अब्दुल्लाह मंसूर
26 जनवरी कोई रस्मी तारीख़ नहीं है। यह वह दिन है जब हिंदुस्तान ने सदियों पुरानी मनमानी सत्ता, जातिगत ऊँच-नीच और धार्मिक वर्चस्व की व्यवस्था से खुद को आज़ाद कर एक लिखित संविधान के ज़रिये नया सामाजिक समझौता किया। इसी दिन हमने तय किया कि अब यह देश राजा, सामंत, मौलवी या किसी एक गिरोह की मर्ज़ी से नहीं चलेगा, बल्कि एक ऐसे दस्तावेज़ से चलेगा जिसे जनता ने खुद अपने लिए बनाया है। संविधान की ज़रूरत के दो बड़े कारण थे।
पहला, देश की संप्रभुता और एकता। आज़ादी से पहले भारत अंग्रेज़ों और रजवाड़ों के अधीन था। हर इलाके के अलग नियम थे, हर ताक़तवर की अपनी मर्ज़ी कानून थी। संविधान ने साफ़ कर दिया कि अब भारत किसी के अधीन नहीं है। सत्ता का स्रोत जनता है और कानून सब पर बराबर लागू होगा।
दूसरा और ज़्यादा गहरा कारण था संविधान का आत्म-बंधन होना। इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे कोई व्यक्ति नशा छोड़ने के लिए खुद पर पाबंदी लगाता है और दूसरों से कहता है कि “अगर मैं बहकूँ, तो मुझे रोकना”, ठीक वैसे ही संविधान समाज को उसके उन्माद से बचाता है।
संविधान निर्माताओं को मालूम था कि कभी भी देश में ग़ुस्सा, डर या धार्मिक उन्माद फैल सकता है। ऐसे हालात में बहुमत भी ग़लत फ़ैसले कर सकता है। इसलिए संविधान सरकार और बहुमत दोनों पर लगाम लगाता है। यही ‘रूल ऑफ लॉ’ है, जहाँ ताक़त नहीं, कानून चलता है।
संविधान ने न्याय की परिभाषा ही बदल दी। पुराने समय में न्याय का मतलब बराबरी नहीं था। तब न्याय का अर्थ थाहर व्यक्ति को जन्म के आधार पर अपनी जाति और हैसियत के अनुसार जगह मिलती थी। नीचे वाले का काम ऊपर वाले की सेवा करना था।
संविधान ने इस पदानुक्रम को तोड़ा और कहा कि न्याय का मतलब है समानता, आज़ादी और भाईचारा। राजा और रंक, अमीर और ग़रीब कानून की नज़र में सब बराबर होंगे। यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा सामाजिक इंक़लाब था। डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट किया कि धर्मग्रंथ लोगों की निजी आस्था का विषय हो सकते हैं, लेकिन देश किसी धर्म से नहीं, संविधान से चलेगा। यही कारण है कि अगर सरकार या संसद कोई ऐसा कानून बनाए जो नागरिकों के मूल अधिकारों को छीनता हो, तो न्यायपालिका उसे रद्द कर सकती है। यह सुरक्षा संविधान देता है, परंपरा नहीं।

पसमांदा समाज और संविधान: सुरक्षा, हिस्सेदारी और भविष्य की लड़ाई
अगर संविधान न होता, तो पसमांदा समाज की आवाज़ आज भी धर्म की भीड़ में दबकर रह जाती। सदियों तक अशराफ़ वर्चस्व ने मुस्लिम समाज के भीतर जातिगत सच्चाइयों को छुपाया। बराबरी का दावा किया गया, लेकिन बराबरी कभी दी नहीं गई।
संविधान ने पहली बार पसमांदा समाज को धार्मिक पहचान से निकालकर नागरिक और वंचित वर्ग के रूप में पहचाना। अर्थात इसने मुस्लिम एकरूपता की मिथ को तोड़ा। अनुच्छेद 14, 15और 16राज्य को भेदभाव से रोकते हैं, लेकिन पसमांदा समाज के लिए सबसे निर्णायक भूमिका अनुच्छेद 340की रही।
