आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें टीवीके विधायक आर. श्रीनिवास सेतुपति को तमिलनाडु विधानसभा में विश्वास मत में भाग लेने से रोका गया था।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा, ‘‘कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह बेहद गंभीर है। उच्च न्यायालय कहता है कि इसका उपाय चुनाव याचिका है, लेकिन फिर भी अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है।’’
संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को कुछ मामलों में रिट (परमादेश) जारी करने की शक्ति से संबंधित है।
रिट जारी करने का मतलब उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति, अधिकारी या संस्था को लिखित औपचारिक आदेश देना है। यह आदेश संवैधानिक अधिकारों (मौलिक अधिकारों) को लागू करने या उनके उल्लंघन को रोकने के लिए जारी किया जाता है।
तमिलनाडु में तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) सरकार ने बुधवार को उस वक्त एक बड़ी बाधा पार कर ली, जब उसने प्रमुख विपक्षी दल द्रमुक के विधानसभा से बहिर्गमन और अन्नाद्रमुक में फूट के बीच 22 के मुकाबले 144 मतों के अंतर से विश्वास मत जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की। अन्नाद्रमुक के एक गुट ने सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन किया।
उच्च न्यायालय के 12 मई के अंतरिम आदेश को चुनौती देने वाली सेतुपति की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए पीठ ने इस मामले में उच्च न्यायालय में लंबित कार्यवाही पर भी रोक लगा दी।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘इस बीच संबंधित आदेश का प्रभाव और अनुपालन स्थगित रहेगा तथा लंबित रिट याचिका में उच्च न्यायालय के समक्ष आगे की कार्यवाही भी स्थगित रहेगी।’’
सेतुपति ने शिवगंगई जिले की तिरुपत्तूर विधानसभा सीट संख्या-185 से एक मत से जीत दर्ज की थी। उन्होंने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) नेता एवं पूर्व मंत्री के. आर. पेरियाकरुप्पन को केवल एक वोट से हराया था।
उच्चतम न्यायालय ने सेतुपति की याचिका पर पेरियाकरुप्पन और अन्य प्रतिवादियों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।
सेतुपति ने उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें अगले आदेश तक किसी भी विश्वास मत या संख्याबल की परीक्षा से जुड़ी किसी भी कार्यवाही में मतदान करने या भाग लेने से रोका गया था।