मसला फिलिस्तीन का और महात्मा गांधी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] • 2 Months ago
Mahatma Gandhi on Palestine issue
Mahatma Gandhi on Palestine issue

 

जतिन देसाई

‘गांधीः हिज एंगेजमेंट विद इस्लाम एंड द अरब वर्ल्ड‘ पुस्तक की समीक्षा

इजराइल-गाजा पट्टी पर पूरी दुनिया की नजर है. इजराइल और हमास के बीच युद्ध में हजारों महिलाएं और बच्चे मारे गए हैं. इस युद्ध के कारण फिलिस्तीन का मुद्दा सामने आ गया है और इस संबंध में भारत की भूमिका पर चर्चा हो रही है. साथ ही, प्रस्तुत पुस्तक इस विषय पर एक अंतर्दृष्टि है.

7 अक्टूबर को आतंकवादी संगठन ‘हमास’ द्वारा इजराइल पर किया गया हमला निंदनीय है और इजराइल की कार्रवाई भी. इस बात पर तर्क दिए जा रहे हैं कि क्या यह युद्ध इजरायल-फिलिस्तीन तक ही सीमित रहेगा या क्या अन्य देश भी इसमें भाग लेंगे.

पश्चिम एशिया की स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में दुनिया और अधिक असुरक्षित हो जाएगी. भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक समिति में फिलिस्तीनी मुद्दे के समाधान को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया है.

समिति में फिलिस्तीनी भूमि से भूमि जब्त करने की इजरायल की नीति का विरोध करने वाला एक प्रस्ताव पेश किया गया. खास बात यह है कि भारत ने उस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया. मोदी सरकार के फैसले से कई दक्षिणपंथी विचारक हैरान थे. हालांकि, इसने फिलिस्तीन के प्रति भारत की नीति की निरंतरता को दर्शाया और यह महत्वपूर्ण है.

1917 में ब्रिटेन ने ‘बालफोर घोषणा’ के माध्यम से फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक नया स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का निर्णय लिया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने शुरुआत में ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी. अब्दुलनबी अलशोआला द्वारा लिखित ‘गांधीः हिज एंगेजमेंट विद इस्लाम एंड द अरब वर्ल्ड’ नामक पुस्तक में शुरू से ही फिलिस्तीन और अरब दुनिया के प्रति भारत की स्थिति पर उचित परामर्श दिया गया है.

फिलिस्तीन और अरब जगत के प्रति भारत की नीति को समझने के लिए यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है. 1937 में कोलकाता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वार्षिक बैठक में कहा गया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने फिलिस्तीन के विभाजन की योजना को अस्वीकार कर दिया. मार्च 1947 में एशियाई संबंध सम्मेलन में पंडित नेहरू द्वारा ‘फिलिस्तीन मूल रूप से एक अरब राज्य है और फिलिस्तीन के बारे में निर्णय अरब फिलिस्तीनी लोगों की सहमति के बिना नहीं किए जाने चाहिए,’ यह स्पष्ट रूप से कहा गया था. इस बीच, यह स्पष्ट हो गया था कि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर होगा और पाकिस्तान नामक एक मुस्लिम राष्ट्र अस्तित्व में आएगा. यह पृष्ठभूमि भारत की नीति में परिलक्षित हुई.

पुस्तक में महात्मा गांधी द्वारा 26 नवंबर, 1938 को ‘हरिजन- में लिखा गया एक लेख प्रकाशित किया गया है. इसमें गांधीजी ने कहा, ‘‘जिस न्याय के अनुसार इंग्लैंड अंग्रेजी लोगों का है, उसी न्याय के अनुसार फ्रांस फ्रांसीसी लोगों का है. इसी प्रकार, फिलिस्तीन अरब लोगों का है. यहूदियों को अरबों पर थोपना गलत और अमानवीय है.’’

गांधीजी की हत्या से कुछ महीने पहले, डन कैंपबेल नामक रॉयटर्स पत्रकार के फिलिस्तीन के संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब में गांधीजी ने कहा था, ‘‘यहूदियों को अरबों से मिलना चाहिए और उनसे दोस्ती करनी चाहिए. उन्हें ब्रिटिश और अमेरिकी मदद पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.’’

इस मुद्दे पर भारत का रुख यह है कि द्वि-राष्ट्र ही एकमात्र विकल्प है. इजराइल 1948 में अस्तित्व में आया, लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि भारत की स्थिति पहले ही स्पष्ट थी और पिछले महीने भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने इसे दोहराया था. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीन के लिए बातचीत फिर से शुरू की जानी चाहिए.

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक विशेषता यह है कि उस दौरान जो विचार-मंथन हुआ वह व्यापक था. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का विषय भी प्रारंभ से ही इस मंथन का हिस्सा था. समय के साथ विवरणों में कुछ परिवर्तन हुए हैं, लेकिन भारत ने अपने मूल वैचारिक रुख में निरंतरता दिखाई है, इस बात की छाप इस पुस्तक को पढ़ने के बाद किसी के भी मन से छूटे बिना नहीं रह सकती.

 

‘गांधीः इस्लाम और अरब विश्व के साथ उनका जुड़ाव’

लेखकः अब्दुलनबी अलशोआला

प्रकाशकः रूपा प्रकाशन

पृष्ठः 252

मूल्यः रुपए 595.00