किताब समीक्षा : Search of Oneness: मूसा रज़ा की रूहानी विरासत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 03-05-2026
Book Review: In Search of Oneness: The Spiritual Legacy of Musa Raza
Book Review: In Search of Oneness: The Spiritual Legacy of Musa Raza

 

आमिर सुहैल वानी

आज के दौर में धर्म के नाम पर दूरियां बढ़ती जा रही हैं। ऐसे समय में मूसा रज़ा की किताब 'इन सर्च ऑफ वननेस' (Search of Oneness: The Bhagavad Gita and the Quran through Sufi Eyes) एक ठंडी हवा के झोंके की तरह है। यह किताब भगवद गीता और कुरान के बीच एक आध्यात्मिक पुल बनाने का काम करती है। मूसा रज़ा ने इन दो पवित्र ग्रंथों को एक सूफी की नज़र से देखा है। यह किताब सिर्फ दो धर्मों की तुलना नहीं है। यह सच की तलाश में निकली एक गहरी रूहानी यात्रा है।

ddआज की दुनिया में जब हर तरफ शक और नफरत का माहौल है, रज़ा की आवाज़ शांति और बदलाव की बात करती है। उन्होंने यह किताब किसी बहस को जीतने या अपने धर्म को सही साबित करने के लिए नहीं लिखी। उनका मकसद यह याद दिलाना है कि धर्म दीवारें खड़ी करने के लिए नहीं, बल्कि इंसान को खुदा से जोड़ने के लिए होता है। यह किताब हमें अपनी आस्था को नए नज़रिए से देखने की दावत देती है।

रज़ा का काम एक आध्यात्मिक डायरी जैसा महसूस होता है। वे अपनी इस्लामी पहचान को छोड़े बिना दूसरे धर्मों के करीब जाते हैं। हिंदू दर्शन के प्रति उनका नज़रिया बहुत ही विनम्र और जिज्ञासा से भरा है। वे किसी श्रेष्ठता की भावना से नहीं, बल्कि एक सीखने वाले की तरह गीता को पढ़ते हैं। एक साधक के लिए यह बड़ी चुनौती होती है कि वह अपने धर्म पर अडिग रहते हुए भी दूसरे धर्म के सच को स्वीकार करे। रज़ा ने इस संतुलन को बखूबी निभाया है।

ssजब रज़ा भगवद गीता की शिक्षाओं में डूबते हैं, तो उन्हें वहां वही नैतिक और आध्यात्मिक सिद्धांत मिलते हैं जो कुरान में हैं। उन्होंने इन समानताओं को जबरदस्ती नहीं थोपा है। ये उनकी अपनी साधना और समझ से निकली हैं। इसमें सूफीवाद का गहरा असर दिखता है। सूफीवाद धर्म के बाहरी नियमों से आगे बढ़कर उसके रूहानी और भीतरी अनुभव पर ज़ोर देता है। रज़ा बताते हैं कि जब आप अपनी जड़ें गहरी करते हैं, तो आप कुदरती तौर पर दूसरों से जुड़ जाते हैं।

किताब का मुख्य विचार सूफी दर्शन 'वहदत अल-वजूद' (अस्तित्व की एकता) पर टिका है। इसका मतलब है कि पूरा ब्रह्मांड एक ही परम सत्य का रूप है। इसी नज़रिए से रज़ा गीता और कुरान को पढ़ते हैं। इस चश्मे से देखने पर मजहबी मतभेद छोटे लगने लगते हैं और एक साझा रूहानी रिश्ता उभर कर सामने आता है।

