खाने की बर्बादी का आखिर क्या है पूरा अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 10-04-2023
खाने की बर्बादी का आखिर क्या है पूरा अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान
खाने की बर्बादी का आखिर क्या है पूरा अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान

 

रावी द्विवेदी

अगर किसी इंसान को दो वक्त का खाना और रात को चैन की नींद नसीब हो जाए तो शायद उससे ज्यादा खुशकिस्मत कोई और नहीं होगा. लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि भारत ही पूरी दुनिया में जहां एक-तिहाई खाद्य उत्पादन विभिन्न कारणों से बर्बाद होता है, वहीं आबादी के एक बड़े हिस्से को खाली पेट रहकर अपनी रातें बेचैनी से काटनी पड़ती हैं. दुनियाभर में हर दिन 82.8 करोड़ लोगों को खाना नसीब नहीं हो पाता है. वहीं, भारत में भी हर दिन करीब 19 करोड़ लोगों को रात को भूखे पेट सोना पड़ता है. 

यह किस्सा शायद बहुत से लोगों को पता भी नहीं होगा कि जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे तब एक बार देश में अन्न का संकट उत्पन्न हो गया और लोगों के खाने के लाले पड़ने लगे. इस पर न केवल शास्त्री जी और उनके परिवार ने सप्ताह में एक दिन एक वक्त के भोजन का त्याग कर दिया, बल्कि उनके आह्वान पर देशभर के लाखों लोगों ने यही नियम अपनाया.
 
फिर क्या था, देखते-देखते भारत एक बड़ी समस्या से उबरने में कामयाब रहा. अब, मौजूदा हालात की बात करें तो हमारे देश में खाद्य उत्पादों के संकट जैसी कोई स्थिति नहीं है.
 
 
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर हर आठ में से एक आदमी को हर रोज दो वक्त का खाना क्यों नहीं मिल रहा. इसका सबसे बड़ा कारण है भोजन की बर्बादी. और, दूसरे शब्दों में कहें तो हम जाने-अनजाने अपनी थाली का जो भोजन फेंक रहे हैं, उससे न जाने कितने ही लोगों को पेट भर सकता है.
 
जरूरत है, खाने की बर्बादी के प्रति जागरूकता की. इसी को ध्यान में रखकर आवाज द वॉयस ने सेव फूड कैंपेन शुरू किया है, जिसका मकसद है लोगों को जागरूक करना. साथ ही यह पता लगाना कि बर्बादी को कैसे रोका जा सकता है. खाने की बर्बादी रोकने के पुख्ता उपाय ढूंढ़ने से पहले ये जानना भी जरूरी है कि इसका पूरा अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान क्या है.
 
भोजन की बर्बादी पूरी दुनिया में एक बड़ी समस्या
 
यूएन वर्ल्ड फूड प्रोग्राम की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 82.8 करोड़ लोगों यानी पूरी आबादी के करीब दस फीसदी हिस्से को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता है. और इनमें से 34.5 करोड़ लोग तो ऐसे ही जिन्हें बमुश्किल ही भोजन नसीब हो पाता है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल 90 लाख यानी हर दिन करीब 25 हजार लोग भूख की वजह से दम तोड़ देते हैं.
 
 
भूख के कारण हर चार सेकेंड में एक इंसान की मौत का यह आंकड़ा एड्स, टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियों के कारण होने वाली मौतों से कहीं ज्यादा है. दुनियाभर में खुदरा से लेकर खाद्य सेवा क्षेत्र और घरेलू स्तर पर औसतन एक बिलियन टन भोजन हर साल बर्बाद हो जाता है.
 
यह आंकड़ा वैश्विक स्तर पर उत्पादित कुल भोजन का लगभग 17 फीसदी है. वैश्विक स्तर पर उत्पादित कुल भोजन का तकरीबन 14 प्रतिशत फसल और खुदरा चरण के बीच बर्बाद हो जाता है.
 
फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2021 में हर उस पदार्थ, फिर चाहे वह प्रसंस्कृत हो, अर्ध-प्रसंस्कृत हो या कच्चा हो, को भोजन के रूप में परिभाषित किया गया है, जो मानव उपभोग के लिए तैयार किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर उत्पादित 31 फीसदी भोजन की या तो हानि होती है या फिर बर्बादी. सिर्फ 69 प्रतिशत भोजन ही उपभोग योग्य बचता है. भोजन की हानि और भोजन की बर्बादी दो अलग-अलग चीजें हैं.
 
भोजन की हानि का मतलब खाद्य उत्पादन से लेकर कटाई, भंडारण, पैकिंग, परिवहन, बिक्री और विपणन सहित सप्लाई चेन के विभिन्न चरणों में बर्बाद होने वाले भोजन से है.
 
