Exclusive interview - 2 : मुफ्ती अहमद नादिर कासमी का नजरिया, इस तरह हल हो सकते हैं भारतीय मुस्लिमों के मसाइल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-06-2023
Exclusive interview - 2 : मुफ्ती अहमद नादिर कासमी का नजरिया, इस तरह हल हो सकते हैं भारतीय मुस्लिमों के मसाइल
Exclusive interview - 2 : मुफ्ती अहमद नादिर कासमी का नजरिया, इस तरह हल हो सकते हैं भारतीय मुस्लिमों के मसाइल

 


भारत दुनिया की कई तहजीबों का गहवारा है. हिंदुस्तानी चमन को कई धर्मों और संस्कृतियों के फूल सदियों से खुशबूआब करते रहे. इसलिए यहां साझा तौर पर गंगा-जमुनी तहजीब भी अमल में आई. मगर हिंदुस्तानी मुसलमानों के कई मसाइल पर अलग से इज्तिहाद और गौर-ओ-फिक्र की दरकार जान पड़ती है. इस बारे में आवाज-द वॉयस के सीनियर खबरनवीस अब्दुल हई खान ने तफसील से दिल्ली की इस्लामिक फिकह अकादमी के मुफ्ती अहमद नादिर कासमी साहब से गुफ्तगू की. इस बातचीत के चुनिंदा नुक्तों की दूसरी किश्त हाजिर हैः

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प्रश्नः मुस्लिम देशों में इस्लामिक विवाद उठे, लेकिन वहां इस्लामिक ऑथारिट्री थी. इसलिए उन्होंने इन मसाइल को अपने-अपने स्तर पर हल कर लिया, लेकिन भारत में ऐसे मसाइल हल नहीं हुए. क्या उसे देखकर हम यहां तजवीज कर सकते हैं. जैसे एहानत-ए-रसूल (रसूलुल्लाह सअव) पर बहुत सारे मुल्क में है कि फांसी की सजा दे दो, बहुत सारी जगहों पर है कि दस साल की सजा, कहीं पर दो साल की सजा है. इसमें बहुत इख्तिलाफ है. दूसरा मामला तलाक का है, मिस्र में चार शादियां नहीं हो सकती हैं, सिर्फ एक ही शादी हो सकती है. बाकी देशों में इस पर कोई चर्चा नहीं की गई है. क्या इसमें यकसानियत पैदा नहीं की जा सकती है.

उत्तर: देखिए, जो मुल्क कुरान व हदीस के खिलाफ, उससे हटकर अगर कानून बना लेता है. उनका इस्लाम दूसरों के लिए आइडियल नहीं है. चूंकि ये बात तय है कि इस्लाम में आइडियल जो है, वह काबिल-ए-कबूल मुसलमानों के लिए सिर्फ उसूल हैं कि कुरान में उसके बारे में क्या हुक्म है और रसूल सअव ने उसके बारे में क्या फरमाया है. किसी हुकूमत ने अपने यहां क्या कानून बनाया या वह मुसलमानों के लिए काबिल-ए-कबूल नहीं है, बल्कि उससे हटकर कोई मुल्क में कोई कानून बनाया गया है, तो एक मुसलमान का मुसलमान होने की हैसियत से वह उसका विरोध करेगा कि ये कानून सही नहीं है, उसको इस्लामी कानून नहीं कहा जा सकता है. (चाहे) सउदी अरब क्यूं न हो, कोई भी देश हो, अगर कुरान के खिलाफ कोई हुक्म कायम करता है, मुसलमान मुल्क भी है, तो (भी) उसको इस्लामी नहीं कहा जाएगा और न ही वह काबिल-ए-कबूल होगा. इस्लाम अपनी जगह कायम है. इस्लाम तो वही है, जो कुरान-ए-करीम में है और रसूल की सुन्नत में है.

प्रश्नः अगर किसी मसले पर इत्तेफाक हो गया, तो मुसलमानों में उसको नाफिज करने का क्या निजाम है?

उत्तरः जिस तरह पार्लियामेंट में कानून बनता है और पार्लियामेंट के कानून को एक्सप्लेन करना, उसका जो कार्यान्वयन है, वह कोर्ट, अदालत की जिम्मेदारी होती है. तो इसी तरह फिकह, उसको भी नाफिज कराने का जो हुक्म बयान हुआ, उसी तरह मुस्लिम अथॉरिटी की है कि जिस मुल्क में मुसलमान हो, उसे फलो करें. लेकिन इससे बड़ी अथॉरिटी जो है इस्लाम में है नजरिये की है, अकीदे की है. सबसे बड़ी अथॉरिटी जो हुक्म-ए-शरी को नाफिज करने वाली अथॉरिटी है, वह इंसान का इस्लाम पर पुख्ता इरादा और यकीन है. वही उसको मुआशरे पर सबसे पहले नाफिज कराता है.


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उलेमा और अइम्मा या और जो इदारे हैं, जैसे दारुल कजा है, फतवा डिपार्टमेंट है, ये तो सिर्फ बताते हैं कि शरीयत का ये हुक्म है. लेकिन मुआशरे पर जो नाफिज करता है, वह सिर्फ उस मुआशरे का ईमानी जज्बा करता है. मिसाल के तौर पर कुरान का एक हुक्म है कि किसी का देहांत हो गया. उसके दो बच्चा और बच्ची है उसकी जायदाद है. बेटा कहेगा कि मैं ले लूं, बेटी कहेगी मैं ले लूं. इसके बारे में कुरान में साफ तौर पर कहा गया है.

