रेलवे की पटरियों पर बदला भारत

Story by  अनिल निगम | Published by  [email protected] | Date 03-01-2026
Railways: The mindset has changed, and the picture has changed.
Railways: The mindset has changed, and the picture has changed.

 

nigamडॉ. अनिल कुमार निगम 

आज का भारत वर्ष 2014 के भारत से अलग नजर आ रहा है। यह कहानी यदि किसी एक व्यवस्था के साथ सबसे गहराई से जुड़ी है, तो वह है रेलवे। आज जब देश बुलेट ट्रेन, वंदे भारत और सुदूर सीमांत क्षेत्रों तक रेल संपर्क की उपलब्धियों पर चर्चा कर रहा है, तब यह समझना आवश्यक है कि आखिर जिस स्तर का रेलवे विस्तार, आधुनिकीकरण और तेज़ गति की ट्रेनों का सपना पिछले दस वर्षों में साकार हुआ, वह आज़ादी के बाद लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस सरकारें क्यों नहीं कर पाईं? इस दौरान कांग्रेस पार्टी की प्राथमिकताएं क्‍या थीं? सवाल यह भी है कि क्‍या उसने निहितार्थों से ऊपर उठकर जनता और देश के विकास के लिए काम किया? 

लेकिन इसके पूर्व यह समझना भी आवश्‍यक है कि आज़ादी से पहले रेलवे का स्वरूप कैसा था और आज किस तरह वह भारत के विकास का इंजन बन चुका है। भारत में रेलवे की शुरुआत 1853 में हुई थी। अंग्रेज़ों ने इसे आधुनिक परिवहन का माध्यम बताया, लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य औपनिवेशिक था। रेलवे लाइनों का जाल इस तरह बिछाया गया कि कच्चा माल आसानी से बंदरगाहों तक पहुंच सके और सैनिकों और प्रशासन को तीव्र गति से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सके।

वर्ष 1947 में स्‍वतंत्रता के समय देश में लगभग 53,600 किलोमीटर रेलवे लाइन थी। यह नेटवर्क असंतुलित था। बड़े शहरों और बंदरगाहों को तो रेल से जोड़ा गया, लेकिन पहाड़ी, सीमावर्ती और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में रेल पहुंच लगभग नामुमकिन मानी जाती थी।स्वतंत्रता के बाद रेलवे को केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार माना गया। 1951 में रेलवे का राष्ट्रीयकरण हुआ और भारतीय रेलवे देश की जीवनरेखा बन गई। धीरे-धीरे नए ज़ोन बने, स्टेशनों का विकास हुआ और यात्री सुविधाओं में सुधार किया गया। 

लेकिन वास्‍तविक बदलाव पिछले दस–बारह वर्षों में दिखाई देता है। 2014 के बाद रेलवे में जिस पैमाने पर निवेश, नई लाइनों का निर्माण और तकनीकी विकास हुआ, वह भारतीय इतिहास में अभूतपूर्व है। 2014 में कुल रेल नेटवर्क लगभग 65,000 किमी था, वह 2025 तक यह बढ़कर 70,000 किमी से अधिक हो गया।

जहां 2014 में केवल एक-तिहाई रेल मार्ग विद्युतीकृत थे, वहीं आज 90 प्रतिशत से अधिक ब्रॉड गेज नेटवर्क बिजली से संचालित हो रहा है। इससे डीज़ल पर निर्भरता घटी, लागत कम हुई और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिला। एक समय जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व भारत में रेल पहुंचाना असंभव माना जाता था। कठिन भूगोल, सुरंगें और सुरक्षा चुनौतियां बड़ी बाधा थीं। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। जम्मू तक नियमित रेल सेवाएं, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मिज़ोरम जैसे राज्यों में ट्रेन संचालन और सीमांत क्षेत्रों तक रेलवे का विस्तार केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता का मजबूत प्रतीक है।

वंदे भारत एक्सप्रेस भारतीय रेलवे की आधुनिक छवि बन चुकी है। तेज़ रफ्तार, आरामदायक कोच और स्वदेशी तकनीक से बनी यह ट्रेन कम समय में लोकप्रिय हो गई। आज देश के विभिन्न हिस्सों में 50 से अधिक वंदे भारत ट्रेनें चल रही हैं, जो यात्रा समय को घंटों में घटा रही हैं। रेल मंत्री अश्‍वनी वैष्‍णव ने घोषणा की है कि रेलवे 18–19 जनवरी 2026 से गुवाहाटी–कोलकाता के बीच स्लीपर वंदे भारत ट्रेन चलाएगा। इससे उत्तर-पूर्व भारत की कनेक्टिविटी और भी सुदृढ़ होगी और व्यापार-पर्यटन को नया बल मिलेगा।

भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन है, जो जापान की शिंकानसेन तकनीक पर आधारित है। सरकारी घोषणाओं के अनुसार 15 अगस्त से सूरत–बिलिमोरा सेक्शन में बुलेट ट्रेन का संचालन प्रस्तावित है। यह परियोजना केवल तेज यात्रा नहीं, बल्कि तकनीकी हस्तांतरण, कौशल विकास और वैश्विक स्तर पर भारत की नई पहचान का माध्यम है।

दरअसल, रेलवे में निवेश के आँकड़े भी बदलाव की कहानी कहते हैं। 2013–14 में रेलवे बजट: लगभग ₹1.25 लाख करोड़ था जो 2024–25 में पूंजीगत व्यय: ₹2.5 लाख करोड़ पहुंच गया। केवल बुलेट ट्रेन परियोजना में ही ₹1 लाख करोड़ से अधिक का निवेश अनुमानित है।
आज इस विस्तार का सीधा लाभ आम नागरिकों को मिला है। इसके चलते यात्रा समय में कमी आई है, लोगों को बेहतर सुरक्षा और सुविधाएं मिलीं, रोज़गार के नए अवसर बने, पर्यटन एवं व्यापार को बढ़ावा मिला और दूरदराज़ क्षेत्रों का मुख्यधारा से जुड़ाव हो सका।

लेकिन यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि आजादी के बाद बहुत लंबे अरसे तक देश में शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी के कार्यकाल में रेलवे की हालत क्‍यों नहीं बदली जा सकी। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि उसने इस दिशा में कोई काम ही नहीं किया लेकिन जिस गति और तत्‍परता के साथ इसका विकास होना चाहिए था, वह नहीं हुआ।

स्वतंत्र भारत में लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस सरकारों के सामने शुरुआती दशकों में प्राथमिकताएं अलग थीं। रेलवे का विस्तार हुआ, लेकिन उसे रणनीतिक विकास इंजन के रूप में नहीं देखा गया। रेलवे को अधिकतर सब्सिडी आधारित सामाजिक सेवा माना गया, न कि निवेश आधारित अधोसंरचना। इसके विपरीत, पिछले दस वर्षों में भारतीय जनता पार्टी सरकार ने रेलवे को आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता से जोड़कर देखा।

इसके अलावा कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगी दलों में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव था। इसलिए उसके शासनकाल में बड़ी परियोजनाएं अक्सर गठबंधन दबाव, राज्यों-केंद्र के बीच खींचतान और पर्यावरण व भूमि अधिग्रहण में अनिर्णय के कारण वर्षों तक अटकी रहीं।
वहीं नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने बड़े और कठिन फैसलों को प्राथमिकता दी। समयबद्ध लक्ष्य तय किए, परियोजनाओं की नियमित निगरानी की। इसका प्रभाव रेलवे जैसी विशाल प्रणाली पर साफ दिखाई दिया।

यही नहीं, पिछले दशक में रेलवे बजट में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की गई। नई लाइनों, विद्युतीकरण और हाई-स्पीड ट्रेनों पर जोर दिया गया और निजी भागीदारी और आधुनिक तकनीक का समावेश किया गया। यही कारण है कि वंदे भारत, बुलेट ट्रेन और सीमांत क्षेत्रों में रेलवे जैसी योजनाएँ तेजी से आगे बढ़ीं। नई सरकार ने रेलवे को मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत से जोड़ा। वंदे भारत जैसी ट्रेनें इसी सोच का परिणाम हैं।

यह तो नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस सरकारें रेलवे का विकास नहीं चाहती थीं। लेकिन यह तो स्‍पष्‍ट था कि उनकी प्राथमिकताएं, संसाधन प्रबंधन और निर्णय क्षमता स्‍पष्‍ट और सशक्‍त नहीं थीं। पिछले दस वर्षों में जो बदलाव दिखाई देता है, वह केवल सरकार बदलने का नहीं, बल्कि सोच बदलने का परिणाम है।

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।)