Rewadi and Phulle bring back memories of childhood: Why is the festival of Lohri celebrated?
अर्सला खान/नई दिल्ली
जब सर्द हवाओं के बीच अलाव जलता है, रेवड़ी और फुल्ले बांटे जाते हैं और “सुंदर मुंदरिए” जैसे लोकगीत गूंजते हैं, तब समझ आ जाता है कि लोहड़ी आ गई है। यह त्योहार सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि यादों, परंपराओं और प्रकृति से जुड़े रिश्ते का जश्न है। खासकर उत्तर भारत और पंजाब में मनाई जाने वाली लोहड़ी लोगों के दिलों में खास जगह रखती है।
कब और क्यों मनाई जाती है लोहड़ी
लोहड़ी हर साल 13 जनवरी को मनाई जाती है। यह दिन सर्दियों के अंत और मौसम के बदलाव का संकेत देता है। इस समय के बाद दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और ठंड कम होने लगती है। यही कारण है कि लोहड़ी को प्रकृति के बदलाव का त्योहार भी कहा जाता है। लोग इस दिन आग जलाकर सूर्य और अग्नि देवता का आभार व्यक्त करते हैं, क्योंकि इन्हें जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।
लोहड़ी का ऐतिहासिक और लोककथाओं से जुड़ा रिश्ता
लोहड़ी का इतिहास लोककथाओं से जुड़ा हुआ है। पंजाब की लोकसंस्कृति में दुल्ला भट्टी का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। कहा जाता है कि वह गरीबों की मदद करता था और जरूरतमंद लड़कियों की रक्षा करता था। लोकगीतों में उसका नाम आज भी गाया जाता है। “सुंदर मुंदरिए हो…” गीत के जरिए लोग उसकी बहादुरी और इंसानियत को याद करते हैं। इसी वजह से लोहड़ी को सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों से जुड़ा पर्व भी माना जाता है।
अलाव और अग्नि पूजा का महत्व
लोहड़ी का सबसे खास हिस्सा होता है अलाव। शाम होते ही लोग खुले स्थान पर आग जलाते हैं और उसके चारों ओर इकट्ठा होते हैं। अलाव में तिल, गुड़, रेवड़ी, फुल्ले और मूंगफली अर्पित की जाती है। माना जाता है कि आग में ये चीजें डालने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और घर में सुख-शांति आती है। अग्नि को साक्षी मानकर लोग अपने दुख, चिंताएं और बीती ठंड को विदा करते हैं और नए समय का स्वागत करते हैं।
रेवड़ी, फुल्ले और तिल-गुड़ का स्वाद
लोहड़ी का नाम सुनते ही सबसे पहले रेवड़ी, फुल्ले, मूंगफली और तिल-गुड़ याद आते हैं। ये चीजें सर्दियों में शरीर को गर्म रखने में मदद करती हैं, इसलिए इनका इस त्योहार से खास संबंध है। बच्चों के लिए यह त्योहार किसी खुशी से कम नहीं होता। मिठाइयां बांटना, गीत गाना और आग के चारों ओर घूमना बचपन की मीठी यादों को ताजा कर देता है।
किसानों के लिए क्यों खास है लोहड़ी
लोहड़ी का किसानों से गहरा रिश्ता है। यह पर्व रबी की फसल से जुड़ा हुआ है। इस समय गेहूं की फसल खेतों में लहलहाने लगती है। किसान इस दिन अच्छी पैदावार की उम्मीद के साथ उत्सव मनाते हैं। उनके लिए लोहड़ी मेहनत, उम्मीद और खुशहाली का प्रतीक है। यह त्योहार किसानों को उनके परिश्रम का सम्मान देता है।
नवविवाहित और नवजात शिशुओं के लिए विशेष महत्व
लोहड़ी को नई शुरुआत का त्योहार भी माना जाता है। जिन परिवारों में हाल ही में शादी हुई होती है या जहां बच्चे का जन्म हुआ होता है, उनके लिए यह पर्व बहुत खास होता है। पहली लोहड़ी को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। रिश्तेदार और दोस्त आशीर्वाद देते हैं और खुशियां साझा करते हैं। यह परंपरा समाज में आपसी रिश्तों को मजबूत बनाती है।
आज के समय में लोहड़ी का बदलता स्वरूप
समय के साथ लोहड़ी मनाने का तरीका बदला है, लेकिन इसका भाव वही है। अब शहरों में लोग सोसाइटी, छतों या पार्कों में लोहड़ी मनाते हैं। फिर भी अलाव, गीत और मिठाइयों की परंपरा आज भी जिंदा है। यह त्योहार लोगों को एक साथ बैठने, हंसने और एक-दूसरे से जुड़ने का मौका देता है।
लोहड़ी का असली संदेश
लोहड़ी हमें यह सिखाती है कि जीवन में बदलाव जरूरी है। जैसे सर्दी के बाद गर्मी आती है, वैसे ही कठिन समय के बाद खुशियां भी आती हैं। रेवड़ी और फुल्ले सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि साझा की गई खुशी का प्रतीक हैं। अलाव की आग हमें सिखाती है कि साथ मिलकर हर ठंड और हर मुश्किल को हराया जा सकता है।
परंपरा, यादें और अपनापन
लोहड़ी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि बचपन की यादों, परिवार के साथ बिताए पलों और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और बताता है कि परंपराएं हमें सिर्फ बीते समय से नहीं, बल्कि एक-दूसरे से भी जोड़ती हैं। यही वजह है कि लोहड़ी आज भी उतनी ही खास है, जितनी पहले हुआ करती थी।