अवैध इबादतगाहों को लेकर क़ुरान, हदीस और खलीफ़ा का क्या है हुक्म ?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 13-01-2026
What do the Quran, Hadith, and the Caliphs say about illegal places of worship?
What do the Quran, Hadith, and the Caliphs say about illegal places of worship?

 

dसमीर दि. शेख

कुछ दिन पहले राजधानी दिल्ली में प्रशासन की तरफ़ से अतिक्रमण के ख़िलाफ़ चलाई गई मुहिम चर्चा और विवाद का विषय बन गई। ख़ास तौर पर मुस्लिम-बहुल इलाक़े में हुई इस कार्रवाई से कुछ वक़्त के लिए तनाव पैदा हो गया। चूंकि प्रशासन ने लोगों को भरोसे में लिए बिना कार्रवाई की, इसलिए अफ़वाह फैल गई कि मस्जिद को नुक़सान पहुंचा है और नतीजतन पथराव जैसी हिंसक घटनाएं हुईं। इस मामले को सिर्फ़ पुलिस और क़ानून-व्यवस्था के नज़रिए से देखना काफ़ी नहीं होगा। अब वक़्त आ गया है कि मुस्लिम समाज भी इस बारे में गंभीरता से आत्म-मंथन करे।

संवाद की कमी और बढ़ता डर

प्रशासन की तरफ़ से ऐसी कार्रवाई करते वक़्त स्थानीय लोगों से बातचीत की कमी होना चिंता की बात है। यही वजह है कि क़ानूनी कार्रवाई को भी 'धार्मिक निशाने' के तौर पर देखा जाता है और ग़लत अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है। 'बुलडोज़र जस्टिस' के आम हो जाने से प्रशासन पर समुदाय का भरोसा और भी डगमगा जाता है।

एक ज़माने में पुलिस और मुस्लिम समुदाय के बीच भरोसे का रिश्ता बनाने के लिए महाराष्ट्र में 'मोहल्ला कमिटी' या संवाद मुहिम चलाई जाती थी, वैसी कोशिशें अब होती नहीं दिखतीं। नतीजा यह होता है कि प्रशासन और समुदाय के बीच बातचीत की खाई बढ़ती है और अफ़वाहें फैलती हैं।

भले ही इस बार कार्रवाई के दौरान किसी धार्मिक इमारत को नुक़सान नहीं पहुंचा, लेकिन इस बहाने मुस्लिम बुद्धिजीवियों को एक बुनियादी सवाल पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए। वह सवाल यह है कि नाजाएज़ ज़मीन पर बनी धार्मिक जगहों को लेकर इस्लाम का नज़रिया असल में क्या है?

दूसरों की संपत्ति हड़पना क़ुरान के ख़िलाफ़

किसी भी ग़ैर-क़ानूनी या अनैतिक काम का समर्थन इस्लाम में कहीं नहीं मिलता। अगर कोई इबादतगाह या मस्जिद किसी दूसरे की ज़मीन हड़प कर या सार्वजनिक जगह पर क़ब्ज़ा करके बनाई गई हो, तो वह इस्लाम की नज़र में पूरी तरह नाजाएज़ है। इस्लाम की बुनियाद ही 'न्याय' (अदल) पर टिकी है। 'ज़ुल्म' यानी अन्याय करके की गई कोई भी प्रार्थना या इबादत अल्लाह क़ुबूल नहीं करता।

क़ुरान में इस पर साफ़ हिदायत दी गई है। "एक-दूसरे की संपत्ति अन्याय से (नाजाएज़ तरीक़े से) मत खाओ।" (सूरह अल-बक़रह 2:188)। साथ ही, अल्लाह ने ताकीद की है कि, "बेशक, अल्लाह ज़ुल्म करने वालों को पसंद नहीं करता।" (सूरह आल-ए-इमरान 3:57)। इन आयतों से यह साफ़ होता है कि अगर मस्जिद की बुनियाद ही अनैतिकता या चोरी की ज़मीन पर टिकी हो, तो उस इमारत की नैतिक और रूहानी हैसियत ही ख़त्म हो जाती है।

अतिक्रमण पर पैगंबर की हदीस में सख़्त चेतावनी

संपत्ति के हक़ को लेकर पैगंबर मुहम्मद (स.) का नज़रिया बेहद न्यायपूर्ण और सख़्त था। बुखारी और मुस्लिम शरीफ़ की एक मशहूर हदीस में पैगंबर कहते हैं: "जिसने किसी की एक बालिश्त (थोड़ी सी) ज़मीन भी अन्याय से हड़पी होगी, उसे क़यामत के दिन सात ज़मीनों के नीचे धंसा दिया जाएगा।" (सहीह बुखारी 2452)। किसी भी हाल में दूसरे के हक़ को मारने से मना करने वाली यह सीख है।

