गुलाम रसूल देहलवी
जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI) में 28 से 30 जनवरी तक “कुरान और विज्ञान” विषय पर तीसरा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें भारत, ईरान, इंडोनेशिया और यूरोप के प्रतिष्ठित विद्वानों ने भाग लिया। इस सम्मेलन का उद्देश्य कुरान की बुद्धिमत्ता और समकालीन मानवीय प्रगति के बीच सार्थक विद्वत संवाद को बढ़ावा देना, अंतर-विषयक अनुसंधान को सशक्त करना और आधुनिक चुनौतियों के संदर्भ में कुरान की प्रासंगिकता को रेखांकित करना था। सम्मेलन का संयुक्त आयोजन विलायत फाउंडेशन, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के इस्लामिक स्टडीज़ विभाग और ईरान के तेहरान स्थित शहीद बेहेश्ती विश्वविद्यालय ने किया।
सम्मेलन में वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कुरान की शिक्षाओं को आधुनिक विज्ञान और ब्रह्मांड विज्ञान के साथ किसी टकराव के बिना एक “जीवित मार्गदर्शक” के रूप में समझा जाना चाहिए। विद्वानों का मत था कि कुरान को केवल कर्मकांड तक सीमित करने के बजाय समझ, मनन और व्यवहार में उतारना आवश्यक है, ताकि नैतिक, सामाजिक और बौद्धिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके। चर्चाओं में यह रेखांकित किया गया कि कुरान और आधुनिक विज्ञान के बीच कोई अंतर्निहित विरोधाभास नहीं है; दोनों ही मानवता को सत्य, ज्ञान और ब्रह्मांड को संचालित करने वाले दैवीय नियमों की समझ की ओर ले जाते हैं।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ ने आत्ममंथन का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कुरान की सच्ची सफलता उसके गहन अध्ययन, उस पर चिंतन और उसकी शिक्षाओं के पालन में निहित है।
उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि जो कुरान कभी समाजों को नैतिक शक्ति प्रदान करता था, आज कई जगह केवल औपचारिक पाठ तक सीमित हो गया है। उनके अनुसार, समय की मांग है कि कुरान को फिर से जीवन का मार्ग बनाया जाए,उसे समझ के साथ पढ़ा जाए, दिल में उतारा जाए और व्यक्तिगत व सामूहिक जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला बनाया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म की वास्तविक आत्मा दूसरों को किसी भी रूप में नुकसान न पहुँचाने में है और दया, करुणा, सहनशीलता व न्याय जैसे मूल्यों को दैनिक जीवन में उतारना ही कुरान से सच्चा जुड़ाव है।
ईरान के भारत में राजदूत डॉ. मोहम्मद फथाली ने आधुनिक युग में कुरान की समझ को गहरा करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कुरान और विज्ञान के संबंध पर संवाद सदियों से चल रही एक विद्वत परंपरा का हिस्सा है, जो ज्ञान, तर्क, बहस और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देती है और यही तत्व आज की वैश्विक चुनौतियों से निपटने में अत्यंत प्रासंगिक हैं।
प्रख्यात भारतीय शिया धर्मगुरु डॉ. कल्बे जवाद ने यह मौलिक प्रश्न उठाया कि 1,400 वर्ष पहले नाज़िल हुई पुस्तक का आज भी अध्ययन क्यों आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कुरान की कई अवधारणाएँ आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से मेल खाती हैं, जिनकी पुष्टि बाद के युगों में हुई। साथ ही उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि वैज्ञानिक सिद्धांत समय के साथ बदलते रहते हैं, इसलिए कुरान के प्रकाश में विज्ञान का अध्ययन संतुलित दृष्टि से किया जाना चाहिए।
मुख्य भाषण में मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो. असलम परवेज़ ने सम्मेलन को एक महत्वपूर्ण और लंबे समय से अपेक्षित शैक्षणिक पहल बताया। उन्होंने इस धारणा को चुनौती दी कि धर्म केवल रस्मों तक सीमित है और कहा कि कुरान बार-बार मानव बुद्धि और इंद्रियों के उपयोग पर ज़ोर देता है। उनके अनुसार, कुरान प्रेम, न्याय और सामाजिक संतुलन को कर्मों के माध्यम से स्थापित करने की शिक्षा देता है और अतिरिक्त संसाधनों को समाज के हित में लगाने का सिद्धांत प्रस्तुत करता है।
जामिया के रजिस्ट्रार प्रो. महताब आलम रिज़वी ने मुख्य अतिथि के रूप में कहा कि कुरान की अनेक आयतें मानव ध्यान को वैज्ञानिक वास्तविकताओं की ओर आकृष्ट करती हैं—जैसे पानी की संरचना, ब्रह्मांड की विशालता, मानव की उत्पत्ति और प्रकृति की संतुलनकारी व्यवस्थाएँ। उन्होंने कहा कि ये संकेत बताते हैं कि कुरान न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन की पुस्तक है, बल्कि वह मानवता को प्रकृति के नियमों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. अख्तरुल वासे ने कहा कि कुरान और आधुनिक विज्ञान के बीच कोई विरोध नहीं है। उनके अनुसार, कुरान का मूल उद्देश्य नैतिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन देना है, जबकि विज्ञान उन सिद्धांतों को समझने का माध्यम है। दोनों अंततः सत्य के एक ही स्रोत की ओर संकेत करते हैं।
सम्मेलन के निदेशक और इस्लामिक स्टडीज़ विभाग के प्रमुख प्रो. इक़्तिदार मोहम्मद खान ने कहा कि कुरान मानवता को ब्रह्मांड में बिखरे संकेतों को विवेक और बुद्धि से समझने का आमंत्रण देता है, जिससे बौद्धिक और व्यावहारिक जीवन दोनों समृद्ध होते हैं। ईरान के प्रो. नासिर सिमफ़ोरूश ने “ज्ञान की दो धाराएँ—वही और अवलोकन” विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत करते हुए बीमारी, जीवन, मृत्यु और जैव-नैतिक मुद्दों पर कुरान और विज्ञान के दृष्टिकोणों का तुलनात्मक विश्लेषण किया।

सम्मेलन में “कुरान और परिवार” जैसे विशेष सत्र भी शामिल थे, जिनमें आधुनिक पारिवारिक चुनौतियों पर चर्चा हुई। इंडोनेशिया की प्रो. रॉबी हबीबा अनरोर ने AI और डिजिटल युग में मानव ध्यान के संकट पर कुरानिक दर्शन को समाधान के रूप में प्रस्तुत किया। वहीं ईरान की पूर्व फर्स्ट लेडी प्रो. डॉ. जमीलेह सआदत अलमोलहोदा ने युवाओं को कुरान से जुड़ने का आह्वान किया और नैतिक आधार के बिना विचारधाराओं को अपनाने के खतरों पर प्रकाश डाला।
तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन में विद्वानों ने सहमति जताई कि कुरान के सिद्धांत आधुनिक विज्ञान, तकनीक, परिवार, नैतिकता और वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में एक व्यापक और जिम्मेदार ढांचा प्रदान करते हैं। सम्मेलन ने यह संदेश दिया कि ज्ञान, करुणा और नैतिकता के संगम से ही मानवता एक संतुलित और शांतिपूर्ण भविष्य की ओर बढ़ सकती है।
(लेखक एक भारत-इस्लामी विद्वान और भारतीय सूफीवाद पर लेखक हैं। )