वहीं, भोजन की बर्बादी का संदर्भ ऐसे भोजन से है, जो खुदरा, खाद्य सेवा क्षेत्र या घरेलू स्तर पर उपभोक्ताओं की वजह से या तो फेंका जाता है या फिर बर्बाद होता है. इसकी वजह अधिक मात्रा में भोजन खरीदना या बनाना या फिर जमाखोरी की वजह से उसका खराब होना या सड़ जाना है.
 
 
इसलिए खाली रहती है तमाम लोगों की थाली
 
भारतीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने मार्च 2022 में संसद में बताया था कि एक भारतीय परिवार हर साल प्रति व्यक्ति औसतन 50 किलो खाना बर्बाद करता है, जबकि दुनिया में भूखे पेट सोने को मजबूर हर चौथा शख्स भारतीय है.
 
यही नहीं लगभग 14 फीसदी भारतीय कुपोषण के शिकार हैं. वैश्विक स्तर की बात करें तो दुनियाभर में प्रति व्यक्ति हर साल औसतन 121 किलोग्राम भोजन बर्बाद होता है, जिसमें से घरों में बर्बाद होने वाले भोजन का आंकड़ा 74 किलोग्राम प्रति व्यक्ति है.
 
दक्षिण एशियाई देशों में से अफगानिस्तान में घरेलू स्तर पर सबसे ज्यादा (औसतन 82 किलोग्राम प्रति व्यक्ति) भोजन बर्बाद होता है. भूटान और नेपाल (औसतन 79 किलोग्राम प्रति व्यक्ति) इस मामले में दूसरे, जबकि श्रीलंका (औसतन 76 किलोग्राम प्रति व्यक्ति) तीसरे स्थान पर है.
 
फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2021 के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर बर्बाद होने वाले कुल भोजन में से औसतन 61 फीसदी घरों में, 26 फीसदी खाद्य सेवा क्षेत्र में और 13 फीसदी खुदरा स्तर पर बर्बाद होता है.
 
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट यह भी बताती है कि भोजन की बर्बादी के मामले में चीन, भारत और नाइजीरिया दुनिया के तीन शीर्ष देश हैं, जहां हर साल औसतन क्रमश: 91.65 मिलियन मीट्रिक टन, 68.76 मिलियन मीट्रिक टन और 37.94 मिलियन मीट्रिक टन भोजन बर्बाद होता है.
 
एक अनुमान के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर हर साल उत्पादित औसतन 45 फीसदी फल-सब्जियां, 35 फीसदी मछली और अन्य समुद्री आहार, 30 फीसदी अनाज, 20 फीसदी डेयरी उत्पाद और 20 फीसदी मांस बर्बाद हो जाता है. इतने बड़े पैमाने पर बर्बादी भी लाखों-करोड़ों लोगों की थाली खाली रह जाने की एक बड़ी वजह है.
 
आर्थिक रूप से भी भारी पड़ती यह बर्बादी
 
सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट-हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीआईपीएचईटी) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल उत्पादित कुल फल-सब्जी का औसतन 18 फीसदी बर्बाद हो जाता है.
 
देश में हर साल बर्बाद होने वाली फल-सब्जी की कीमत 13,300 करोड़ रुपये के आसपास आंकी गई है. वहीं, इमर्सन क्लाइमेट टेक्नोलॉजी नाम की एक कंपनी ने अपने एक अध्ययन में भारत में हर साल बर्बाद होने वाले फल, सब्जी और अनाज की कुल कीमत 44,000 करोड़ रुपये के आसपास आंकी है.
 
ब्रिटिश अखबार ‘द गार्डियन’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर हर खरबूज का औसतन 25.5 फीसदी भाग, ब्रेड का औसतन 22.4 फीसदी भाग और लेट्यूस (सलाद पत्ता) का लगभग 38.7 भाग फेंक दिया जाता है. अध्ययन के मुताबिक, एक औसत परिवार हर साल औसतन 700 पाउंड (लगभग 70 हजार रुपये) का उपभोग लायक भोजन फेंक देता है.
 
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में धान की 5.53 फीसदी, गेहूं की 4.93 फीसदी, काबुली चने की 8.41 फीसदी, काले चने की 7.07 फीसदी, सेब की 10.39 फीसदी, अमरूद की 15.88 फीसदी, आलू की 7.32 फीसदी और टमाटर की 12.44 उपज बर्बाद हो जाती है.
 
उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने इस साल फरवरी में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि 2017 से 2020 के बीच भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के विभिन्न गोदामों में कुल 11,520 टन अनाज सड़ गया, जिसकी कीमत लगभग 15 करोड़ रुपये के आसपास थी.
 
