अगर वह आगे न आता, मैं ज़िंदा न होता: दिल्ली की एक घटना, जो दिल छू गई

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 10-02-2026
If he hadn't stepped forward, I wouldn't be alive: A heartwarming incident from Delhi.
If he hadn't stepped forward, I wouldn't be alive: A heartwarming incident from Delhi.

 

ओनिका माहेश्वरी / नई दिल्ली

नई दिल्ली के महरौली इलाके में घटी यह घटना सिर्फ़ एक आपराधिक वारदात नहीं है, बल्कि आज के दौर में इंसानियत, साहस और भाईचारे की एक ज़िंदा मिसाल बनकर सामने आई है। जब समाज में नफरत, डर और खामोशी का शोर ज़्यादा सुनाई देता है, तब ऐसी घटनाएँ उम्मीद की एक रोशनी बनकर उभरती हैं। यह कहानी है 26 वर्षीय परिवहन व्यवसायी मुकेश कुमार की, जो महिलाओं के सम्मान के लिए आवाज़ उठाने की कीमत अपनी जान जोखिम में डालकर चुकाने को मजबूर हुए—और उस अनजान मुस्लिम शख्स की, जिसने बिना किसी स्वार्थ के आगे बढ़कर उनकी जान बचाई।

यह घटना 3 फरवरी 2026 की सुबह करीब पाँच बजे की है। मुकेश कुमार, जो सगम विहार से अपने ममेरे भाई की शादी में शामिल होकर लौट रहे थे, महरौली इलाके में एक चाय की दुकान पर रुके थे। सुबह का वक्त था, सड़क पर हलचल कम थी, लेकिन तभी उनकी नज़र पास खड़ी तीन महिलाओं पर पड़ी, जिनके साथ चार युवक अभद्र और अश्लील व्यवहार कर रहे थे। राह चलते लोग थे, दुकानें खुल रही थीं, लेकिन ज़्यादातर लोग तमाशबीन बने खड़े थे।
 

 
मुकेश से यह दृश्य देखा नहीं गया। उन्होंने उन युवकों को टोका और महिलाओं के साथ बदसलूकी बंद करने को कहा। उनका यह हस्तक्षेप मानवीय था, सहज था, लेकिन बदकिस्मती से वही उनके लिए हिंसा की वजह बन गया। युवकों को यह टोका जाना नागवार गुज़रा। देखते ही देखते वे चारों मुकेश पर टूट पड़े। किसी ने पत्थर उठाकर उनके सिर पर वार किया, किसी ने लाठी से हमला किया। उन्हें ज़मीन पर गिरा दिया गया और लात-घूँसों से बेरहमी से पीटा गया। कुछ ही पलों में मुकेश गंभीर रूप से घायल हो गए और बेहोश हो गए।
 
आसपास कई लोग मौजूद थे, लेकिन डर, असमंजस या उदासीनता के कारण ज़्यादातर पीछे हटे रहे। कोई आगे नहीं आया। यह वही पल था, जब एक शख्स—जिसे मुकेश आज भी सम्मान से “मुल्ला जी” कहकर याद करते हैं—भीड़ से आगे बढ़ा। वह मुस्लिम समुदाय से था, लेकिन उस वक़्त उसकी पहचान सिर्फ़ एक इंसान की थी। उसने अपनी जान की परवाह किए बिना हमलावरों के सामने खड़े होकर मुकेश को और पिटने से बचाया। उसने अपने शरीर से उन्हें ढाल दी, हमलावरों को रोका और किसी तरह मुकेश को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने में मदद की।
 
बाद में होश में आने पर मुकेश को जब यह सब पता चला, तो वे भावुक हो गए। उन्होंने कहा, “अगर उस आदमी ने उस वक़्त मेरी मदद नहीं की होती, तो शायद आज मैं ज़िंदा नहीं होता। उसने मेरी जान बचाई है। इंसानियत अभी भी ज़िंदा है।” उनके शब्दों में सिर्फ़ कृतज्ञता नहीं थी, बल्कि उस भरोसे की झलक थी, जो इस घटना ने टूटते सामाजिक रिश्तों के बीच फिर से जगा दिया।
 
इस पूरी घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें हमला, भीड़ की प्रतिक्रिया और हस्तक्षेप करने वाले उस साहसी व्यक्ति की भूमिका साफ़ दिखाई देती है। वीडियो सामने आने के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया। पुलिस को सूचना दी गई, और मौके पर पहुँचकर मुकेश को पहले स्थानीय अस्पताल और फिर उनकी हालत गंभीर होने के कारण एम्स ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया। इलाज के बाद उनकी हालत में सुधार हुआ और बाद में उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
 
 
पुलिस ने मुकेश के बयान, पीड़ित महिलाओं की शिकायत और मौके से जुटाए गए सबूतों के आधार पर एफआईआर दर्ज की। चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, मामले की जांच पूरी गंभीरता से की जा रही है। उल्लेखनीय बात यह भी रही कि जिन महिलाओं के साथ छेड़छाड़ हो रही थी, उन्होंने भी साहस दिखाते हुए पुलिस को फोन किया और समय पर मदद बुलाई, जिससे मुकेश को जल्द अस्पताल पहुँचाया जा सका।
 
इस घटना के बाद इलाके के लोगों में गहरी चर्चा शुरू हो गई। स्थानीय निवासियों और दुकानदारों ने उस मुस्लिम व्यक्ति की खुले दिल से सराहना की, जिसने आगे बढ़कर जान बचाई। एक दुकानदार ने कहा, “आज के समय में जब लोग अपने ही झमेले में फँसे रहते हैं और मदद करने से डरते हैं, उस आदमी ने दिखा दिया कि इंसान होना क्या होता है।”
 
यह घटना महिलाओं की सुरक्षा और सार्वजनिक स्थानों पर बढ़ती असुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। साथ ही, यह उन लोगों के लिए भी एक उदाहरण है जो अन्याय देखकर भी चुप रहना बेहतर समझते हैं। मुकेश का मानना है कि अगर समाज में और लोग ऐसे साहस का परिचय दें, तो हालात बदल सकते हैं। उन्होंने यह भी इच्छा जताई कि जिस व्यक्ति ने उनकी जान बचाई, उसे आधिकारिक रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए।
 
महरौली की यह घटना हमें याद दिलाती है कि धर्म, जाति और पहचान से ऊपर इंसानियत होती है। जब एक हिंदू युवक की जान बचाने के लिए एक मुस्लिम शख्स आगे आता है, तो वह उन तमाम दीवारों को तोड़ देता है, जो नफरत ने खड़ी कर दी हैं। यह कहानी सिर्फ़ एक हमले की नहीं है, बल्कि उस भाईचारे की है जो मुश्किल समय में हिंदू और मुस्लिम को एक-दूसरे का सहारा बना देता है।
 
आज जब समाज में विभाजन की बातें ज़्यादा सुनाई देती हैं, तब यह घटना एक सशक्त संदेश देती है—कि इंसानियत अभी मरी नहीं है। वह आज भी ज़िंदा है, उन लोगों के रूप में जो सही और ग़लत के बीच खड़े होने का साहस रखते हैं, चाहे उसके लिए उन्हें कितनी ही बड़ी क़ीमत क्यों न चुकानी पड़े।