इस्तीफा स्वीकार करने से इनकार करना बंधुआ मजदूरी के समान : केरल उच्च न्यायालय

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 14-02-2026
Refusal to accept resignation amounts to bonded labour: Kerala High Court
Refusal to accept resignation amounts to bonded labour: Kerala High Court

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
केरल उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी कर्मचारी की ओर से दिये गये इस्तीफे को नियोक्ता द्वारा सेवा अनुबंध में उल्लेखित शर्तों के अधीन स्वीकार किया जाना चाहिए और ऐसा करने से इनकार करना बंधुआ मजदूरी के समान होगा।
 
अदालत ने सार्वजनिक क्षेत्र के एक उपक्रम (पीएसयू) के कंपनी सचिव को राहत देते हुए यह टिप्पणी की। कंपनी सचिव को इस्तीफा देने की अनुमति नहीं दी जा रही थी।
 
न्यायमूर्ति एन नागरेश ने कहा कि यदि नोटिस अवधि या सेवा अनुबंध में उल्लेखित अन्य शर्तों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है, तो नियोक्ता इस्तीफे को अस्वीकार नहीं कर सकता है।
 
न्यायमूर्ति ने कहा कि यदि गंभीर कदाचार के संबंध में अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रस्तावित हो या संस्थान को वित्तीय हानि पहुंचाने के मामले में कार्रवाई की जा रही हो, तो ऐसी स्थिति अपवाद हो सकती है।
 
अदालत ने कहा, ‘‘किसी भी अन्य परिस्थिति में, यदि नियोक्ता किसी कर्मचारी का इस्तीफा स्वीकार करने से इनकार करता है, तो यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत निषिद्ध बंधुआ मजदूरी के समान होगा।’’
 
यह आदेश कंपनी सचिव द्वारा दायर याचिका पर आया है, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी द्वारा जारी किये गये उन कारण बताओ नोटिस और ज्ञापनों को चुनौती दी थी, जिनमें उन्हें इस्तीफा देने के बाद भी कार्यभार संभालने का निर्देश दिया गया था।
 
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) ने उनका इस्तीफा खारिज कर दिया था और उनसे पूछा था कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न शुरू की जाये।
 
पीएसयू की वित्तीय स्थिति के कारण उनकी सेवाओं को समाप्त नहीं किया जा सकता था, इसलिए उसने उनका इस्तीफा स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
 
पीएसयू की कार्रवाई को दरकिनार करते हुए, अदालत ने कहा कि वित्तीय कठिनाइयां या आपात स्थिति किसी कंपनी सचिव को उसकी इच्छा के विरुद्ध और उसकी सहमति के बिना काम करने के लिए बाध्य करने का कारण नहीं हो सकते।
 
अदालत ने कहा, ‘‘इन परिस्थितियों में याचिकाकर्ता (कंपनी सचिव) के खिलाफ प्रस्तावित अनुशासनात्मक कार्रवाई को प्रतिवादियों (सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी) द्वारा याचिकाकर्ता के सेवा से इस्तीफा देने के अधिकार का उल्लंघन करने के प्रयास के रूप में ही देखा जा सकता है।’’
 
इसने यह भी उल्लेख किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ने अक्टूबर 2022 से याचिकाकर्ता को वेतन का भुगतान नहीं किया है।
 
अदालत ने इस बात पर गौर किया कि याचिकाकर्ता ने 2020 में अपने पिता के निधन के बाद इस्तीफा दे दिया था। याचिकाकर्ता की मां कई वर्षों से तंत्रिका संबंधी और मानसिक बीमारियों से पीड़ित थीं।