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इस हुक्म को अदालत हमारे ऊपर नाफिज नहीं करेगी. कोई दारुल इफ्ता ये नहीं कहेगा कि तुम उसको अपने ऊपर नाफिज करो. वह तो सिर्फ बतालाएगा कि शरीयत का ये हुक्म है कि अगर किसी के बाप का इंतकाल हो जाए, तो बाप ने जो जायदाद छोड़ी है, तो उसमें हिस्से बयान कर दिए गए हैं.

हुक्म बयान कर दिया गया, अब उसको नाफिज करना खुद का ईमानी जज्बा है. सबसे बड़ी खूबी ये है कि इस्लामिक कानून को मुस्लिम समाज पर नाफिज कोई संस्था नहीं करती है, बल्कि खुद उसका ईमानी जज्बा करता है.

प्रश्नः इज्तिहाद को बहुत से लोग मानते हैं और बहुत से लोग नहीं मानते हैं. किसी को कोई मसला मुआफिक मिलता है, किसी दूसरे मसलक के आदमी को वह उससे मसला पूछ लेता है और तस्लीम कर लेता है. बहुत से छोटे छोटे मदरसे हैं, मुफ्ती हैं. तो किस पर भरोसा करना चाहिए. इज्तिहाद के लिए किस तरह की काबिलियत की जरूरत है.

उत्तरः देखिए, मस्तहिद वह होता है, जिसके पास किताबुल्लाह का इल्म हो, कुरान-ए-करीम को पढ़ा हो और कुरान-ए-करीम को समझा हो. कुरान की आयत उनके सामने हो. रसूलुल्लाह सअव को वह पढ़ा हो. अरबी जबान व अदब से वाकिफ हो और तफसीर के उसूल नासिख व मंसूख को वह जानता हो. इज्मा से वाकिफ हो कि किन मसाइल पर उम्मत ने इज्मा कर लिया है, ताकि वह उसकी खिलाफ न जाए और जो उसूल माहिर ए फुकहा ने जो फिकही सरमाया उसके सामने रखा है, उस पर भी उसकी नजर हो.


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इतनी चीजों पर एक शख्स नजर रखता है, वह पढ़कर आया है और वह उसका माहिर है, तो वह आदमी इस बात की अहलियत रखता है कि वह किसी भी मसले के बारे में कुरान व हदीस की रोशनी में सोचे और उसका हुक्म मुकर्रर करें.

ये हुक्म मुकर्रर करना इज्तिहाद है और इसके करने वाले शख्स को मुज्तहिद कहते हैं. इज्तिहाद का अमल शख्सी हो सकता है, यानी एक कोई अच्छा काबिल मुफ्ती है, उसने बहुत गौर व फिक्र करके मसले का हुक्म बयान किया है. कई मुफ्तियान भी मिलकर कर सकते हैं, इसकी नजीर हमारे यहां मौजूद हैं.


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कोई भी ऐसा संस्था, जो इस बारे में शोहरत रखता हो, नदवा, मुबारकपुर, देवबंद, दिल्ली के संस्थान समेत हर शहर में दारुल इफ्ता मौजूद हैं और वहां के लोग उससे वाकिफ हैं कि ये हमारे यहां अहकाम-ए-शरीया बताने के इदारे हैं.

वहां पर अच्छे, सलाहियत और मुफ्तियान इकिराम मौजूद हैं, जो कुरान व हदीस और इज्मा और कयास की रोशनी में अइम्मा की राय को सामने रखते हुए हुक्म-ए-शरी बताते हैं, तो वहां जाकर पुछ सकते हैं. किसी गैर मारूफ जगह पर नहीं जाना चाहिए, ताकि हुक्म शरई की अहमियत न घट जाए.

प्रश्नः जो बड़े मसाइल हैं, खासतौर पर जबीहा, अजान समेत कई ऐसे विषय हैं, जिन पर अभी तक कोई इत्तेफाक नहीं हुआ है. इस बारे में आपकी क्या राय है?

उत्तरः जबीहे का मसला इज्तिहाद के दायरे में नहीं आता है. ये खुद इंसान की, समाज की अपनी जरूरत से ताल्लुक है और मजहब पर अमल करने से है. हमारे संविधान में आर्टिकल 90 है, उसके मुताबिक हर शख्स को अपने मजहब के मुताबिक अमल करने की इजाजत है. लाउडस्पीकर का मसला भी इज्तिहाद के दायरे में नहीं आता है. चूंकि शरीयत ने ये नहीं कहा है कि लाउडस्पीकर से अजान दो, शरीयत ने सिर्फ अजान का हुक्म दिया है. चूंकि आबादी बढ़ गई है. इसलिए दूर तक अजान की आवाज पहुंचाने के लिए माइक का इस्तेमाल होता है, ताकि लोग नमाज के लिए हाजिर हो जाएं.

(ट्रांसक्रिप्टः मोहम्मद अकरम)


 


 


 


 


 



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