दयाराम वशिष्ठ
दिल्ली के प्रसिद्ध हुमायूं के मकबरे में बहुत जल्द लोग मुगल काल की चीज़ें देख और उनके बारे में जान सकेंगे.इस म्यूजियम में मुगलकालीन कला को आगे बढ़ा रहे नगीना(यूपी)के रहने वाले मोहम्मद मतलूब. इनकी यहां हस्तकला भी देखने को मिलेगी.मोहम्मद मतलूब इन दिनों मुगलकालीन नक्काशी को चार चांद लगाने में जुटे हैं.
इस संग्रहालय में मुगलकालीन वस्तुओं को संग्रहित किया जा रहा है.इससे यहां आने वाले लोगों को मुगलकालीन इतिहास की जानकारी मिल सकेगी.इस तरह नए संसद भवन में बनाई गई आर्ट गैलरी में शीशम की लकड़ी पर बनाई गई जाली भी इन्ही के हाथ से बनाई गई हैं.
हस्तशिल्प भारतीय शिल्प गुरू मोहम्मद मतलूब की कला देश विदेशों में विख्यात है.अब इनका लक्ष्य है बेहतर कला के जरिए पदम श्री अवार्ड हासिल करना.वे कलां को निरंतर आगे बढा रहे हैं.

बचपन में स्कूल में पढ़ाई के दौरान सीखी कला
58 वर्षीय मोहम्मद मतलूब के बचपन की कहानी अनोखी है.नगीना में रात के वक्त सबीना नाम का नाइट स्कूल चलता था, जिसमें दिन के समय कला सीखते व रात के समय उर्दू ,हिंदी की शिक्षा ग्रहण करते थे.
कड़ी मेहनत के चलते यह मुकाम हासिल किया.गुरु शब्बीर हुसैन से काम सीखने के बाद नगीना के रहने वाले नेशनल अवार्ड विजेता गुरू अब्दुल रहमान खान के पास जामा मस्जिद में जाकर काम सीखा.10 साल की उम्र में प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया.उस समय गुरु हाथी दांत की जाली बनाते थे.

अवार्ड और सम्मान
चंदन की लकड़ी हुई महंगी, रोजवुड का करते हैं उपयोग
मोहम्मद मतलूब ने बताया, “वह कलाकृति बनाने के लिए चंदन वुड, शीशम वुड, टीकवुड और एवनीवुड का प्रयोग करने लगे.चंदन महंगा होने पर अब रोजवुड व शीशम का उपयोग करते हैं.यह लकड़ी काफी सख्त होती है.जिससे इन पर आसानी से नक्काशी की जा सकती है.
काम पूरा होने बाद फिनिशिंग भी अच्छी आती है.वह फर्नीचर के अलावा पार्टीशन, घरों के मॉडल, शीशा फ्रेम, फोटो फ्रेम, बॉक्स, सजावटी चीजें तैयार करते हैं.”

महरौली आर्ट गैलरी के साथ करते रहे फर्नीचर का काम
मोहम्मद मतलूब के हाथों से बनी मुगल वुड कार्विंग कला देखते ही बनती है.इनके हाथों का बना मुगल वुड क्राफ्ट व फर्नीचर का सामान ग्राहकों की पसंद बन रहा है.मतलूब को यह कला विरासत में मिली है.उनके पूर्वज इस कार्य को मुगल काल से करते चले आ रहे हैं.इसलिए इसे मुगल वुड कार्विंग नाम दिया गया है.
उनका कहना है, “अब फैशन बदल गया.लोगों को पुरानी लकडी की पहचान नहीं है.अब प्लाईवुड का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा. जंगलों पेडों को काटने से लकड़ी का वजूद खत्म हो गया.गुप्ता ब्रॉदर्स आर्ट गैलरी में आज भी पुरानी लकडी का इस्तेमाल करते हैं.

पुरानी लकड़ी का इस्तेमाल करना सबसे बेहतर
आज भी वह कबाडियों से पुरानी इमारतों की लकड़ी खरीदकर अपनी बेहतरीन कला के जरिए नया डिजाइन देते हैं.पॉलिश होने के बाद पुरानी लकड़ी से बने इन आइटमों की खासियत होती है कि इनके कभी भी जोड नहीं खुल सकते.
ये टिकाऊ और मजबूत होती हैं.इसलिए वह ज्यादातर पुरानी इमारतों से लकड़ी का इस्तेमाल कर अपनी कला को प्रदर्शित करते रहते हैं.पुरानी लकड़ी की तुलना में नई लड़की कहीं भी नहीं टिकती.शीशम की लकडी की डबल डिजाइन तैयार कर एक नया रूप देते हैं.

