खालिद अल्वी
खालिद अल्वी का यह लेख राम और सीता के प्रति उर्दू कवियों और लेखकों के दृष्टिकोण का अध्ययन करता है और पाता है कि उर्दू साहित्य ने राम और सीता को उच्च सम्मान दिया है। इसका मुख्य कारण यह है कि उर्दू हिंदुओं और मुसलमानों दोनों की भाषा रही है। मुगल काल के दौरान, हिंदुओं ने फारसी भी सीखी थी। तिलोक चंद महरूम, पंडित दत्तात्रेय कैफी, देवेंद्र सत्यार्थी, पंडित ब्रज नारायण चकबस्त, पंडित दया शंकर नसीम, जोश मलिआबादी, गुलजार देहलवी, डॉ. जगन्नाथ आज़ाद (जिन्होंने पाकिस्तान का राष्ट्रीय गान लिखा) और सैकड़ों अन्य महान उर्दू लेखक हिंदू थे।
हिंदू और मुस्लिम लेखकों और कवियों ने मिलकर एक ऐसी भाषाई संस्कृति का निर्माण किया जिसने भारत के बहुसांस्कृतिक लोकाचार (ethos) को गौरवान्वित किया। अमीर खुसरो, गालिब, इकबाल, हाली, जोश मलीहाबादी, चकबस्त, मोहसिन काकोरी और अन्य कवियों ने भारतीय संस्कृति और राम सहित हिंदू धार्मिक व्यक्तित्वों की शान में कसीदे पढ़े।
यहाँ तक कि कुछ इस्लामी विद्वानों द्वारा राम को एक ऋषि या मुनि भी माना गया है। उनका मानना है कि वह भारत में उत्पन्न एक पैगंबर हो सकते हैं। कुरान कहती है कि ईश्वर ने दुनिया के हर हिस्से में पैगंबर और दूत भेजे हैं। इसलिए, भारतीय उपमहाद्वीप में भी पैगंबर आए होंगे। इसके अलावा, कुरान यह भी कहती है कि हर समुदाय में उनकी अपनी भाषा बोलने वाले पैगंबर भेजे गए थे। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि प्रत्येक भाषाई समुदाय में पैगंबर उत्पन्न हुए थे।
चूँकि संस्कृत भारतीय उपमहाद्वीप की एक विशाल आबादी की मातृभाषा थी, इसलिए भारत में संस्कृत बोलने वाले पैगंबर भी जरूर आए होंगे। चूँकि प्राचीन काल से ही भारत में राम एक प्रमुख धार्मिक हस्ती माने जाते रहे हैं, इसलिए कुछ मुस्लिम विद्वानों का उचित ही यह मानना है कि राम हिंदू समुदाय के एक पैगंबर हो सकते हैं।
इसी कारण से भारत के इस्लामी विद्वानों ने भारतीय मुसलमानों को राम के प्रति एक सतर्क और सम्मानजनक दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी है। यदि राम एक पैगंबर थे, तो कुरान के अनुसार उनका अनादर करना 'कुफ्र' (अविश्वास) होगा, क्योंकि कुरान मुसलमानों को सभी पैगंबरों का सम्मान करने का आदेश देती है।
अल्लामा इकबाल ने इसी दृष्टिकोण से राम पर एक कविता लिखी थी। पंडित बृज नारायण ने 'रामायण का एक सीन' नामक कविता लिखी। रामायण और अन्य हिंदू धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद न केवल उर्दू में बल्कि फारसी में भी किया गया था।
1950 के दशक के दौरान दिल्ली के एक सूफी, अब्दुर रशीद हुमा के पास एक ऐसी पुस्तक थी जिसमें हजरत आदम अलैहिस्सलाम के पुत्र पैगंबर शीस अलैहिस्सलाम की वंशीय वंशावली (genealogy) थी। उस वंशावली में राम को हजरत शीस अलैहिस्सलाम का वंशज दिखाया गया था।
माना जाता है कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ था और हजरत शीस अलैहिस्सलाम की कब्र भी अयोध्या में ही स्थित मानी जाती है। यह सूफी अब्दुर रशीद हुमा के पास मौजूद हजरत शीस की वंशावली की पुष्टि करती है।यही कारण है कि भारतीय मुसलमान राम और सीता का सम्मान करते हैं और यह सम्मान उनके साहित्य में भी झलकता है।