काहिरा में हिंदी की धमक, गंगा से नील नदी तक सांस्कृतिक सेतु बना 'अफ्रीकी क्षेत्रीय सम्मेलन'

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 10-02-2026
The resonance of Hindi echoed in Cairo, as the 'African Regional Conference' built a cultural bridge from the Ganges to the Nile.
The resonance of Hindi echoed in Cairo, as the 'African Regional Conference' built a cultural bridge from the Ganges to the Nile.

 

आवाज़ द वॉयस/ नई दिल्ली/ काहिरा

मिस्र की राजधानी काहिरा में आयोजित दो दिवसीय “हिंदी भाषा पर अफ्रीकी क्षेत्रीय सम्मेलन” ने भाषा और संस्कृति के माध्यम से भारत और अफ्रीका के देशों के बीच संवाद और सहयोग को नई दिशा देने का अवसर प्रस्तुत किया। यह सम्मेलन 8 और 9 फरवरी को आयोजित किया गया, जिसमें अफ्रीका के विभिन्न देशों के विद्वान, शोधकर्ता और हिंदी भाषा के उत्साही शामिल हुए। इसका उद्देश्य न केवल हिंदी भाषा के वैश्विक प्रसार और महत्व को समझना था, बल्कि यह भी दर्शाना था कि भाषा के माध्यम से दो देशों और उनके लोगों के बीच मित्रता और सहयोग का पुल बनाया जा सकता है।

सम्मेलन का भव्य उद्घाटन भारत के विदेश मंत्रालय की सचिव (दक्षिणी विभाग) डॉ. नीना मल्होत्रा ने किया। उद्घाटन समारोह में काहिरा में भारत के राजदूत सुरेश के. रेड्डी, ऐन शम्स विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहम्मद दिया ज़ीन अल अब्दीन और कई राजनयिक, शिक्षाविद और शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

उद्घाटन के समय डॉ. मल्होत्रा ने कहा कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं होती, बल्कि यह देशों और उनके लोगों के बीच सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बन सकती है। उन्होंने सम्मेलन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि हिंदी के माध्यम से भारत और अफ्रीकी देशों के बीच ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

सम्मेलन में उपस्थित विद्वानों ने हिंदी भाषा के वैश्विक प्रसार, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इसकी भूमिका और सांस्कृतिक कूटनीति में इसके योगदान पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। यह भी स्वीकार किया गया कि हिंदी केवल भारत की भाषा नहीं रही, बल्कि यह अब वैश्विक संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण साधन बन चुकी है। इसके माध्यम से भारतीय साहित्य, संगीत, नृत्य, फिल्म और कला के क्षेत्र में अपने मूल्य और संस्कृति का प्रभाव दुनिया भर में फैलाया जा सकता है। विशेष रूप से भारतीय सिनेमा को एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा गया, जिसने विदेशों में भारतीय भाषा और संस्कृति को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सम्मेलन के दौरान यह भी चर्चा हुई कि हिंदी भाषा भारत की “सॉफ्ट पावर” को बढ़ाने में एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में काम कर सकती है। इसके जरिए विदेशी छात्रों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों को भारतीय संस्कृति और मूल्यों से जोड़ा जा सकता है। भारतीय संस्कृति का प्रचार केवल साहित्य और भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भारतीय संगीत, नृत्य, फिल्म और कला भी शामिल हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के सकारात्मक प्रभाव को बढ़ाते हैं।

काहिरा स्थित भारतीय दूतावास ने ऐन शम्स विश्वविद्यालय के सहयोग से इस सम्मेलन का आयोजन किया। सम्मेलन का नारा था, “गंगा से नील नदी तक सांस्कृतिक अंतर्संबंध और सहयोग के लिए हिंदी भाषा।” यह नारा स्पष्ट रूप से भारत और अफ्रीका के बीच भाषा और संस्कृति के माध्यम से मजबूत संबंध स्थापित करने की दिशा को दर्शाता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य चुनिंदा शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और भाषा विशेषज्ञों को एक मंच पर लाना है, ताकि हिंदी भाषा के वैश्विक महत्व और सांस्कृतिक कूटनीति में इसकी भूमिका पर विचार किया जा सके।

