अर्सला खान, नई दिल्ली
दिल्ली की सर्दियों की एक सुहानी सुबह और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) का वो मशहूर ढाबा, जहाँ चाय की चुस्कियों के साथ देश-दुनिया के जेंडर और न्यूट्रिशन जैसे गंभीर मसलों पर बहस छिड़ी रहती थी। उस दौर में एमफिल की एक छात्रा, जो अपनी पढ़ाई में पूरी तरह डूबी हुई थी, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन उसकी आवाज़ करोड़ों घरों के लिविंग रूम तक पहुँचेगी। वह छात्रा कोई और नहीं, बल्कि आज की चर्चित न्यूज़ एंकर नगमा सहर थीं।
नगमा आज जब पीछे मुड़कर देखती हैं, तो खुद अचंभित रह जाती हैं। जेएनयू की उन गलियों से निकलकर टीवी स्क्रीन की चमक-धमक तक का सफर किसी तिलिस्म से कम नहीं है। लेकिन यह चमक रातों-रात नहीं मिली। इसके पीछे बरसों की मशक्कत, ज़मीनी रिपोर्टिंग की धूल और खुद को साबित करने की एक अंतहीन जिद छिपी है।

जब भी भारतीय टीवी पत्रकारिता में एक संतुलित, बेबाक और संवेदनशील महिला आवाज़ की तलाश होती है, तो नगमा सहर का नाम सबसे ऊपर आता है। 18 अगस्त 1973 को बिहार की राजधानी पटना में जन्मी नगमा ने पत्रकारिता के उस दौर में अपनी पहचान बनाई, जब न्यूज़ रूम में महिलाओं के लिए रास्ते इतने आसान नहीं थे।
पटना की आबोहवा में पली-बढ़ी नगमा ने अपनी उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली का रुख किया। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई के बाद उन्होंने जेएनयू से एमफिल किया। उनकी पढ़ाई का विषय 'जेंडर और न्यूट्रिशन' था। इस विषय की गहराई ने उन्हें समाज के उन हिस्सों को देखने का नज़रिया दिया, जहाँ अक्सर कैमरा नहीं पहुँच पाता।
उन्हें ग्रामीण विकास के क्षेत्र में जूनियर रिसर्च फैलोशिप (JRF) भी मिली। उन्होंने पॉपुलेशन काउंसिल जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ प्रोजेक्ट्स पर काम किया। यह अकादमिक अनुभव उनकी पत्रकारिता की रीढ़ बना, जो आज भी उनके न्यूज़ बुलेटिन में तथ्यों की गहराई और संतुलित दृष्टिकोण के रूप में साफ झलकता है।
नगमा के करियर की शुरुआत 1999 में प्रिंट मीडिया से हुई। एशियन एज में एक छोटे से कार्यकाल के बाद उन्होंने टीवी की दुनिया में कदम रखा। उस दौर में टीवी न्यूज़ रूम में महिलाओं को अक्सर 'सॉफ्ट बीट्स' या मनोरंजन की खबरें दी जाती थीं।

