नई दिल्ली:
इसबगोल, जिसे आमतौर पर इसबगुल या साइलियम भूसी के नाम से जाना जाता है, भारतीय घरों में लंबे समय से इस्तेमाल किया जा रहा है। परंपरागत रूप से इसे कब्ज और पाचन संबंधी समस्याओं में सहायक माना जाता है। हाल के वर्षों में फाइबर की अहमियत, बदलती जीवनशैली और बढ़ती पाचन समस्याओं के चलते इसबगोल को लेकर लोगों की दिलचस्पी फिर से बढ़ी है।
इसबगोल प्लांटेगो ओवाटा नामक पौधे के बीजों के बाहरी छिलके से प्राप्त होता है। बीजों को संसाधित करने के बाद उनका जो आवरण अलग किया जाता है, वही इसबगोल कहलाता है। यह हल्के रंग का, स्वादहीन और परतदार होता है। पानी या दूध में मिलाने पर यह फूलकर जेल जैसी बनावट बना लेता है। यही विशेषता इसे पाचन तंत्र के लिए उपयोगी बनाती है।
पोषण के लिहाज से इसबगोल लगभग पूरी तरह आहार फाइबर से बना होता है, खासकर घुलनशील फाइबर से। इसमें कैलोरी, वसा, प्रोटीन या शर्करा नगण्य मात्रा में होती है। साथ ही इसमें विटामिन और खनिज भी बहुत कम पाए जाते हैं। इस कारण इसे संपूर्ण आहार नहीं, बल्कि एक “कार्यात्मक फाइबर” माना जाता है। इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कितनी मात्रा में और कितने तरल के साथ लिया गया है।
स्वास्थ्य लाभों की बात करें तो इसबगोल पाचन को सुचारु बनाए रखने में मदद कर सकता है। यह मल की मात्रा और नमी बढ़ाता है, जिससे नियमित और आसान मल त्याग संभव होता है। इसके जेल बनाने वाले गुण दस्त और कब्ज—दोनों स्थितियों में सहायक हो सकते हैं। यह ढीले मल को सख्त करने और कठोर मल को नरम करने में मदद करता है।
इसके अलावा, इसबगोल घुलनशील फाइबर होने के कारण कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में भी सहायक माना जाता है। यह पित्त अम्लों से जुड़कर खराब एलडीएल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में मदद कर सकता है। मधुमेह रोगियों के लिए भी यह लाभकारी हो सकता है, क्योंकि यह कार्बोहाइड्रेट के अवशोषण को धीमा कर भोजन के बाद रक्त शर्करा में अचानक बढ़ोतरी को रोकता है।
इसबगोल पेट भरा होने का एहसास भी बढ़ाता है, जिससे वजन नियंत्रण में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका सेवन हमेशा पर्याप्त पानी या तरल के साथ करना चाहिए, क्योंकि बिना तरल के इसका सेवन उल्टा असर डाल सकता है।
कुल मिलाकर, सही मात्रा और सही तरीके से लिया जाए तो इसबगोल पाचन और समग्र स्वास्थ्य के लिए एक प्रभावी सहायक साबित हो सकता है।






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