प्रबंधन की विचारधारा से अलग विचारों की शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को नहीं रोक सकता विश्वविद्यालय: अदालत
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
दिल्ली उच्च न्यायालय ने डॉ. बी. आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय की एक छात्रा का निलंबन रद्द कर दिया है, जिसे एक विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के आरोप में निलंबित किया गया था। अदालत ने कहा कि वाक् और विचारों की शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को केवल इसलिए प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे प्रबंधन की विचारधारा से मेल नहीं खाते।
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि एक विश्वविद्यालय को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जिसमें छात्र शैक्षणिक या सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा में भाग लेने के लिए स्वतंत्र महसूस करें तथा शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और अहिंसक असहमति ऐसे वातावरण का स्वाभाविक हिस्सा हैं।
न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि जो विश्वविद्यालय केवल आज्ञाकारिता को स्वीकार करता है, वह अपनी व्यापक शैक्षिक भूमिका में विफल रहता है। अदालत ने कहा कि ऐसा इसलिए, क्योंकि यह केवल एक ऐसी जगह नहीं है जहां छात्र कक्षाएं लेते हैं और पाठ्यक्रम पूरा करते हैं, बल्कि यह वह जगह भी है, जहां उनसे स्वतंत्र विचार प्रक्रियाओं को सीखने और विकसित करने, प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित करने और आलोचनात्मक चिंतन में संलग्न होने की अपेक्षा की जाती है।
अदालत ने 13 मार्च को पारित एक आदेश में कहा, ‘‘एक विद्यालय/विश्वविद्यालय राज्य का एक अंग है और एक अनिवार्य सार्वजनिक कार्य करता है, अर्थात् भविष्य के निर्माताओं को आकार देना। विश्वविद्यालय केवल इसलिए वाक् और विचारों की शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित नहीं कर सकता, क्योंकि छात्रों के एक समूह द्वारा व्यक्त किए गए विचार प्रबंधन की विचारधारा से मेल नहीं खाते।’’
अदालत ने कहा, ‘‘जब छात्र शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से, बिना हिंसा या गंभीर व्यवधान के असहमति व्यक्त करते हैं, तो ऐसे आचरण को समग्र विकास के दायरे से बाहर नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, यह विश्वविद्यालय द्वारा प्रोत्साहित की जाने वाली विचार-विमर्श और चर्चाओं की स्वतंत्रता की भावना को दर्शाता है।’’