फुले और शेख़ परिवारों की वह ऐतिहासिक दोस्ती जो नौजवानों के लिए मिसाल है

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 06-01-2026
The historic friendship between the Phule and Sheikh families is an example for young people.
The historic friendship between the Phule and Sheikh families is an example for young people.

 

dसमीर डी. शेख

भारत में महिलाओं की शिक्षा की नींव रखने वालीं क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले की आज जयंती है। 19वीं सदी के समाज सुधार का दौर महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के ज़िक्र के बिना अधूरा है। फुले दंपत्ति ने शूद्रों, अति-शूद्रों और महिलाओं की भलाई के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी। लेकिन उनके इस ऐतिहासिक काम में मुस्लिम समाज के योगदान के बारे में बहुत से लोगों को ज़्यादा जानकारी नहीं है।

महात्मा फुले का इस्लाम के लिए आदर

महात्मा ज्योतिराव फुले का इस्लाम को देखने का नज़रिया बहुत उदार था। उन्हें इस्लाम में बराबरी का विचार बहुत पसंद था। उन्होंने पैगंबर हज़रत मुहम्मद के काम की तारीफ़ करते हुए एक 'पोवाड़ा' (लोकगीत) भी लिखा है। उसकी पंक्तियां इस्लाम में बराबरी के संदेश को रेखांकित करती हैं:"मालिक ग़रीब और अमीर को एक ही मानता है।वह सभी को सुख देता है।मुहम्मद जिसका दुनिया में बोलबाला है।उन्हों ने ही सच्चा रास्ता दिखाया है।"

गफ्फार बेग मुन्शी, उस्मान शेख़ और फ़ातिमा शेख़: मुसीबत के साथी

जब महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई लड़कियों को पढ़ाने के लिए घर से बाहर निकले, तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। विरोध इतना तीखा था कि ख़ुद पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया। ऐसे मुश्किल वक़्त में उनके मुस्लिम दोस्त उस्मान शेख़ उनकी मदद के लिए दौड़कर आए। उस्मान शेख़ ने फुले दंपत्ति को न सिर्फ़ रहने के लिए घर दिया, बल्कि अपने ही घर में स्कूल शुरू करने की इजाज़त भी दी।

इस सफ़र में सावित्रीबाई को साथ मिला फ़ातिमा शेख़ का। फ़ातिमा शेख़ सावित्रीबाई की पहली मुस्लिम साथी शिक्षिका थीं। जब सावित्रीबाई पुणे की सड़कों से स्कूल जाने के लिए निकलती थीं, तो लोग उन पर गोबर और पत्थर फेंकते थे। ऐसे वक़्त में सावित्रीबाई अपने थैले में दूसरी साड़ी साथ रखती थीं। इस अपमान और ज़ुल्म को सहते हुए फ़ातिमा शेख़ ने सावित्रीबाई के कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दिया।

सावित्रीबाई का फ़ातिमा पर जो भरोसा था, वह महात्मा फुले को लिखी उनकी एक चिट्ठी में दिखता है। अपने गांव से सावित्रीबाई लिखती हैं, "मेरी ग़ैर-मौजूदगी में काम का बोझ फ़ातिमा पर पड़ेगा, लेकिन वह शिकायत नहीं करेगी।"

सावित्रीबाई का काम और 'काव्यफुले' का उर्दू अनुवाद 

महात्मा फुले और सावित्रीबाई फुले ने स्त्री-शिक्षा के साथ-साथ विधवाओं के सिर मुंडवाने जैसी प्रथाओं के ख़िलाफ़ नाइयों की हड़ताल करवाई और 'बाल हत्या प्रतिबंधक गृह' शुरू किया। उनके स्कूल के पहले बैच में मुस्लिम लड़कियों की बड़ी तादाद थी। फ़ातिमा शेख़ ने इन लड़कियों को स्कूल लाने और उन्हें पढ़ाने के लिए बहुत मेहनत की।

सावित्रीबाई के विचारों की गहराई उनके कविता संग्रह 'काव्यफुले' से पता चलती है। पुणे के एक उर्दू स्कूल की प्रिंसिपल डॉ. नसरीन रमजानने इस संग्रह का उर्दू में अनुवाद किया है, ताकि यह विचार मुस्लिम समुदाय तक पहुंच सके। इस पर 'आवाज़ मराठी' ने जो विस्तार से स्टोरी की है, वह आप पढ़ सकते हैं। 

फुले दंपत्ति से आज की मुस्लीम पीढ़ी को मिल रही है प्रेरणा

90 के दशक में जब फुले दंपत्ति का साहित्य राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा, तो बहुजन समाज ने इन विचारों से बड़ी प्रेरणा ली। सावित्रीबाई के कामों को सम्मान देते हुए, ऐतिहासिक पुणे यूनिवर्सिटी को अब 'सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी' के नाम से जाना जाता है।अब मुस्लिम समुदाय ने भी फुले दंपत्ति और फ़ातिमा शेख़ से बड़ी प्रेरणा ली है। आज महाराष्ट्र और देशभर में फ़ातिमा शेख़ के नाम से 50 से ज़्यादा फ़ेसबुक पेज हैं।

मुंबई के मुस्लिम-बहुल मुंब्रा जैसी जगहों पर 'फ़ातिमा शेख़ स्टडी सर्कल' काम कर रहे हैं। वहां मुस्लिम नौजवान लड़के-लड़कियां इकट्ठा होकर कई तरह के सामाजिक और शैक्षणिक कार्यक्रम चलाते हैं। पुणे के गंज पेठ स्थित महात्मा फुले वाड़ा में आज न सिर्फ़ बहुजन समाज के लोग, बल्कि बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाएं भी उन्हें खिराज़-ए-अक़ीदत पेश करने आती हैं। आज भी वही नज़ारा देखने को मिला। पुणे के आज़म कैंपस जैसे बड़े मुस्लिम शैक्षणिक संस्थानों में सावित्रीबाई और फ़ातिमा शेख़ के नाम पर कई प्रतियोगिताएं और कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। बच्चे सावित्री-फ़ातिमा पर भाषण देते हैं और उनसे प्रेरणा लेते हैं।

कुल मिलाकर, महात्मा फुले और सावित्रीबाई का काम और उन्हें मिले मुस्लिम साथियों का साथ, धार्मिक भाईचारे की एक जीती-जागती मिसाल है। इसमें कोई शक नहीं कि यह ऐतिहासिक गठजोड़ आज भी मुस्लिम समाज को बड़ी प्रेरणा दे रहा है!

(लेखक 'आवाज़-द वॉइस मराठी' के संपादक हैं)