Prime Minister Narendra Modi inaugurates Emerging Science, Technology and Innovation Conclave 2026
नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत मंडपम में 'इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव' (ESTIC) 2026 का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय और डीप-टेक स्टार्टअप्स से आग्रह किया कि वे तीन साल के भीतर ऐसे तकनीकी परिणाम दें जिन्हें मापा जा सके और जिनका बड़े स्तर पर विस्तार किया जा सके। एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, 27 अक्टूबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 'इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव' (ESTIC) 2026 के उद्घाटन दिवस पर 5,000 से अधिक वैश्विक प्रतिनिधि शामिल हुए। इनमें वैज्ञानिक जगत के दिग्गज, नीति-निर्माता और डीप-टेक स्टार्टअप्स के प्रतिनिधि मौजूद थे।
दिन भर चले इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों के संबोधन, दो नोबेल पुरस्कार विजेताओं के व्याख्यान, तीन समानांतर तकनीकी सत्र, स्टार्टअप प्रदर्शनी और पोस्टर ट्रैक, एक शाम की पैनल चर्चा और उद्घाटन सत्र शामिल थे। इन सभी कार्यक्रमों में मुख्य जोर बुनियादी शोध (फाउंडेशनल रिसर्च) को औद्योगिक स्तर तक ले जाने, जनहित से जोड़ने और ऐसी तकनीकों के विकास पर था, जो भारत की क्षमताओं को मजबूत कर सकें और वैश्विक कल्याण में योगदान दे सकें। अपने उद्घाटन संबोधन में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैज्ञानिक समुदाय, शोधकर्ताओं और युवा नवप्रवर्तकों (इनोवेटर्स) से कहा कि वे तीन साल की समय-सीमा के भीतर ठोस, मापने योग्य और बड़े स्तर पर विस्तार योग्य तकनीकी परिणाम दें।
प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि वैज्ञानिक उपलब्धियां केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इनका उपयोग वास्तविक दुनिया की समस्याओं को सुलझाने, 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन के तहत देश को आत्मनिर्भर बनाने और मानव कल्याण को बढ़ावा देने के लिए किया जाना चाहिए। इस संबोधन में भारत की उस प्रतिबद्धता को भी दोहराया गया, जिसके तहत देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड मैटेरियल्स और बायोटेक्नोलॉजी जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में वैश्विक मानक स्थापित करना चाहता है।
इस बीच, विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेंद्र सिंह ने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की भूमिका बदल रही है। अब भारत केवल तकनीकों का उपभोक्ता नहीं रह गया है, बल्कि भविष्य के लिए तैयार एक ऐसा वैश्विक भागीदार बन रहा है जो अत्याधुनिक वैज्ञानिक समाधानों का सह-निर्माण (co-creation) कर रहा है। सिंह ने बताया कि देश का स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से बढ़ा है; 2014 में यहाँ लगभग 400 स्टार्टअप थे, जो आज बढ़कर 2.3 लाख से अधिक हो गए हैं। मंत्री ने बताया कि इनमें से लगभग 50 से 60 प्रतिशत स्टार्टअप टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्थित हैं, जो इस बात का सबूत है कि तकनीकी उद्यमिता का विस्तार व्यापक स्तर पर हुआ है।
मंत्री ने भारत की आनुवंशिक (जेनेटिक) और फेनोटाइपिक विविधता को बायोटेक्नोलॉजी के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन बताया। उन्होंने जीन सिंथेसिस, सिस्टम बायोलॉजी और न्यूक्लियर मेडिसिन के क्षेत्रों में देश की अपनी क्षमताओं को और मजबूत करने पर जोर दिया। सिंह ने इन क्षेत्रों में काम की गति बढ़ाने के संदर्भ में हाल ही में हुए विधायी सुधारों, जिनमें 'शांति' (SHANTI) एक्ट भी शामिल है, का जिक्र किया। उन्होंने देश के बायोटेक्नोलॉजी इकोसिस्टम के लिए कुछ प्राथमिकताओं को रेखांकित किया, जिनमें स्वदेशी अनुसंधान क्षमता और भारत की वैज्ञानिक खूबियों के आधार पर नए एप्लिकेशन (उपयोग) विकसित करना शामिल है।
भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार, अजय के. सूद ने बुनियादी वैज्ञानिक अनुसंधान, औद्योगिक स्तर पर विस्तार और नियामक नीतियों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने ESTIC के 12 मुख्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों का जिक्र किया, जिनमें क्वांटम कम्युनिकेशन, जेनरेटिव और ऑटोनॉमस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और 'डीप ओशन मिशन' शामिल हैं। उन्होंने इस सम्मेलन को एक ऐसे मंच के रूप में प्रस्तुत किया, जो अनुसंधान को उन संस्थानों, औद्योगिक क्षमताओं और नीतिगत ढांचों से जोड़ता है, जो देश की अपनी स्वतंत्र राष्ट्रीय क्षमताएं विकसित करने के लिए जरूरी हैं।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के जोआचिम फ्रैंक (जिन्हें 2017 में केमिस्ट्री के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था) ने 'क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी' (Cryo-EM) के जरिए टारगेट डिस्कवरी और ड्रग डिजाइन पर एक विशेष व्याख्यान दिया। उन्होंने हाई-रिज़ॉल्यूशन, सिंगल-पार्टिकल Cryo-EM में इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटेशनल और गणितीय ढांचे, तथा मैक्रोमोलेक्यूलर कॉम्प्लेक्स के त्रि-आयामी (3D) विज़ुअलाइज़ेशन के बारे में बताया। इस सत्र में बताया गया कि कैसे इन कॉम्प्लेक्स की संरचनात्मक जानकारी 'रैशनल ड्रग-डिजाइन' (तर्कसंगत दवा डिजाइन) की प्रक्रिया में मदद कर सकती है और शोधकर्ताओं को जैविक लक्ष्यों (बायोलॉजिकल टारगेट्स) की जांच करने में सहायता दे सकती है।
प्रेस विज्ञप्ति में यह भी बताया गया कि 1993 में फिजियोलॉजी या मेडिसिन के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले रिचर्ड जे. रॉबर्ट्स ने 'स्प्लिट जीन्स' और 'लाइफ साइंसेज' (जीव विज्ञान) के नए आयामों पर एक अलग व्याख्यान दिया। उन्होंने जीन स्प्लिसिंग, माइक्रोबियल जीनोमिक्स और रेस्ट्रिक्शन-मॉडिफिकेशन एंजाइम की बुनियादी कार्यप्रणाली के बारे में बात की। इसके अलावा, उन्होंने टिकाऊ कृषि, सार्वजनिक स्वास्थ्य और डायग्नोस्टिक्स से जुड़ी बायोटेक्नोलॉजी पहलों पर भी चर्चा की, जिसमें लाइफ साइंसेज की प्रगति को खाद्य प्रणालियों और स्वास्थ्य सेवा में इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया।