ावा मिल रहा है.
मलंग गढ़ जाने के लिए देश का सबसे बड़ा 'फ्यूनिकुलर रोपवे' शुरू; अकीदतमंदों का सफर हुआ आसान
भारत का सबसे बड़ा और सबसे लंबा 'फ्यूनिकुलर रोपवे' (Funicular Ropeway) अब हाजी मलंग में शुरू हो गया है. मुंबई महानगर क्षेत्र में ठाणे और रायगढ़ जिलों की सीमाओं पर फैले मलंग गढ़ की पहाड़ियों में मौजूद इस मुकद्दस (पवित्र) मकाम तक पहुंचना अब बेहद आसान हो गया है. समुद्र तल से करीब 2,590 से 3,200 फीट की ऊंचाई पर बसे इस तीर्थ स्थल पर आने वाले जायरीन के लिए यह सुविधा बेहद अहम साबित होगी.
मलंग गढ़ का पूरा परिसर भौगोलिक रूप से तीन अलग-अलग स्तरों में बंटा हुआ है. इनमें सबसे निचले स्तर पर करीब 1,000 फीट चौड़ा और 2,500 फीट लंबा एक विशाल पठार है. इसी पठार पर हाजी मलंग बाबा की ऐतिहासिक दरगाह मौजूद है. ऊंचाई पर मौजूद इन पवित्र स्थानों के दर्शन के लिए अब तक अकीदतमंदों को खूबसूरत लेकिन मुश्किल भरे सफर का सामना करना पड़ता था.
अब तक लोगों को दरगाह तक पहुंचने के लिए करीब 2,500 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती थीं, जिसमें शारीरिक क्षमता के हिसाब से कई घंटे लग जाते थे. लेकिन, इस नई रोपवे सुविधा की वजह से यह सफर अब सिर्फ 10 मिनट में पूरा किया जा सकेगा. हर फेरे में 120 यात्रियों को ले जाने की क्षमता वाली इस सुविधा से, खास तौर पर बुजुर्गों और दिव्यांग अकीदतमंदों के लिए यह सफर अब ज्यादा सुरक्षित और आरामदायक हो गया है.
कौन थे हाजी मलंग?
महाराष्ट्र में 'हाजी मलंग' के नाम से मशहूर हजरत हाजी अब्दुल रहमान एक महान सुन्नी सूफी संत थे. मूल रूप से अरब के रहने वाले हाजी मलंग 12वीं सदी में राजा नल के दौर में अपने कुछ मुरीदों के साथ भारत आए थे. उन्होंने भारत में सूफी विचारों का प्रचार किया और उनके काम की वजह से स्थानीय लोगों के दिलों में उन्हें बेहद इज्जत का मुकाम हासिल हुआ. उन्हीं के सम्मान में मुंबई के पास इस ऐतिहासिक किले का नाम 'मलंग गढ़' रखा गया और कल्याण में उनकी दरगाह है.
कल्याण के पास यह ऐतिहासिक मलंग गढ़ हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की आस्था का केंद्र है. मुस्लिम भाई इसे 12वीं सदी के सूफी संत हाजी अब्दुल रहमान की दरगाह मानते हैं, तो हिंदू धर्म के मानने वाले, खास तौर पर नाथ संप्रदाय के लोग, इसे मच्छिंद्रनाथ का मंदिर या समाधि स्थल मानते हैं. यह जगह कई सालों से मंदिर और दरगाह दोनों दावों की वजह से चर्चा का केंद्र रही है. हाल ही में माघ पूर्णिमा के मौके पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने गढ़ पर जाकर दर्शन किए.
इसके बावजूद, हाजी मलंग की दरगाह आज भी सभी जातियों, धर्मों और पंथों के लोगों के लिए आस्था की जगह है, जहां हर साल हजारों लोग दर्शन के लिए आते हैं. दरगाह के परिसर में ही उनके पांच वफादार साथियों की कब्रें हैं, जिन्हें 'पंच पीर' (पीर माची) के नाम से जाना जाता है. सूफीवाद की खूबसूरती और मानवीय मूल्यों को बयां करने वाला एक मशहूर शेर उनकी दरगाह के पास लिखा है जो आज भी लोगों को याद है:
"किसी दर्दंद के काम आ,
किसी डूबते को उछाल दे;
ये निगाह-ए-मस्त की मस्तियां,
किसी बदनसीब पे डाल दे"
इसका मतलब यह है कि किसी जरूरतमंद के काम आना और डूबते को सहारा देना ही इंसानी ज़िंदगी का असली मकसद है.