लेकिन नगमा ने खुद को इस दायरे में बंधने नहीं दिया। उन्होंने अपनी रिसर्च और तैयारी के दम पर यह साबित किया कि एक महिला पत्रकार भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति और रक्षा जैसे गंभीर विषयों पर उतनी ही पकड़ रख सकती है, जितनी कि कोई पुरुष। साल 2003 में उन्होंने एनडीटीवी इंडिया के साथ अपनी नई पारी शुरू की। यहाँ उन्होंने प्राइम टाइम एंकरिंग के साथ-साथ रिपोर्टिंग के वो मोर्चे संभाले, जो किसी भी पत्रकार के लिए अग्निपरीक्षा जैसे होते हैं।
उनकी रिपोर्टिंग का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब तमिलनाडु में सुनामी ने तबाही मचाई, तो नगमा ने प्रभावित इलाकों में लगातार पंद्रह दिन बिताए। उन्होंने उन आँखों का दर्द करीब से देखा जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया था। मुंबई ट्रेन ब्लास्ट की चीखें हों, कश्मीर के पेचीदा चुनाव हों या फिर दिल्ली-लाहौर बस सेवा की ऐतिहासिक शुरुआत, नगमा हर उस जगह मौजूद रहीं जहाँ इतिहास बन रहा था। उनका अंदाज़ा-ए-बयां हमेशा सरल और सौम्य रहा, लेकिन उनके सवाल बेहद चुभते हुए और सीधे होते थे।
नगमा सहर का सबसे चर्चित शो 'सलाम ज़िंदगी' न्यूज़ की दुनिया में एक ताज़ा हवा के झोंके जैसा था। जहाँ बाकी चैनल्स सनसनी के पीछे भाग रहे थे, नगमा ने इस शो के ज़रिए ट्रांसजेंडर समुदाय, नशे की लत और सामाजिक भेदभाव जैसे हाशिए पर पड़े मुद्दों को मुख्यधारा में लाया।
उन्होंने इन संवेदनशील विषयों को कभी भी तमाशा नहीं बनने दिया। उन्होंने इन लोगों को सम्मान के साथ पेश किया और समाज को एक नया आईना दिखाया। यही वजह है कि 'सलाम ज़िंदगी' ने एक ऐसा दर्शक वर्ग तैयार किया जो न्यूज़ में केवल शोर नहीं, बल्कि सरोकार ढूँढता था।
चुनावों के दौरान भी नगमा का अंदाज़ बिल्कुल अलग नज़र आता है। 'इलेक्शन एक्सप्रेस' और 'वोट यात्रा' जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए उन्होंने हफ्तों तक बस से देश का सफर किया। वे एसी स्टूडियो छोड़कर धूल भरे गाँवों और कस्बों में पहुँचीं। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, बेरोज़गारी और विकास के उन असली सवालों को राष्ट्रीय मंच पर जगह दी, जो अक्सर चुनावी रैलियों के शोर में दब जाते हैं। उनकी रिपोर्टिंग में आम आदमी की चिंता हमेशा सर्वोपरि रही।

आज नगमा 'इंटरनेशनल एजेंडा' जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम का चेहरा हैं। इस शो में वे दुनिया भर की पेचीदा राजनीति को इतनी सरल भाषा में समझाती हैं कि एक आम दर्शक भी उसे आसानी से समझ सके। इराक और अफगानिस्तान के युद्ध हों या फिर संयुक्त राष्ट्र में भारत की बदलती भूमिका, नगमा हर वैश्विक घटनाक्रम को भारतीय चश्मे से देखने और दिखाने की कला में माहिर हैं।
वे केवल न्यूज़ एंकर नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी मुस्लिम महिला की आवाज़ भी हैं जो आधुनिकता और परंपरा के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाकर चलती हैं। उन्होंने तीन तलाक, मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक बराबरी जैसे मुद्दों पर हमेशा मुखर होकर अपनी राय रखी है। उनका मानना है कि किसी भी समाज की तरक्की तब तक मुमकिन नहीं है, जब तक महिलाएँ उसमें बराबर की साझीदार न हों।
निजी जीवन में नगमा सहर बहुत ही मिलनसार और पारिवारिक महिला हैं। वे एक सुशिक्षित मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनकी दो बहनें रेशमा और सायमा भी अपने-अपने क्षेत्र में सफल हैं। नगमा का विवाह राजीव श्रीवास्तव से हुआ है और उनकी बेटी इरा तज़ीन उनके जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा है।
न्यूज़ रूम की आपाधापी और 'प्राइम टाइम' के तनाव के बीच भी नगमा अपने परिवार के लिए समय निकालना नहीं भूलतीं। उन्हें यात्रा करना, फोटोग्राफी, तैराकी और किताबें पढ़ना बेहद पसंद है। ये शौक उन्हें उस संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं, जो एक पत्रकार के तौर पर बहुत ज़रूरी है।
नगमा सहर की कहानी महज़ एक सफल टीवी एंकर की कहानी नहीं है। यह उस हिम्मत की कहानी है जिसने हर चुनौती को एक मौके में बदला। उन्होंने न्यूज़ रूम के उस रूढ़िवादी ढर्रे को तोड़ा जिसमें एंकर का काम सिर्फ खबर पढ़ना माना जाता था।

उन्होंने दिखाया कि एक पत्रकार को सबसे पहले एक संवेदनशील इंसान होना चाहिए। जेएनयू की गलियों से शुरू हुआ यह सफर आज अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ डेस्क तक पहुँच चुका है, लेकिन नगमा की सादगी और सौम्यता आज भी वैसी ही बनी हुई है।
वे आज हज़ारों युवा लड़कियों के लिए एक प्रेरणा हैं जो पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। नगमा सहर का सफर हमें यह सिखाता है कि अगर आपकी मंशा साफ है और आपमें मेहनत करने का जज़्बा है, तो आप दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर बदलाव की इबारत लिख सकते हैं।