डॉ. उमैर मंज़र
दिल्ली की तंग गलियों से निकलकर पुणे के क्षितिज तक अपनी कलम का लोहा मनवाने वाली शाह ताज ख़ाँ आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उन्होंने अपनी मेहनत और अटूट लगन से न केवल पत्रकारिता के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए, बल्कि बच्चों के साहित्य को भी एक नई और वैज्ञानिक दिशा दी है। उनकी शख्सियत आज उन तमाम महिलाओं के लिए एक मिसाल है जो अपने सपनों को हकीकत में बदलने का जज़्बा रखती हैं।

पुरानी दिल्ली की मिट्टी और संस्कारों की विरासत
शाह ताज ख़ाँ का जन्म 1969में दिल्ली के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र पुरानी दिल्ली में हुआ। गली गढ़िया की उन संकरी लेकिन जीवंत गलियों में उनका बचपन बीता। यह वही जगह है जहाँ उर्दू की मिठास और तहजीब की खुशबू हवाओं में घुली रहती है। उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम यहीं के स्कूलों से हासिल की। दिल्ली की उस खास मिट्टी ने ही उनके भीतर भाषा के प्रति प्रेम और तहजीब की समझ पैदा की।
उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था का रुख किया। यहाँ उन्होंने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की बल्कि राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (UGC NET) भी पास की। 1998में उन्होंने उर्दू पत्रकारिता में एम.फिल की डिग्री हासिल की।
दिल्ली विश्वविद्यालय का वह माहौल और वहां के विद्वानों का साथ शाह ताज के व्यक्तित्व को निखारने में मील का पत्थर साबित हुआ। आज भले ही वह पुणे में रहकर अपनी साहित्यिक गतिविधियों को अंजाम दे रही हैं, लेकिन उनके दिल में आज भी पुरानी दिल्ली की यादें और वहां का सांस्कृतिक लगाव ज़िंदा है।

