ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
“शिक्षा का कोई आयु सीमा नहीं होती। अगर इरादा मजबूत हो, तो हर मंज़िल आसान हो जाती है।” त्रिपुरा के जंपुइजाला ब्लॉक के प्रमोद नगर इलाके में एक कहानी जन्मी है, जो न केवल प्रेरणादायक है बल्कि वयस्क शिक्षा (adult education) के महत्व को भी जीवंत करती है। यह कहानी है दुदू मिया और उनकी बेटी रूमा अख्तर की, जिन्होंने इस साल त्रिपुरा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (TBSE) की कक्षा 12 की परीक्षा पास कर पूरे इलाके में सुर्खियाँ बटोर दीं। पिता और बेटी का यह संघर्ष और सफलता समाज के लिए शिक्षा और धैर्य का अनमोल उदाहरण बन गई है।
दुदू मिया की शिक्षा यात्रा उतनी आसान नहीं थी। उन्होंने 1997 में माध्यमिक परीक्षा पास की और 1999 में हायर सेकेंडरी परीक्षा दी, लेकिन वह पास नहीं हो पाए। इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और शिक्षण पेशे में कदम रखा। “मैंने कभी अपने सपनों को मरने नहीं दिया, बस उन्हें समय की चुनौती दी,” दुदू मिया ने अपनी भावनाएँ साझा करते हुए कहा।
लेकिन जीवन ने उन्हें फिर भी चुनौती दी। मार्च 2020 में, हाई कोर्ट के आदेश के बाद त्रिपुरा में स्कूलों की भर्तियों की जांच के चलते उनकी नौकरी चली गई। लगभग 10,000 शिक्षकों में से एक के रूप में नौकरी खोने के बाद, दुदू मिया ने कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए दिहाड़ी मजदूरी की और एक छोटा व्यवसाय भी शुरू किया। हर दिन उनकी ज़िंदगी संघर्ष और उम्मीद के बीच चल रही थी।

यह वह समय था जब उनकी बेटी रूमा ने कहा, “पिताजी, आप मेरे साथ हायर सेकेंडरी परीक्षा दें। हम दोनों मिलकर इसे कर सकते हैं।” दुदू मिया ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “अगर मेरी बेटी के साथ पढ़ाई कर सकता हूँ, तो क्यों न इसे यादगार बनाऊँ?” इसके बाद पिता और बेटी ने मिलकर पढ़ाई की। दुदू मिया अपने अनुभव और अनुशासन से रूमा के लिए शिक्षक बन गए। रोज़मर्रा की पढ़ाई के दौरान छोटे-छोटे सवाल, हल्की-फुल्की बहस और कभी-कभी हँसी-मजाक, सभी ने उन्हें न केवल करीबी बनाया बल्कि उनकी सफलता की नींव भी मजबूत की।
रूमा कहती हैं, “पिताजी भले ही 10वीं के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख पाए, लेकिन उनकी सीखने की ललक और धैर्य हमेशा मेरे लिए प्रेरणा रहे हैं। उनके साथ पढ़ाई करना मेरे लिए गर्व की बात थी।” इस साल बोर्ड परीक्षा के नतीजे घोषित हुए और दोनों पास हो गए।
यह सफलता न केवल उनके लिए बल्कि पूरे प्रमोद नगर और जंपुइजाला ब्लॉक के लिए गर्व की बात बन गई। यह साबित करता है कि वयस्क शिक्षा सिर्फ व्यक्तिगत विकास का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज में बदलाव लाने का ज़रिया भी हो सकती है।
बोर्ड के अध्यक्ष धनंजय गनचौधरी ने कहा, “दूधू मिया और रूमा की यह सफलता उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का काम करेगी जो किसी भी कारण से पढ़ाई जारी रखने में बाधा महसूस कर रहे हैं। यह साबित करता है कि उम्र कभी भी शिक्षा के लिए बाधा नहीं होती।”
अब दुदू मिया और रूमा अख्तर दोनों ने कॉलेज में दाखिला लेने का फ़ैसला किया है। दुदू मिया कहते हैं, “नौकरी जाने के बाद मैं बेबस महसूस करता था, लेकिन पढ़ाई का ख्याल मेरे मन से कभी दूर नहीं गया। अब मैं अपनी ग्रेजुएशन पूरी करने का लक्ष्य रखता हूँ। यह सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि उन सभी वयस्कों की जीत है जो कभी अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ चुके हैं।”
प्रमोद नगर और जंपुइजाला ब्लॉक के लोग इस पिता-बेटी की जोड़ी की सराहना कर रहे हैं। उनके धैर्य, संघर्ष और समर्पण की कहानी अब हर घर में प्रेरणा बन गई है। यह कहानी यह संदेश देती है कि शिक्षा किसी भी उम्र में हासिल की जा सकती है।
दूदू मिया और रूमा अख्तर ने न केवल अपने परिवार का गौरव लौटाया बल्कि समाज के लिए भी यह संदेश दिया कि शिक्षा जीवन में सबसे बड़ा हथियार है। उनकी साझा सफलता ने वयस्क शिक्षा को भी नई पहचान दी है और यह साबित किया है कि अगर इरादा मजबूत हो, तो किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है।'