 
भोजन छोड़ने में कहीं न कहीं ‘संतुष्टि’ मिलती है
 
दुनियाभर में भूखे पेट सोने वाले लोगों में हर चौथा भारतीय है, और वर्ल्ड हंगर इंडेक्स में भारत का स्थान 107वां है. फिर भी, अमूमन सभी भारतीय घरों में होने वाली खाने की बर्बादी एक चिंताजनक तस्वीर पेश करती है.
 
इसका एक बड़ा कारण जागरूकता का अभाव तो है ही, साथ ही कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं. खासकर, बात जब शादी-पार्टियों या होटलों में खाना खाने की हो तो लोग कुछ ज्यादा लापरवाह नजर आते हैं.
 
ऐसे मौकों पर लोग अक्सर अपनी प्लेट में ज्यादा भोजन परोस लेते हैं और फिर उसे खा नहीं पाते. जानकारों की मानें तो इस तरह से खाने की बर्बादी ज्यादातर वही लोग करते हैं जिन्हें भूखे पेट भले न सोना पड़ता हो लेकिन अपने रोज के खाने को लेकर उनमें संतुष्टि का भाव नहीं होता.
 
पीपीएन डिग्री कॉलेज, कानपुर में साइकॉलजी डिपार्टमेंट की प्रमुख डॉ. आभा सिंह इस बारे में कहती हैं कि तमाम लोगों को आम तौर पर अपना मनपसंद भोजन नहीं मिल पाता या फिर भाग-दौड़ भरी जिंदगी में उनके पास आराम से बैठकर खाने का मौका नहीं होता.
 
ऐसे में जब भी उनके सामने तरह-तरह का भोजन होता है तो संतुष्टि की चाह में वे अपनी प्लेट में जरूरत से ज्यादा खाना परोस लेते हैं. उन्हें यह आभास ही नहीं होता कि कितनी भूख है, और कितना खा सकते हैं. और प्लेट में ज्यादा से खाना परोस लेते हैं, फिर जब खा नहीं पाते तो आखिरकार उसे कचरे में डालना पड़ता है.
 
वह आगे यह भी कहती हैं कि जो लोग खाने की तमाम तरह की चीजों से वंचित रहते हैं, उनमें इस तरह का भाव उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है. अपनी पसंदीदा चीजों से प्लेट को भर लेना उन्हें कहीं न कहीं खुशी पहुंचाता है. डॉ. आभा सिंह कहती हैं कि हम लोगों को यही सलाह देते हैं कि थोड़ा-थोड़ा खाना ही परोसकर खाएं, यह खाने की बर्बादी तो रोकेगा ही स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है.
 
 
 
छोटे-छोटे कदमों से बदल सकती है सूरत
 
हमारे बड़े-बुजुर्ग हमेशा से भोजन की बर्बादी रोकने पर जोर देते रहे हैं. यही नहीं सेहत दुरुस्त रहे, इसके लिए यह सलाह भी दी जाती रही है कि हमें जितनी भूख हो, उससे थोड़ा कम ही खाएं. जानकारों के मुताबिक हमें अपना पेट 50 फीसदी ठोस आहार और 25 फीसदी तरल पदार्थ से भरना चाहिए और बाकी हिस्सा खाली छोड़ देना चाहिए.
 
अगर हम इस सिद्धांत को अक्षरश: न भी अपनाएं और बस इतना ही कर लें कि अपनी प्लेट में उतना ही खाना ले जितना खा सकते हैं तो न जाने कितने लोगों को भूखे पेट नहीं सोना पड़ेगा.
 
हम अपने कुछ छोटे-छोटे कदमों से ही सूरत को पूरी तरह बदल सकते हैं, जैसे खाना बनाते-पकाते और परोसते समय ही उसकी मात्रा पर ध्यान दें ताकि ज्यादा बना खाना फेंकने की नौबत न आए. फल, सब्जियां और अन्य खाद्य सामग्रियों को खरीदते समय इस बात का ध्यान रखें कि आप इन्हें कितने समय तक स्टोर कर सकते हैं जिससे इस्तेमाल बिना ही उनके बर्बाद होने की नौबत न आए.
 
किसी होटल या रेस्टोरेंट में खाना ऑर्डर करते समय यह सुनिश्चित करें कि जरूरत से ज्यादा खाना न मंगा लें. फिर भी, अगर अतिरिक्त खाना बच रहा है तो पैक कराकर चाहें तो किसी जरूरतमंद को दे सकते हैं.
 
घर या पार्टी आदि में बचे खाने को भी प्लेट में छोड़ने से बेहतर होगा कि उसे साफ ढंग से अलग रखें और उसे उन लोगों तक पहुंचा दें जिन्हें उसकी जरूरत है. ऐसे छोटे-छोटे कदम भी 2030 तक खाने की बर्बादी घटाकर आधी करने के वैश्विक लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बेहद कारगर साबित हो सकते हैं.


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