सम्मेलन के दौरान प्रतिभागियों ने कई समकालीन विषयों पर चर्चा की। इनमें मुख्य रूप से शामिल थे: हिंदी भाषा की भूमिका से सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में हिंदी का महत्व, और भारतीय सिनेमा के माध्यम से हिंदी के प्रसार का प्रभाव। इस मंच के जरिए यह भी स्पष्ट हुआ कि हिंदी केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि यह देशों और उनके लोगों के बीच मित्रता और विश्वास का पुल भी बन सकती है।

ऐन शम्स विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. रामी माहेर ग़ाली ने अपने भाषण में कहा कि विश्वविद्यालय के लिए इस क्षेत्रीय आयोजन में अकादमिक भागीदार के रूप में चुना जाना गर्व की बात है। उन्होंने बताया कि यह सम्मेलन बहुसंस्कृतिवाद और भाषाई विविधता के समर्थन का प्रतीक है। साथ ही, यह भारत और मिस्र के बीच अकादमिक और सांस्कृतिक सहयोग को और मजबूती प्रदान करेगा। विश्वविद्यालय ने हिंदी भाषा शिक्षण के लिए विशेष केंद्र स्थापित किया है, जिसमें वर्तमान में 400 से अधिक छात्र हिंदी और उर्दू का अध्ययन कर रहे हैं। इस केंद्र की स्थापना से भाषा और भारतीय संस्कृति में विदेशी छात्रों की बढ़ती रुचि का स्पष्ट संकेत मिलता है।

मौलाना आजाद भारतीय सांस्कृतिक केंद्र ने भी इस सम्मेलन में अहम योगदान दिया। केंद्र ने शैक्षिक पाठ्यक्रम, कार्यशालाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के प्रचार में भूमिका निभाई है। पिछले दो दशकों में 2,500 से अधिक छात्रों ने यहां हिंदी भाषा के पाठ्यक्रमों में प्रवेश लिया है। यह स्पष्ट करता है कि हिंदी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवाद और सांस्कृतिक समझ का माध्यम बन रही है।

विदेश मंत्रालय ने इस आयोजन को एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में देखा। मंत्रालय के अनुसार, यह सम्मेलन भारत और मिस्र के बीच सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग को नई दिशा देगा। सम्मेलन का उद्देश्य केवल भाषा सिखाना नहीं था, बल्कि छात्रों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं को जोड़ना, संवाद को प्रोत्साहित करना और भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करना भी था। यह मंच न केवल भाषाई आदान-प्रदान का अवसर प्रदान करता है, बल्कि हिंदी भाषा की बढ़ती वैश्विक भूमिका और भारतीय संस्कृति के प्रसार को भी उजागर करता है।

सम्मेलन ने यह भी संदेश दिया कि हिंदी आज विश्व की सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। यह भाषा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, साहित्य और दर्शन का प्रतिनिधित्व करती है। इसके माध्यम से भारत और अफ्रीका के बीच आपसी समझ और सांस्कृतिक सहयोग को मजबूत किया जा सकता है। सम्मेलन ने यह दिखाया कि भाषा और संस्कृति के माध्यम से देशों और लोगों को जोड़ना संभव है।

अंततः, काहिरा में आयोजित यह क्षेत्रीय सम्मेलन हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार में मील का पत्थर साबित हो रहा है। यह न केवल अफ्रीकी देशों में हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है, बल्कि भारत और अफ्रीका के बीच सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान-प्रदान को भी मजबूती प्रदान करता है। यह आयोजन इस बात का प्रतीक है कि भाषा और संस्कृति देशों और लोगों को जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम हो सकती है।

इस सम्मेलन के जरिए स्पष्ट हुआ कि हिंदी अब केवल भारत की भाषा नहीं रह गई, बल्कि यह वैश्विक संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गई है। यह न केवल सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देती है, बल्कि देशों और लोगों के बीच मित्रता, विश्वास और सहयोग का पुल भी बनाती है। भारत और मिस्र के बीच यह संवाद भारतीय संस्कृति और मूल्यों को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

कुल मिलाकर, हिंदी भाषा पर अफ्रीकी क्षेत्रीय सम्मेलन ने यह सिद्ध कर दिया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सहयोग, एकता और साझा संस्कृति की संचारक शक्ति भी बन सकती है। यह आयोजन भारत और अफ्रीका के बीच भविष्य में और भी मजबूत, सकारात्मक और टिकाऊ संबंधों की नींव रख रहा है।