इस बार ईरान में विरोध प्रदर्शन क्यों हैं ऐतिहासिक और अभूतपूर्व ?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 13-01-2026
Why are the protests in Iran this time historic and unprecedented?
Why are the protests in Iran this time historic and unprecedented?

 

गिरजाशंकर शुक्ल

ईरान एक बार फिर उबाल पर है, लेकिन इस बार हालात पहले जैसे नहीं हैं। विश्लेषकों, समाजशास्त्रियों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार दिसंबर 2025 से शुरू हुए सरकार-विरोधी प्रदर्शन इस्लामी गणराज्य के 47 वर्षों के इतिहास में सबसे व्यापक, तीव्र और निर्णायक साबित हो रहे हैं। यह आंदोलन केवल संख्या या फैलाव के कारण अलग नहीं है, बल्कि इसकी राजनीतिक मांगों की स्पष्टता, सामाजिक हिस्सेदारी की विविधता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं की तीव्रता इसे पिछले सभी आंदोलनों से अलग खड़ा करती है।

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सबसे बड़ा बदलाव इसके देशव्यापी स्वरूप में दिखता है। यह विरोध केवल तेहरान, इस्फ़हान या मशहद जैसे बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छोटे कस्बों और दूरदराज़ इलाकों तक समान तीव्रता के साथ फैल चुका है। समाजशास्त्री एली खोरसंदफर के अनुसार, पहली बार ऐसे स्थान भी आंदोलन का हिस्सा बने हैं जिनका नाम पहले राजनीतिक नक्शे पर शायद ही दिखा हो। अतीत में ऐसा नहीं था—2009 का ग्रीन मूवमेंट शहरी मध्यम वर्ग और चुनावी धांधली के आरोपों तक सीमित रहा, 2017 और 2019 के आंदोलन मुख्यतः गरीब और हाशिये के इलाकों में केंद्रित थे, जबकि 2022 में महसा अमिनी की मौत के बाद उठा उभार महिलाओं के अधिकारों और नैतिक पुलिस के विरोध का प्रतीक था। इसके उलट, मौजूदा आंदोलन इन सभी वर्गों, मुद्दों और क्षेत्रों को एक साथ जोड़ता नज़र आ रहा है।

इस बार विरोध की चिंगारी आर्थिक संकट से भड़की। दिसंबर के अंत में तेहरान के ऐतिहासिक बाज़ार में व्यापारियों ने गिरती रियाल, डॉलर के मुकाबले उसकी कमजोरी और बेकाबू महंगाई के खिलाफ हड़ताल की। बेरोज़गारी और जीवन यापन की बढ़ती लागत ने आम लोगों के असंतोष को सड़कों पर ला दिया। लेकिन कुछ ही दिनों में आंदोलन का चरित्र बदल गया। नारे महंगाई से आगे बढ़कर सीधे सत्ता संरचना पर प्रहार करने लगे। “तानाशाही मुर्दाबाद” और “खामेनेई को हटाओ” जैसे नारे, जो पहले अकल्पनीय थे, अब खुलेआम और व्यापक रूप से सुनाई देने लगे। लाखों लोग, खासकर दबाव में जी रहा मध्यम वर्ग, इस आंदोलन से जुड़ गया।

एक और महत्वपूर्ण बदलाव नेतृत्व के प्रश्न पर दिखता है। 2022 के आंदोलन की बड़ी कमजोरी स्पष्ट नेतृत्व का अभाव था, जिसके कारण वह धीरे-धीरे बिखर गया। इस बार निर्वासित ईरानी नेता रज़ा पहलवी की सक्रियता चर्चा में है। 1979 की इस्लामी क्रांति में सत्ता से हटाए गए शाह के पुत्र होने के बावजूद, उनके बयानों को सोशल मीडिया के ज़रिये देश के भीतर व्यापक प्रसार मिल रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह समर्थन राजशाही बहाली की आकांक्षा से अधिक इस निराशा की अभिव्यक्ति है, जो इस्लामी शासन के किसी ठोस विकल्प की कमी से पैदा हुई है। फिर भी, बड़े शहरों में प्रदर्शनों की तीव्रता बताती है कि सत्ता के बाद के विकल्प की संभावना लोगों को आंदोलन में टिके रहने का मनोबल दे रही है।

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अंतरराष्ट्रीय आयाम भी इस आंदोलन को अभूतपूर्व बनाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खुली और आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करते हुए यहां तक कह दिया है कि यदि ईरानी अधिकारी हिंसक कार्रवाई करते हैं तो अमेरिका हस्तक्षेप पर विचार कर सकता है। ईरान के आंदोलनों के इतिहास में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का ऐसा स्पष्ट रुख दुर्लभ है। 2009 में प्रदर्शनकारियों ने “ओबामा, या तो उनके साथ या हमारे साथ” जैसे नारे लगाए थे और बाद में ओबामा ने समर्थन न करने पर खेद जताया था। इस बार ट्रंप ने न केवल समर्थन जताया, बल्कि धमकी भी दी।

यह सब ऐसे समय हो रहा है जब ईरान क्षेत्रीय स्तर पर पहले से कहीं अधिक अलग-थलग है। सीरिया में बशर अल-असद सत्ता से बाहर हो चुके हैं, लेबनान में हिज़्बुल्लाह इज़राइली अभियानों से कमजोर पड़ा है और क्षेत्र में ईरान का प्रभाव सिमटता दिख रहा है। ऐसे में देश के भीतर उठती आवाज़ें सत्ता के लिए और भी चुनौतीपूर्ण बन गई हैं, क्योंकि अब प्रदर्शनकारी खुले तौर पर सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को हटाने की मांग कर रहे हैं।

यह आंदोलन हालिया 12 दिनों के इज़रायल युद्ध और अमेरिका-इज़रायल हमलों की पृष्ठभूमि में उभरा है। पत्रकार अब्बास अब्दी के अनुसार, यह सरकार के लिए राष्ट्रीय एकजुटता बनाने का अवसर हो सकता था, लेकिन वह इसे भुनाने में विफल रही। उलटे, पिछले साल के सैन्य घटनाक्रमों ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की साख को आम जनता की नज़र में नुकसान पहुँचाया है।

इस आंदोलन का सबसे निर्णायक पहलू महिलाओं की भूमिका है। सड़कों पर उतरी महिलाएँ इसे केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि डर से मुक्ति की प्रक्रिया मानती हैं। 2022 के बाद से उन्होंने यह साबित किया है कि दमनकारी सत्ता का भय टूट चुका है, और यही साहस इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है।

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कुल मिलाकर, आज का ईरान ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ से पीछे लौटना आसान नहीं। यह आंदोलन किसी एक कारण का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों से जमा असंतोष, दमन और निराशा का विस्फोट है। इसी वजह से इसे ईरान के इतिहास का सबसे गंभीर, व्यापक और संभावित रूप से निर्णायक जनउभार माना जा रहा है—एक ऐसा मोड़ जो देश की राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल सकता है।