दूसरी अहम हदीस यह है कि, "अल्लाह पाक है और वह सिर्फ़ पाक चीज़ों को ही क़ुबूल करता है।" (सहीह मुस्लिम 1015)। कई इस्लामी विद्वानों ने कहा है कि अगर मस्जिद बनाने के लिए इस्तेमाल की गई ज़मीन या पैसा 'हराम' (नाजाएज़) है, तो ऐसी इबादत अल्लाह के दरबार में मंज़ूर नहीं होती।

इतिहास के पन्ने: खलीफ़ाओं का आदर्श न्याय

इस संदर्भ में इतिहास के उदाहरण भी बहुत कुछ कहते हैं। इस्लाम के दूसरे खलीफ़ा उमर इब्न अल-खत्ताब के दौर में एक मस्जिद का कुछ हिस्सा गिराने का हुक्म दिया गया था, क्योंकि वह मस्जिद एक यहूदी व्यक्ति की ज़मीन पर बिना इजाज़त बनाई गई थी। खलीफ़ा ने उस यहूदी को इंसाफ़ देना ज़्यादा ज़रूरी समझा।

ऐसा ही दूसरा उदाहरण खलीफ़ा उमर इब्न अब्दुल अज़ीज़ के दौर का है। उन्होंने दमिश्क की मशहूर उमय्या मस्जिद का कुछ हिस्सा गिराकर वह ज़मीन वहां के ईसाई समुदाय को वापस करने का हुक्म दिया था, क्योंकि यह बात सामने आई थी कि वह ज़मीन ज़बरदस्ती ली गई थी। ये दोनों उदाहरण यही बताते हैं कि इस्लाम में 'हक़ूक़-उल-इबाद' (मानवाधिकार) और न्याय को धार्मिक इमारतों से भी ऊपर माना गया है।

आधुनिक विद्वान और शरीयत का मक़सद

आज के आधुनिक दौर में भी डॉ. मोहम्मद हमीदुल्लाह और यूसुफ अल-क़रदावी जैसे मशहूर विद्वानों ने यही बात कही है कि मस्जिदें सिर्फ़ क़ानूनी और नैतिक तरीक़े से हासिल की गई ज़मीन पर ही बनाई जानी चाहिए। आम लोगों के हित के आड़े आने वाला या बेकायदे किया गया निर्माण 'मक़ासिद-अल-शरीयत' यानी शरीयत के असल मक़सद के ख़िलाफ़ है।

क़ुरान की एक अहम आयत में कहा गया है: "फिर (दोनों में) कौन बेहतर है? वह जिसने अपनी इमारत की बुनियाद अल्लाह के डर और उसकी रज़ा पर रखी, या वह जिसने अपनी इमारत की बुनियाद एक ऐसी खाई के किनारे पर रखी जो गिरने ही वाली है, फिर वह उसे लेकर जहन्नम की आग में गिर पड़ी? अल्लाह ज़ालिम लोगों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता।" (सूरह अत-तौबा 9:109-110)।

ज़रूरत आत्म-मंथन और नए नज़रिए की

इसलिए मुस्लिम समुदाय को अब जज़्बात में बहकर हिंसक विरोध करने के बजाय पैगंबर की संवादवाली नीति को अपनाने की और उनके आज्ञा पर अमल करने की ज़रूरत है। प्रशासन से क़ानूनी लड़ाई लड़ना लोकतांत्रिक अधिकार ज़रूर है, लेकिन नाजाएज़ निर्माण को 'धर्म' मानकर उसका बचाव करना ख़ुद अपने ही धर्म के उसूलों के ख़िलाफ़ जाना है, यह भी समाज को समझना होगा। इसलिए बिना सोचे-समझे प्रशासन के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया देने से, खास क्र हिंसक प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए।

समाज को अपना चरित्र ऐसा बनाना चाहिए कि उनके किसी भी काम से दूसरे के हक़ का उल्लंघन न हो। ग़लत चीज़ों को छोड़कर और सच्चाई, संविधान व क़ानून का रास्ता अपनाकर ही हम एक इज़्ज़तदार और शांतिप्रिय समाज के तौर पर अपनी पहचान बना सकेंगे।

(लेखक 'आवाज़ द वाॅयस- मराठी' के संपादक  हैं।)