अब्दुल्लाह मंसूर
जेफ्री एपस्टीन का मामला पहली नज़र में एक ऐसे आदमी की कहानी लगता है जो एक घिनौने अपराध में पकड़ा गया। लेकिन जैसे-जैसे यह मामला खुलता है, यह साफ़ हो जाता है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपराध नहीं है। यह सत्ता, पैसे, नैतिकता और न्याय व्यवस्था के पूरे सिस्टम की कहानी है। एपस्टीन की लिस्ट में समाज का हर वर्ग शामिल है चाहे वे आध्यात्मिक गुरु हों, नास्तिक हों, राजनेता हों, कलाकार हों या शिक्षाविद। यह केस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कुछ अपराध इसलिए नहीं होते क्योंकि कोई व्यक्ति बुरा होता है, बल्कि इसलिए होते हैं क्योंकि सिस्टम उन्हें होने देता है।

समाजशास्त्री सी. राइट मिल्स ने “पावर एलीट” का सिद्धांत दिया था। उनके अनुसार आधुनिक लोकतंत्रों में असली ताक़त आम लोगों के हाथ में नहीं होती, बल्कि राजनीति, बड़े कारोबार और सुरक्षा-प्रशासन के शीर्ष पर बैठे कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में सिमटी होती है। ये लोग अलग-अलग पेशों से आते हैं, लेकिन उनकी दुनिया एक ही होती है।
वे एक-दूसरे की पार्टियों में जाते हैं, एक-दूसरे के बच्चों को जानते हैं और एक-दूसरे के राज़ भी। यही वजह है कि जब इस समूह के किसी एक व्यक्ति पर खतरा आता है, तो पूरा तंत्र उसे बचाने में लग जाता है। एपस्टीन इसी पावर एलीट नेटवर्क का हिस्सा था।
वह खुद एक अमीर फाइनेंसर था, लेकिन उसके रिश्ते बड़े राजनेताओं, पूर्व राष्ट्रपतियों, राजघरानों और अरबपतियों से थे। वह राजनीति, पैसा और ताक़त इन तीनों के बीच एक पुल का काम करता था। उसकी पार्टियाँ सिर्फ मौज-मस्ती के लिए नहीं थीं, बल्कि सत्ता के रिश्तों को मज़बूत करने की जगह थीं। यही कारण है कि उसका निजी द्वीप, उसके बड़े-बड़े घर और उसका निजी विमान आराम के नहीं, बल्कि अपराध के अड्डे बन गए।
आरोपों के अनुसार, इन जगहों पर कम उम्र की लड़कियों को लाया जाता था और ताक़तवर मेहमानों के लिए उनका शोषण किया जाता था। यह सब कोई छुपी हुई बात नहीं थी। पुलिस, प्रशासन और प्रभावशाली लोग जानते थे कि क्या हो रहा है, फिर भी सालों तक कुछ नहीं हुआ।
यह दिखाता है कि जब अपराध अमीर और ताक़तवर लोग करते हैं, तो कानून अक्सर आँखें बंद कर लेता है, क्योंकि वह पैसा और सत्ता के हितों से जुड़ा होता है। 2008में जब एपस्टीन पहली बार पकड़ा गया, तब यह साफ़ होना चाहिए था कि कानून सबके लिए बराबर है। लेकिन जो सज़ा उसे मिली, उसने इस सोच को तोड़ दिया। इतने गंभीर आरोपों के बावजूद उसे बहुत हल्की सज़ा दी गई। उसे दिन में कई घंटे जेल से बाहर रहने की इजाज़त थी। यही वह पल था जब यह साफ़ हो गया कि न्याय व्यवस्था वर्ग देखकर काम करती है।

