आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
जानी-मानी हार्वर्ड इतिहासकार और पुलित्जर पुरस्कार विजेता कैरोलिन एल्किंस ने दुनिया के विभिन्न देशों में आज भी औपनिवेशिक कानून लागू रहने पर चिंता जाहिर की और इनकी गंभीरता से जांच की जरूरत बताई।
उन्होंने साथ ही कहा कि यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि लोगों को चुप कराने के लिए बनाए गए ये कानून आज सच में आज़ाद नागरिकों के लिए किसी काम के हैं भी या नहीं ?
एल्किंस ने ब्रिटिश शाही इतिहास पर आधारित अपनी किताब ''लिगेसी आफ वायलेंस’’ पर सोमवार को यहां चर्चा करते हुए बताया कि कैसे संस्थागत हिंसा औपनिवेशिक शासन का एक ज़रूरी हिस्सा थी और कैसे इसके प्रभाव आज भी वर्तमान को आकार दे रहे हैं।
इस संबंध में उन्होंने इराक, फलस्तीन और दुनिया के विभिन्न हिस्सों के हालात और भारत में सेंसरशिप संबंधी कानून एवं आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा इस्तेमाल किए गए कुछ दमनकारी कानूनों का हवाला दिया।
जयपुर साहित्योत्सव में एल्किंस ने ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा भारत समेत दुनिया के
विभिन्न हिस्सों में अपने औनिवेशिक राज के दौरान मूल निवासियों के खिलाफ की गई हिंसा पर एक सत्र में भाग लिया।