सानिया अंजुम/नई दिल्ली
गर्मियों में तापमान बढ़ते ही ठंडी और मीठी आइसक्रीम की चाह आम है, लेकिन यह शौक कोई नया नहीं है। प्राचीन सभ्यताओं में भी गर्मी से राहत पाने के लिए ठंडे, मीठे व्यंजनों का प्रचलन था।
जमी हुई मिठाइयों की शुरुआत को लेकर अलग-अलग दावे मिलते हैं-कहीं 17वीं सदी के इटली और फ्रांस का उल्लेख है तो कहीं पहली सदी के चीन का। हालांकि, आइसक्रीम बनाने से पहले बर्फ के उत्पादन और भंडारण की विश्वसनीय तकनीक जरूरी थी, जो सबसे पहले 550 ईसा पूर्व में फारस (आधुनिक ईरान) में विकसित हुई।
प्राचीन फारसियों ने रेगिस्तानी इलाकों में ‘यखचाल’ नामक बड़े, मधुमक्खी के छत्ते जैसे पत्थर के ढांचे बनाए। इनमें गहरी, इंसुलेटेड भूमिगत संरचनाएं होती थीं, जिससे साल भर बर्फ संग्रहित की जा सकती थी। ऊंचे गुंबद गर्म हवा को बाहर निकालते थे, जबकि ‘विंड कैचर’ ठंडी हवा भीतर पहुंचाते थे। ये संरचनाएं न केवल बर्फ के भंडार गृह थीं, बल्कि बर्फ बनाने का भी साधन थीं।
सर्दियों में नहरों के जरिए उथले तालाबों में पानी भरा जाता था, जो रात के कम तापमान और शुष्क हवा के कारण जम जाता था। ईरान में आज भी कई यखचाल मौजूद हैं। मेयबोद में स्थित 400 साल पुराने एक यखचाल के अध्ययन के अनुसार, इसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 50 घन मीटर-करीब 30 लाख बर्फ के टुकड़ों के बराबर थी।
इस संग्रहित बर्फ से फलों के शरबत, शोरबे और ‘फलूदा’ (गुलाब जल और सेवइयों से बनी जमी हुई मिठाई) जैसे व्यंजन बनाए जाते थे। लगभग 650 ईस्वी में फारस पर अरब विजय के बाद यह तकनीक मध्य पूर्व में फैल गई। इसी तकनीक से सीरिया में ‘बूज़ा’ और फारस में ‘बस्तानी’ जैसी खिंचावदार आइसक्रीम तैयार की गई।
इसी काल में चीन के तांग राजवंश (618–907) के दौरान ‘सुशन’ नामक जमी हुई मिठाई विकसित हुई, जिसे कवियों ने मुंह में पिघलने वाली, तरल और ठोस के बीच की बनावट वाला बताया।
जमाने के साथ फ्रीजिंग की तकनीक में बदलाव आया। 1558 में नेपल्स में जियाम्बातिस्ता डेला पोर्ता की पुस्तक ‘माजिया नातुरालिस’ प्रकाशित हुई, जिसमें बर्फ में शोरा (पोटैशियम नाइट्रेट) मिलाकर तरल पदार्थों को तेजी से ठंडा करने की विधि बताई गई। 17वीं सदी में नमक, पानी और बर्फ के मिश्रण से भी इसी तरह का प्रभाव सामने आया, जिससे कम बर्फ में ही जमी हुई मिठाइयां बनाना संभव हो गया।