ख़बरें दबती रहीं, अपराध बढ़ता रहा
इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। एपस्टीन के पास इतना पैसा और असर था कि बड़े मीडिया घराने या तो चुप रहे या जानबूझकर खबरों को दबाते रहे। एलीट वर्ग जानता था, आम जनता को जानने नहीं दिया गया। कई पत्रकार सच सामने लाना चाहते थे, लेकिन उन्हें ऊपर से रोक दिया गया। इसका मतलब साफ़ है पावर एलीट यह तय कर सकते हैं कि जनता क्या जाने और क्या न जाने।
सालों तक मामला दबा रहा लेकिन 2019में जब एपस्टीन दोबारा गिरफ्तार हुआ, तब हालात बदल चुके थे। अब केवल टीवी या अखबार ही सूचना के स्रोत नहीं थे, सोशल मीडिया आ चुका था। अब जानकारी को पूरी तरह छुपाना आसान नहीं था। हज़ारों दस्तावेज़, ईमेल और रिकॉर्ड सामने आए।
यह भी आरोप लगे कि उसके ठिकानों पर हर कमरे में कैमरे लगे थे। यानी अपराध सिर्फ बच्चियों के शोषण तक सीमित नहीं था, बल्कि लोगों को काबू में रखने और डराने का ज़रिया भी था। उसकी जेल में हुई संदिग्ध मौत ने लोगों का सिस्टम से भरोसा और तोड़ दिया।
जब अदालत के आदेश से कुछ दस्तावेज़ सार्वजनिक हुए, तो उन्हें “एपस्टीन फाइल्स” कहा जाने लगा। लोग नाम गिनने लगे कौन गया, कितनी बार गया लेकिन यहीं एक खतरा पैदा हुआ अब फ़ोकस सिस्टम की आलोचना से हटकर सिर्फ नामों की सनसनी बन गया। असली सवाल यह नहीं था कि कौन-कौन शामिल था, बल्कि यह था कि यह सब इतने सालों तक चलता कैसे रहा?
इस केस में सबसे डराने वाली बात यह है कि इसमें सिर्फ “बुरे लोग” नहीं थे। बड़ी-बड़ी संस्थाएं भी शामिल थीं। बड़े बैंकों ने जानते हुए भी उसके पैसों का लेन-देन किया। नामी यूनिवर्सिटीज़ ने उससे चंदा लिया और बदले में उसे इज्जत दी। जिन लोगों को समाज आदर्श मानता है, उनके नाम भी इस नेटवर्क से जुड़े मिले।
इससे पता चलता है कि यह गंदगी बहुत गहरी है। एलीट वर्ग की सबसे बड़ी ताक़त उनकी खामोशी होती है। यह चुप्पी इसलिए नहीं होती कि उन्हें कुछ पता नहीं होता, बल्कि इसलिए होती है कि उन्हें इससे फायदा मिल रहा होता है या वे डरते होते हैं। अगर कोई एक व्यक्ति बोलता भी है, तो पूरा सिस्टम उसे झूठा या पागल साबित करने में लग जाता है। जब दुनिया की दौलत कुछ लोगों के हाथ में सिमट जाती है, तो वे अपने लिए अलग नियम बना लेते हैं।
कई बार इस जैसे अपराध को छुपाने के लिए “विचारधारा का पर्दा” इस्तेमाल किया जाता है। हमें बचपन से सिखाया जाता है कि कानून सबके लिए बराबर है, न्याय अंधा होता है और मेहनत से हर कोई ऊपर जा सकता है।इन्हें बार-बार दोहराने का मक़सद यह होता है कि आम लोग यह मानते रहें कि सिस्टम उनके साथ है, भले ही असल में वह ताक़तवर लोगों के लिए काम कर रहा हो।

क्योंकि जिस दिन जनता को यह साफ़ समझ आ जाएगा कि न्याय अमीरों के लिए नरम और गरीबों के लिए सख़्त है, उस दिन लोग पूरे निज़ाम पर सवाल उठाने लगेंगे। इसी सवाल से बचने के लिए बराबरी और इंसाफ़ की यह मीठी बातें एक ढाल की तरह इस्तेमाल की जाती हैं।
अगर इस तरह के मामलों को सच में रोकना है, तो सिर्फ किसी एक अपराधी को सज़ा देना काफ़ी नहीं होगा, क्योंकि समस्या व्यक्ति की नहीं, पूरे सिस्टम की है। सबसे पहले मीडिया को कॉर्पोरेट और राजनीतिक दबाव से मुक्त करना होगा, ताकि वह ताक़तवर लोगों पर भी वही सवाल उठा सके जो आम लोगों से पूछे जाते हैं।
न्याय व्यवस्था में यह सुनिश्चित करना होगा कि अमीरी और पहचान किसी के लिए सुरक्षा कवच न बनें, और हर मामले में कानून एक-सा लागू हो। बड़े बैंकों, विश्वविद्यालयों और संस्थाओं को भी जवाबदेह बनाना होगा, ताकि वे पैसे के बदले अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी न बेच सकें।
इसके साथ ही, दौलत और ताक़त के अत्यधिक संकेंद्रण पर सवाल उठाना ज़रूरी है, क्योंकि जब कुछ ही लोगों के हाथ में बहुत ज़्यादा शक्ति होती है, तो वे अपने लिए अलग नियम बना लेते हैं। असली बदलाव तभी आएगा जब सत्ता पर लगातार निगरानी होगी, संस्थाओं से जवाब माँगा जाएगा और आम लोगों को यह समझने की ताक़त मिलेगी कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव का नाम नहीं, बल्कि रोज़ पूछे जाने वाले सवालों से ज़िंदा रहता है।
(अब्दुल्लाह मंसूर, लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे 'पसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हैं।)