उदाहरण के लिए, गीता का 'निष्काम कर्म' यानी फल की चिंता किए बिना काम करना, कुरान के 'इखलास' यानी बिना दिखावे के नेक काम करने जैसा ही है। इसी तरह इस्लाम में 'ज़िक्र' (ईश्वर की याद) और हिंदू धर्म में 'साधना' या 'भक्ति' का मकसद एक ही है,हर पल उस परम सत्ता का अहसास करना। सबसे बड़ी समानता 'समर्पण' में दिखती है। 'इस्लाम' का मतलब ही खुदा की मर्जी के आगे झुकना है। वहीं गीता का सार भी 'शरणागति' यानी ईश्वर की शरण में जाना है। रज़ा यहां मतभेदों को मिटाना नहीं चाहते, बल्कि यह दिखाना चाहते हैं कि दोनों रास्तों का लक्ष्य एक ही है।

भारत के संदर्भ में इस किताब का सामाजिक महत्व बहुत ज्यादा है। रज़ा हिंदू-मुस्लिम रिश्तों को राजनीति या इतिहास के चश्मे से नहीं देखते। वे एक रूहानी विकल्प पेश करते हैं। वे सुझाव देते हैं कि एकता का रास्ता शक्ति या सत्ता की बहस से नहीं निकलेगा। यह एक-दूसरे के भीतर छिपे ऊंचे आदर्शों को समझने से आएगा।

इस मामले में मूसा रज़ा कबीर और गुरु नानक जैसे महान संतों की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। इन महापुरुषों ने भी कर्मकांडों के ऊपर उठकर ईश्वर से सीधे प्रेम और जुड़ाव पर ज़ोर दिया था। रज़ा धर्म के बाहरी प्रतीकों के बजाय उसकी रूह पर ध्यान देते हैं। आज के समय में जब पहचान के नाम पर राजनीति होती है, तब उनकी यह सोच बहुत ज़रूरी हो जाती है।

किताब यह नहीं कहती कि सभी धर्म एक जैसे हैं या उनकी विशिष्टता खत्म कर देनी चाहिए। इसके बजाय रज़ा एक परिपक्व नज़रिया देते हैं। वे कहते हैं कि सच्ची एकता का मतलब 'समानता' नहीं है। असल एकता यह पहचानने में है कि अलग-अलग रास्ते भी एक ही मंज़िल तक ले जा सकते हैं। यह नज़रिया सम्मान और भाईचारे पर आधारित है।

रज़ा की लिखने की शैली बहुत शांत और ध्यान लगाने वाली है। उन्होंने इसमें मुश्किल शब्दों या किताबी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया है। उनकी भाषा सरल और साफ है। इसे आम पाठक भी आसानी से समझ सकता है। उनकी बातें तर्क के बजाय दिल को छूती हैं।

किताब में रज़ा ने अपने जीवन के अनुभवों को भी शामिल किया है। उन्होंने अपने गुरुओं से मुलाकात, मन में उठे शक और फिर मिली रोशनी का ज़िक्र किया है। इससे किताब बहुत निजी और सच्ची लगती है। हालांकि कुछ विद्वानों को लग सकता है कि रज़ा ने केवल समानताओं पर बात की है और मतभेदों को टाल दिया है। लेकिन यह लेखक का जानबूझकर लिया गया फैसला है। उनका मकसद बहस करना नहीं, बल्कि रोशनी फैलाना है।

d

आज के माहौल में 'इन सर्च ऑफ वननेस' एक बड़ी सांस्कृतिक भूमिका निभाती है। यह हमें याद दिलाती है कि भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास केवल संघर्षों का नहीं रहा है। यह संवाद, आपसी प्रभाव और साझा तलाश का भी इतिहास है। गीता और कुरान को एक साथ रखकर रज़ा हमें अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि जिसे हम 'दूसरा' समझते हैं, वह भी सच की तलाश में निकला हमारा साथी ही है।

अंत में, यह किताब संभावनाओं की बात करती है। यह बताती है कि ऐतिहासिक दूरियों और मजहबी फर्क के नीचे एक गहरी एकता छिपी है। यह किताब आपकी सोच को बदलने की ताकत रखती है। अगर आप धर्मों के बीच के साझा सच और आपसी प्रेम में यकीन रखते हैं, तो यह किताब आपके लिए एक कीमती तोहफा है।