पत्रकारिता: पहला प्यार और 'नई दुनिया' का अनुभव
शाह ताज ख़ाँ के लिए पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं बल्कि उनका पहला प्यार रहा है। एम.फिल पूरा करने के बाद उन्होंने अपनी पेशेवर ज़िंदगी की शुरुआत 'नई दुनिया' अखबार से की। यह वह दौर था जब प्रिंट मीडिया अपने पूरे शबाब पर था। सूचना पाने का सबसे बड़ा और विश्वसनीय जरिया अखबार ही हुआ करते थे। 'नई दुनिया' उनके लिए एक ऐसी प्रयोगशाला बनी जहाँ उन्होंने पत्रकारिता के कड़े अनुशासन और बारिकियों को सीखा।
संपादकीय विभाग में रहते हुए उन्होंने सामाजिक और सूचनात्मक विषयों पर जमकर लिखा। उनका काम केवल दफ्तर तक सीमित नहीं था। वह फील्ड में जाती थीं, विशेषज्ञों से मिलती थीं और जटिल विषयों को आसान भाषा में ढालकर पाठकों तक पहुँचाती थीं।
1998से 2001 के बीच 'नई दुनिया' का अपना एक बड़ा पाठक वर्ग था। शाह ताज की लिखी खबरों और लेखों पर जब पाठकों की प्रतिक्रियाएं आती थीं, तो उन्हें अपनी मेहनत का असली फल मिलता था। उन्होंने हमेशा माना कि बिना गंभीरता और कड़ी मेहनत के पत्रकारिता के इस ऊँचे पायदान पर टिकना मुमकिन नहीं था।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और ईटीवी उर्दू की बुलंदियां
समय बदला और पत्रकारिता का स्वरूप भी बदलने लगा। जब उर्दू जगत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की क्रांति आई, तो 'ईटीवी उर्दू' ने एक बड़ा मंच प्रदान किया। शाह ताज इस संस्थान के शुरुआती स्तंभों में से एक थीं। उन्होंने डेस्क पर रहकर वह कठिन काम किए जो अक्सर पर्दे के पीछे रह जाते हैं। टीवी पत्रकारिता में किसी एक व्यक्ति का नाम चमकना मुश्किल होता है क्योंकि यहाँ काम सामूहिक होता है।
उन्होंने ईटीवी में रहते हुए स्ट्रैटेजिक प्लानिंग, स्क्रिप्टिंग और न्यूज पैकेजिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम दिया। मीडिया प्रोडक्शन और रचनात्मक निर्देशन में उनकी पकड़ ने चैनल को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। लाइव पैनल बहस हो या बुलेटिन फॉर्मेटिंग, शाह ताज ने हर मोर्चे पर अपनी काबिलियत साबित कीI
वह उन चुनिंदा पत्रकारों में शामिल रहीं जिन्होंने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों माध्यमों के बीच एक मज़बूत सेतु बनाया। उनके काम करने के अंदाज़ ने यह साबित किया कि एक महिला पत्रकार भी तकनीकी और प्रबंधकीय दोनों स्तरों पर समान रूप से सफल हो सकती है।
बच्चों का साहित्य: वैज्ञानिक सोच की नई पहल
पत्रकारिता की व्यस्तता के बीच शाह ताज ने एक ऐसी दुनिया में कदम रखा जहाँ उनकी सबसे अलग पहचान बनी। वह दुनिया थी बच्चों के साहित्य की। अक्सर बच्चों के लिए लिखी जाने वाली कहानियाँ परियों या राजा-रानियों तक सीमित रहती हैं, लेकिन शाह ताज ने इसे एक नई मोड़ दिया। उन्होंने बच्चों के लिए 'वैज्ञानिक अफ़साने' लिखने शुरू किए।
उनकी कहानियाँ केवल उर्दू के साहित्यिक रिसालों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि साइंस की दुनिया में भी उन्हें बहुत सम्मान मिला। उन्होंने अपनी लेखनी से नई सदी के बच्चों को उनके बुनियादी सवालों के जवाब दिए। वह कहानियों और बातों के माध्यम से विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को बच्चों के सामने परोस देती हैं।
उनका मकसद बच्चों के भीतर एक सकारात्मक और रचनात्मक सोच विकसित करना है। उन्होंने बच्चों को यह सिखाया कि अपने आसपास की दुनिया को तर्क और विज्ञान की नज़र से कैसे देखें। आज उनकी पहचान एक ऐसी लेखिका के रूप में है जो बच्चों को भविष्य के लिए तैयार कर रही है।

मेहनत और निरंतरता का फलसफा
शाह ताज ख़ाँ की पूरी जीवन यात्रा अल्लामा इक़बाल के उस फलसफे पर टिकी है जहाँ मेहनत ही इंसान को खास बनाती है। उनके लिए रुकना या थकना उनके शब्दकोश में नहीं है। वह पुणे में रहकर आज भी अपनी कलम से समाज को जागरूक कर रही हैं। उनके लिए हर पल एक नई चुनौती और नया अवसर है।
उनकी शख्सियत हमें सिखाती है कि यदि इरादे मज़बूत हों और सीखने की भूख ज़िंदा हो, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं है। पत्रकारिता से शुरू हुआ यह सफ़र आज वैज्ञानिक कहानियों के पड़ाव पर है, और उम्मीद है कि आने वाले समय में वह अपनी कलम से और भी कई नए प्रयोग करेंगी। शाह ताज ख़ाँ आज केवल एक नाम नहीं बल्कि एक विचार बन चुकी हैं, जो शब्दों के माध्यम से समाज और नई पीढ़ी को रौशन कर रहा है।

कुल मिलाकर, शाह ताज ख़ाँ का व्यक्तित्व मेहनत और कोशिश का एक सुंदर मेल है। उन्होंने दिल्ली की तहजीब को अपनी ज़बान में और आधुनिक विज्ञान को अपनी कहानियों में जिस तरह पिरोया है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है। उनका यह सफरनामा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक अखंड स्रोत बना रहेगा।