साकिब सलीम
सऊदी अरब की अभी भले ही अमीर देशों में गिनती हो, पर एक हकीकत यह भी है कि इसे अपने पैरों पर खड़ा करने में भारत के लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.‘ यह बात 15 दिसंबर, 1903 को तुर्की में ब्रिटिश राजदूत को भेजी गई एक आधिकारिक रिपोर्ट के इस अंकश से भी साबित होती है. रिपोर्ट में एक जगह लिखा है-भारतीय मुसलमानों ने आम तौर पर हेजाज (सऊदी अरब) रेलवे फंड के लिए पहले 5,00,000 रुपये का योगदान दिया, जबकि अकेले हैदराबाद राज्य के मुस्लिमों ने अपनी कुल संपत्ति का 6.5 प्रतिशत कर लगाने की पेशकश की है.’
अभी सऊदी अरब उन्नत बुनियादी ढांचे के साथ एशिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता है. प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत तुर्की ऑटोमन शासन से मुक्ति के बाद देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है. मगर 20 वीं सदी की शुरुआत में इसकी पूर्व-आधुनिक परिवहन, संचार और औद्योगिक बुनियादी ढांचे के साथ अर्थव्यवस्था काफी बुरे हाल में थी.
तब सऊदी अरब के विकास में भारतीयों ने अहम भूमिका निभाई थी. उनकी भूमिका केवल मानव संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि इस देश को पूंजी और प्रौद्योगिकी प्रदान करने में भी रही है.1910 में, जब सऊदी अरब पर तुर्की का शासन था,
एक ब्रिटिश खुफिया रिपोर्ट में कहा गया, “वतन, लाहौर के संपादक मौलवी इंशी-अल्लाह ने कॉन्स्टेंटिनोपल में हेड जाज रेलवे फंड को चौंतीसवीं किस्त भेजी है, जिसकी राशि 1,120 रुपये है. यह धन पिछले ढाई महीनों में अपने पाठकों से एकत्र किया गया.
वर्तमान किस्त की मुख्य योगदानकर्ता बुलंदशहर जिले की एक मुस्लिम महिला है. इसे मिलाकर, वतन के संपादक ने कुल मिलाकर लगभग 98,000 रुपये प्रेषित किए हैं.” रिपोर्ट में आगे बताया गया कि भारतीय तुर्की अधिकारियों द्वारा धन के गलत इस्तेमाल से नाराज थे. उन्होंने रेलवे पर काम ठीक से नहीं होने पर फंड भेजना बंद करने की धमकी दी थी.
ध्यान देने वाली बात यह है कि 1906 में, मौलवी अब्दुल कय्यूम द्वारा हैदराबाद में एक हेडजाज रेलवे फंड कमेटी का गठन किया गया था, जिसने सऊदी अरब में रेलवे के लिए बड़ी रकम जुटाई थी. हैदराबाद राज्य ने 1901 में रेलवे के लिए धन जुटाना शुरू किया था.
धन के अलावा, भारतीय शासकों ने सऊदी अरब में रेलवे ट्रैक बिछाने के लिए अपनी सेना बटालियन, इंजीनियर और तकनीक भी भेजी थी. इंजीनियरों सहित हैदराबाद के 5,000 से अधिक सैनिकों ने रेलवे विकास में अपनी ड्यूटी लगाई.
रेलवे ने 1910 में जेद्दा और मदीना के बीच यात्रियों को ले जाना शुरू किया, लेकिन युद्ध के कारण परिचालन का विस्तार नहीं हो पाया. नई सऊदी सरकार ने शासन संभालने के बाद 1930 के दशक में अपनी रेलवे प्रणाली को आगे बढ़ाने की योजना बनाई.
एक बार फिर भारतीय मदद के लिए आगे आए. चेन्नई के एस.ए.के जिलानी ने जेद्दा-मक्का रेलवे को विकसित करने की योजना का प्रस्ताव रखा. किंग इब्न सऊद इस सहयोग से बहुत खुश थे, लेकिन सऊदी शासन और ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक विरोधियों ने यह सुनिश्चित किया कि जिलानी इस परियोजना को पूरा नहीं कर सकें.
किंग इब्न सऊद ने सशस्त्र संघर्षों से जूझ रहे देश पर कब्जा कर लिया. अर्थव्यवस्था खस्ताहाल थी. उन्होंने दुनिया भर के मुसलमानों से देश की मदद करने का आग्रह किया, जहां दो पवित्र मस्जिदें स्थित हैं.सऊदी अरब की स्थापना के कुछ महीनों के भीतर ही, दिसंबर 1932 में डॉ. मोइन उद दीन के नेतृत्व में हैदराबाद के कुछ प्रतिष्ठित लोगों ने इब्न सऊद की कॉल का जवाब दिया.
उन्होंने मदीना में एक कपड़ा मिल स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, जहां भारतीय बुनकर अरबों को कपड़ा बुनने का हुनर सिखाएंगे. पूंजी और मशीनरी भारतीयों द्वारा प्रदान की जानी थी. सऊदी अरब में कपड़ा बनाने का उद्योग विकसित करने का विचार था. इससे सारा मुनाफा उसे मिलता.
कहते हैं किंग इस विचार से सहमत हो गए और जुलाई 1933 में मशीनरी और बुनकर जेद्दा बंदरगाह पहुंच भी गए. डॉ मोइन ने मदीना में परियोजना का नेतृत्व किया, जहां शुरुआत में 20 लोगों को रोजगार मिले. कपड़े का विपणन पवित्र उत्पाद के रूप में किया गया ताकि मुसलमान हज करने के बाद अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए उपहार के रूप में ले सकें. तब मदीना के अल फखरियाह स्कूल में एक दुकान भी खोली गई थी.
भारत और सऊदी अरब के बीच द्विपक्षीय संबंध इसी सहयोग पर आधारित हैं.