इसी अनुच्छेद ने पिछड़े वर्गों की पहचान का रास्ता खोला। ‘पसमांदा’ शब्द का अर्थ है वे मुसलमान जो ‘पीछे छूट गए’ दलित और आदिवासी। इसे हम ‘बहुजन’ का ही पर्याय मान सकते हैं। काका कालेलकर आयोग और बाद में मंडल आयोग इसी संवैधानिक सोच के नतीजे थे। मंडल आयोग की 27प्रतिशत आरक्षण नीति में मुस्लिम OBC, यानी पसमांदा, की बड़ी हिस्सेदारी है। 1993के इंदिरा साहनी फ़ैसले ने इस व्यवस्था को संवैधानिक मजबूती दी।
सच्चर कमेटी (2006) ने यह साबित किया कि मुस्लिम OBC की सामाजिक और आर्थिक हालत बेहद पिछड़ी हुई है। इसके बावजूद संविधान ने पसमांदा समाज को विभाजनकारी राजनीति से बचाकर राष्ट्र-निर्माण का साझेदार बनाया।
आज अगर पसमांदा समाज का कोई नौजवान IIT, IIM, बैंक, रेलवे या किसी सरकारी दफ़्तर में पहुंचा है, तो यह किसी रहम का नतीजा नहीं, बल्कि संवैधानिक हक़ का परिणाम है।संविधान में ओबीसी और एसटी श्रेणियां तो धर्म-तटस्थ हैं, लेकिन अनुच्छेद 341 (अनुसूचित जाति/SC) में धार्मिक पाबंदी लगा दी गई।
1950 के आदेश और बाद के संशोधनों ने सिखों और बौद्धों को तो SC सूची में शामिल किया, लेकिन दलित मुसलमानों और ईसाइयों को बाहर रखा गया। यह भेदभाव संविधान की मूल आत्मा अनुच्छेद 14 (समानता), 15और 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।
आज पसमांदा समाज सुप्रीम कोर्ट में इसी हक की लड़ाई लड़ रहा है, क्योंकि धर्म बदलने से सामाजिक पिछड़ापन खत्म नहीं होता। संविधान ने पसमांदा समाज को सिर्फ़ रोज़गार नहीं दिया, राजनीतिक ज़ुबान भी दी। संसद और विधानसभाओं में पसमांदा नेताओं की मौजूदगी इस बात का सबूत है कि लोकतंत्र में दबे हुए लोग भी आगे आ सकते हैं। संविधान यह सुनिश्चित करता है कि बहुमत की सरकार भी अल्पसंख्यकों और कमजोर तबकों के अधिकार नहीं कुचल सकती।
पड़ोसी देशों का अनुभव हमारे लिए चेतावनी है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में धर्म और सत्ता के गठजोड़ ने आम आदमी को पिसा है। श्रीलंका में सिंहली-बौद्ध वर्चस्व ने देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया। भारत को इस हश्र से बचाता है उसका संविधान और उसकी धर्मनिरपेक्ष सोच।
अगर भारत में भी एक धर्म, एक संस्कृति और एक विचारधारा थोप दी गई, तो सबसे पहले पसमांदा समाज को ही उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। आज चुनौतियाँ मौजूद हैं। जातिवाद अब भी ज़िंदा है। साथ ही क्रूर पूंजीवाद का गठजोड़ गरीब और वंचित को और कमजोर कर रहा है।
संविधान कोई बंद किताब नहीं, बल्कि एक जारी संघर्ष है। 26जनवरी हमें यह एहसास कराती है कि संविधान सिर्फ़ पढ़ने या पूजने की चीज़ नहीं, बल्कि जीने की ज़रूरत है। सच यह है कि संविधान से पसमांदा सुरक्षित है, और पसमांदा की सुरक्षा से ही हिंदुस्तान मज़बूत और सुरक्षित रहता है।
अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।