चार पीढ़ियों की विरासत: इंदौर के लेदर टॉयज़ और कारीगर शरीफ़ खान

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 11-02-2026
Indore's leather toy art steals the show at the Surajkund Mela, showcasing the unique talent of National Award winner Sharif Khan.
Indore's leather toy art steals the show at the Surajkund Mela, showcasing the unique talent of National Award winner Sharif Khan.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

39वें सूरजकुंड इंटरनेशनल क्राफ्ट फेयर में इस वर्ष देश-विदेश से आए पर्यटकों के बीच मध्य प्रदेश के इंदौर की पारंपरिक और दुर्लभ कला लेदर टॉयज़ विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इंदौर से आए नेशनल अवार्डी कारीगर शरीफ़ खान अपनी अनोखी शिल्पकला और लाइव डेमोंस्ट्रेशन के माध्यम से लोगों को न सिर्फ़ आकर्षित कर रहे हैं, बल्कि भारतीय पारंपरिक हस्तकला की समृद्ध विरासत से भी परिचित करा रहे हैं। लेदर टॉयज़ इंदौर की एक विशिष्ट पहचान है, जो पूरी दुनिया में केवल यहीं तैयार की जाती है और वर्षों से अपनी मौलिकता और कलात्मकता के लिए जानी जाती है।

शरीफ़ खान बताते हैं कि यह कला उनके परिवार की पुश्तैनी धरोहर है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती आ रही है। उनके दादा और पिता इस कला से जुड़े रहे, जिन्होंने उन्हें इसकी बारीकियाँ सिखाईं। आज वे स्वयं इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं और उनके बच्चे भी इस कार्य में सक्रिय रूप से शामिल हैं, जिससे यह कला अब चौथी पीढ़ी में प्रवेश कर चुकी है। उनके परिवार के कई सदस्यों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए स्टेट अवार्ड और नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है, जो इस शिल्प की गुणवत्ता और महत्व को दर्शाता है।

लेदर टॉयज़ बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह हस्तनिर्मित होती है और इसमें समय, धैर्य और उच्च कौशल की आवश्यकता होती है। सबसे पहले तार से खिलौने का ढांचा तैयार किया जाता है, जिसके बाद पेपर पल्प की मदद से उसे वांछित आकार दिया जाता है। इसके पश्चात बकरी की खाल से कवरिंग की जाती है, जिसे सावधानीपूर्वक चिपकाया जाता है। अंत में फैब्रिक कलर और वॉटर कलर की सहायता से रंग-रोगन कर खिलौनों को जीवंत रूप दिया जाता है। बड़े साइज के एक खिलौने को तैयार करने में लगभग 15 से 20 दिन का समय लगता है, जबकि छोटे साइज के खिलौनों की संख्या में उत्पादन होने पर करीब 8 दिनों में लगभग 100 पीस तैयार कर लिए जाते हैं।

शरीफ खान ने आवाज द वॉयस को बताया कि इंदौर के लेदर के खिलौने अपने हाथ से बने होने, असली जैसे दिखने और टिकाऊ होने के लिए मशहूर हैं, और 2014 में इन्हें ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिला था। ये अनोखे, इको-फ्रेंडली जानवरों के खिलौने तार के फ्रेम से बनाए जाते हैं, जिनमें घास या पेपर पल्प भरा जाता है, और उन्हें अच्छी क्वालिटी के लेदर से ढका जाता है, जिससे वे लोकप्रिय और बारीकियों वाले यादगार तोहफे बन जाते हैं।  

सूरजकुंड मेले में उनके स्टॉल पर 6 इंच से लेकर 36 इंच तक के लेदर टॉयज़ उपलब्ध हैं। कीमतों की बात करें तो छोटे खिलौने 150 रुपये से शुरू होते हैं, जबकि बड़े और विशेष डिज़ाइन वाले उत्पादों की कीमत 15 हजार रुपये तक जाती है। इन खिलौनों की खासियत यह है कि ये देखने में जितने आकर्षक होते हैं, उतने ही मजबूत और टिकाऊ भी होते हैं, जिसके कारण बच्चों के साथ-साथ बड़े लोग भी इन्हें सजावटी वस्तु के रूप में पसंद कर रहे हैं।

इस कला के माध्यम से शरीफ़ खान न केवल अपनी पारिवारिक परंपरा को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि इंदौर के लगभग 50 स्थानीय कलाकारों को रोजगार भी प्रदान कर रहे हैं। सभी कलाकार इंदौर से ही जुड़े हुए हैं और वर्षों से इस शिल्प से अपनी आजीविका चला रहे हैं। सूरजकुंड इंटरनेशनल क्राफ्ट फेयर में उन्हें डेवलपमेंट कमिश्नर (हैंडीक्राफ्ट) की ओर से स्टॉल की सुविधा और सरकारी सहयोग प्राप्त होता है। इस मेले में केवल स्टेट अवार्डी, नेशनल अवार्डी, शिल्प गुरु और पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित कलाकारों को ही प्राथमिकता दी जाती है, जिससे मेले की गुणवत्ता और गरिमा बनी रहती है।

1986 में इंदौर में स्थापित शरीफ़ आर्ट्स आज भारत के प्रमुख लेदर उत्पाद निर्माताओं, निर्यातकों और आपूर्तिकर्ताओं में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। ट्रेड इंडिया पर सूचीबद्ध यह संस्था गुणवत्ता, विश्वसनीयता और ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण के लिए जानी जाती है और देशभर में एक बड़े उपभोक्ता वर्ग को सेवाएं प्रदान कर रही है।

मेले का एक और आकर्षण शरीफ़ खान द्वारा प्रस्तुत कचरे से सुंदर खिलौने बनाने का लाइव शो रहा, जिसने दर्शकों को खासा प्रभावित किया। इस प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि रचनात्मकता और सोच के साथ बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं को भी कला का रूप दिया जा सकता है। उनका यह प्रयास न केवल शिल्पकला की उत्कृष्ट मिसाल है, बल्कि रीसाइक्लिंग, वेस्ट मैनेजमेंट और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को भी प्रभावी ढंग से सामने रखता है।

कुल मिलाकर, 39वें सूरजकुंड इंटरनेशनल क्राफ्ट फेयर में स्टॉल नंबर 1143 पर इंदौर के लेदर टॉयज़ पारंपरिक भारतीय हस्तकला की जीवंत तस्वीर पेश कर रहे हैं। बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर आयु वर्ग के लोग इन खिलौनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, और यह साबित हो रहा है कि भारतीय कारीगरों की मेहनत, परंपरा और रचनात्मकता आज भी वैश्विक स्तर पर अपनी खास पहचान बनाए हुए है।

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