देश में कम होते जा रहे हैं पारखी
मोहम्मद मतलूब ने बताया कि मुगलकालीन वुड क्राफ्ट के पारखी कम होते जा रहे हैं.मुंबई, आर्ट गैलरी, दिल्ली हाट को छोड़ दिया जाए, तो देश के अन्य हिस्सों के लोग इसे नहीं खरीदते हैं.
पुर्तगाल, ईरान, इराक के लोग खरीद है.उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि दो कारीगरों द्वारा लकड़ी के एक पार्टीशन को तैयार करने में एक साल का समय लगता है.इसके चलते यह कला महंगी हो जाती है.

पुरानी यादें तरोताजा कर हो गई आंखें नम
मोहम्मद मतलूब ने पुराने दिनों की याद ताजा करते हुए बताया, “उनके पिता मोहम्मद अय्यूब लकड़ी के काम में कड़ी मेहनत करते थे.आमदनी का कोई अन्य जरिया नहीं था.उस समय पैसे का अभाव था.
एक दिन उनके पास ईंधन के लिए लकड़ी खरीदने तक के पैसे नहीं थे तो उन्होंने जंगल से पेड़ के पत्ते इकट्ठे किए.इसके बाद घर में खाना बना,लेकिन उनके नेक इरादे व कड़ी मेहनत के बलबूते आज देश विदेश तक में उनका नाम है.यह बताते हुए उनकी आंखें नम तक हो गई.

विदेशी दूतावास उनकी कला के हैं दीवाने
वर्ष 89 से बेहतर कला के चलते मोहम्मद मतलूब पुर्तगाल एंबेसी से जुड गए.आज कई दूतावास में उनकी कला के लोग दिवाने बन चुके हैं, जो लकड़ी का कोई भी काम उन्हीं से करवाते हैं.उनकी कला का जादू देश विदेशों तक में फैल गया है.

हज जाते वक्त हवाई जहाज का सफर बना सुहाना
हस्तकला में जीरो से हीरो बनने के बाद मोहम्मद मतलूब ने अच्छी कमाई करने के बाद अपने माता पिता व पत्नी को हज लेकर गए.इस दौरान उन्होंने पहली बार हवाई जहाज का सफर किया तो उन्हें बेहद खुशी हुई है.
देश विदेश में दे रहे हैं कला की ट्रेनिंग
शिल्पगुरू बनने के बाद अब मोहम्मद मतलूब देश विदेश में कला को बचाने में जुटे हैं.इसे लेकर वे वुड क्राफ्ट में ट्रेनिंग देने का काम करते हैं.अब तक वे अर्जेंटीना, इटली, ईरान, बेल्जियम, ओमान, इजिप्ट, व इंग्लैंड में जाकर कला का प्रदर्शन कर चुके हैं.अब इन्हें कॉलेजों में भी कला के बारे में प्रशिक्षण देने के लिए भेजा जाता है.

माता पिता की सेवा
मोहम्मद मतलूब ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि अगर कामयाब होना है तो जीवन में बुजुर्ग व माता पिता की सेवा करनी बहुत जरूरी है.उनके आर्शीवाद के बिना कुछ भी संभव नहीं.बड़ों की इज्जत करने पर जो आर्शीवाद मिलता है, वही हर इंसान के सफलता का राज होता है.

खाविंद को मिले अब पद्मश्री
शिल्पगुरू मोहम्मद मतलूब की बेगम (पत्नी) शाहीन अंजुम कहती हैं, “उनके खाविंद (पति) को अब पद्मश्री मिलनी चाहिए.इस हस्तशिल्प को बचाने के लिए उनका संघर्ष काबिले तारीफ है.सरकार ने उन्हें अनेक पुरस्कार और सम्मान दिए हैं.सरकार की मदद से नक्काशी शिल्पकला से देश-विदेश में पहचान मिली है.

शिल्पकार का परिचय
शिल्पकार मोहम्मद मतलूब मूलरूप से उत्तर-प्रदेश के नगीना के हैं
दिल्ली में रहकर अपनी हस्तशिल्प कला को दूसरों तक पहुंचा रहे हैं
पत्नी अंजुम, बेटा मोहम्मद मरगूब, बड़ी बेटी शादिया उनका इसमें सहयोग करती हैं.